आम आदमी की पहुंच से परे है न्याय

  • 2016-12-03 06:30:11.0
  • प्रो. एनके सिंह

आम आदमी की पहुंच से परे है न्याय

मैं व्यक्तिगत तौर पर कई ऐसे मामलों को जानता हूं, जो कि बेहद सरल हैं, लेकिन उनमें पीडि़तों को तारीख पर तारीख मिलते हुए कई वर्ष गुजर गए और आज तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं आ सका है। अगर किसी मामले में शीघ्र निर्णय आता भी है, तो मामले से जुड़े दूसरे पक्ष के पास एक निश्चित समय सीमा के भीतर उच्च अथवा उच्चतम न्यायालय में अपील करने का विकल्प मौजूद रहता है। किसी मामले का अंतिम फैसला आने तक पीडि़त पक्ष बुरी तरह से पस्त हो चुका होता है और कई मामलों में तो निर्णय से पहले उसकी मृत्यु भी हो चुकी होती है.


हालांकि भारत का संविधान देश के हर नागरिक को समान न्याय की गारंटी देता है, इसके बावजूद आजादी के करीब सत्तर बरस बीत जाने के बाद भी सामान्य आदमी न्याय तंत्र से बेहद दुखी और न्यायालय परिसरों में शोषण झेलने को मजबूर है। यह भी कि भारत का संविधान न्याय के समक्ष सभी को समानता और संरक्षण की गारंटी देता है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद-22 आज तक यह सुनिश्चित नहीं हो पाया कि सभी आरोपियों पर बेहतर सुनवाई उचित समय सीमा के भीतर हो सके। आज देश में अढ़ाई लाख से भी ज्यादा आरोपी कैदी ऐसे हैं, जो पिछले छह माह से भी ज्यादा के वक्त से जेलों में बंद हैं। इसकी कोई उम्मीद भी नजर नहीं आती कि आने वाले समय में बिना देरी के उनकी निष्पक्ष सुनवाई और जमानत हो पाएगी। तीन करोड़ से भी ज्यादा मामले कई वर्षों से न्यायालयों में लंबित पड़े हैं। निचली अदालतों में तकरीबन 5000 न्यायाधीशों के पद खाली पड़े हैं, लेकिन पीडि़तों को इस अव्यवस्था से राहत दिलवाने के लिए कोई प्रभावी प्रयास देखने को मिल नहीं रहा है। यह भी तय है कि इस जटिल समस्या का समाधान महज ज्यादा न्यायाधीशों की नियुक्तियों से होने वाला नहीं है, बल्कि भारत की समूची न्याय प्रणाली में एक नई जान फूंकनी होगी।
मैं व्यक्तिगत तौर पर कई ऐसे मामलों को जानता हूं, जो कि बेहद सरल हैं, लेकिन उनमें पीडि़तों को तारीख पर तारीख मिलते हुए कई वर्ष गुजर गए और आज तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं आ सका है। अगर किसी मामले में शीघ्र निर्णय आता भी है, तो मामले से जुड़े दूसरे पक्ष के पास एक निश्चित समय सीमा के भीतर उच्च अथवा उच्चतम न्यायालय में अपील करने का विकल्प मौजूद रहता है। किसी मामले का अंतिम फैसला आने तक पीडि़त पक्ष बुरी तरह से पस्त हो चुका होता है और कई मामलों में तो निर्णय से पहले उसकी मृत्यु भी हो चुकी होती है। मैं अपने गांव के एक बुजुर्ग आदमी को जानता हूं, जो अकसर रास्ते में आते-जाते हुए मिल जाते हैं। मैंने जब भी उनसे पूछा कि आप कहां जा रहे हैं, तो अमूमन उनका एक ही जवाब होता है कि एक और तारीख के लिए।

वह इस बात के लिए भी आश्वस्त हैं कि संभवतय: इस तारीख में भी उनके मामले में कोई निर्णय नहीं आने वाला है। इसके बावजूद वह मजबूर होकर संपत्ति से संबंधित एक छोटे से केस को लेकर पिछले करीब दस वर्षों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं। देरी हमारे न्याय तंत्र में इतने अंदर तक घुस चुकी है कि अब कोई उस पर सवाल उठाकर भी राजी नहीं है, क्योंकि लोग इसमें खुद को हर तरह से असहाय महसूस करते हैं। यहां तक कि न्यायपालिका में सुधार के लिए देश के नेतृत्व में से भी कोई संघर्षरत नहीं है। दरअसल, लोग अब इसमें किसी तरह के सुधार की उम्मीद ही छोड़ बैठे हैं। कमोबेश देश के बहुचर्चित मामलों के संदर्भ में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। जेसिका लाल मामले को ही ले लीजिए, जिनकी हत्या की गुत्थी एकदम सुलझी हुई है। इसके बावजूद इस मामले में सुनवाई का दबाव बनाने के लिए युवाओं को इंडिया गेट पर मोमबत्तियों के साथ प्रदर्शन करना पड़ा और इस मामले में फैसले के इंतजार में अब तक कई वर्ष गुजार दिए हैं।
इसी तरह का एक अनुभव नीलम कटारा मामले में भी देखने को मिलता है, जो कि अपने पुत्र की हत्या का मुकदमा ताकतवर सियासी शक्तियों के खिलाफ लड़ रही थीं। गवाहों का अपने बयानों से पलट जाना भी हमारे न्याय तंत्र का एक बड़ा लक्षण है, क्योंकि धन बल अपराधियों के पलड़े को अकसर भारी बना देता है। इस प्रकार गरीब आदमी संसाधनों के अभाव में धन बल के प्रभाव के आगे हार जाता है। इसे बालीवुड अभिनेता सलमान खान के मामले से और भी आसानी से समझा जा सकता है, जिसमें शराब के नशे में ड्राइविंग करते हुए कई बेगुनाह लोगों को गाड़ी के नीचे कुचल दिया गया था। यह मामला करीब एक दशक से न्यायालय परिसरों में झूल रहा है। पिछले कई वर्षों के अनुभव के आधार पर आज हमारे सामने यह एक स्वयंसिद्ध तथ्य है कि विभिन्न मामलों में तारीखें आगे बढ़ाने के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं, जिनकी वजह एक उचित समय सीमा में न्याय पाना बेहद मुश्किल हो चुका है।

अपराधियों को भी मालूम होता है कि किसी भी अपराध से जुड़ा मामला न्यायालय में जाएगा और वहां यह कई वर्षों तक लटका रहेगा। इस दौरान उन्हें गवाहों की गवाही बदलवाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और वे निर्णय अपने पक्ष में करवाने के लिए महंगे वकीलों की भी सेवाएं लेते हैं। इसी मानसिकता के आधार पर कई वारदातों को अंजाम दिया जाता रहा है। एक बार मैं दिल्ली में एक वकील से मिला। मैंने उनसे पूछा कि आप किस तरह के मामलों की पैरवी करते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि वह उन मामलों को ही हाथ में ले रहे हैं, जिनसे अन्य लोग बचते रहे हैं और वह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें इच्छित परिणाम मिलें। उनका यह जवाब सुनने में भले ही बड़ी शान वाला प्रतीत होता हो, लेकिन यह दर्शाता है कि किस तरह से बार एसोसिएशन के भी कई सदस्य अपने काम-धंधे को चमकाने के लिए संविधानेत्तर गतिविधियों में संलिप्त हैं। मेरा मानना है कि न्यायपालिका और न्यायिक प्रणाली में जड़-मूल सुधार करने की जरूरत है। केवल न्यायाधीशों की नियुक्तियों से यह समस्या हल होने वाली नहीं है।
विधि से जुड़ी समूची व्यवस्था इतनी जटिल व पुरानी हो चुकी है कि मौजूदा हालात में न्याय में देरी होना लाजिमी है।

बेहतर न्याय की कामना के साथ भारत में विधि आयोग का गठन भी किया हुआ है। मेरे विचार में न्यायपालिका की कार्रवाई को सरल और मामलों के समयबद्ध निपटारे के उद्देश्य से इसी को यह जिम्मेदारी सौंपते हुए तैयार करना होगा। किसी भी मामले को अनंतकाल तक चलने देने के बजाय इसे एक निश्चित समय सीमा में बांधना होगा। यहां तक कि शपथ-पत्र और भाषा को लेकर भी नवीनीकरण की जरूरत महसूस हो रही है। कम से कम जिला स्तर से लेकर उच्चतम न्यायालय तक की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाना बेहद आवश्यक है। कई मामले इसलिए लंबित हैं, क्योंकि छानबीन करने वाली संस्थाएं अपने कार्य में लंबा वक्त ले लेती हैं। इनके कार्य के लंबे समय तक चलते रहने के बजाय कुछ निश्चित समय सीमाएं निर्धारित करनी होंगी। शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का ही मामला ले लीजिए। लंबे समय से इसकी छानबीन हो रही है और आज भी कोई उम्मीद नहीं है कि जल्दी यह जांच किसी निष्कर्ष तक पहुंच पाएगी। शशि थरूर एक प्रभावशाली शख्सियत हैं और उन्होंने स्वयं इस जांच को जल्द खत्म करनी की गुजारिश की थी, लेकिन समयबद्ध कार्य की यहां कोई गारंटी नहीं है। पुलिस अथवा अन्य संस्थाओं को भी एक निर्धारित समय सीमा में कार्य को निष्पादित करने की परिपाटी विकसित करनी होगी। किसी मामले में देरी अपवाद के तौर पर तो हो सकती है, लेकिन यहां तो यह एक नियम ही बन चुकी है। इन विपरीत परिस्थितियों में कोई सामान्य व्यक्ति न्याय कैसे पा सकता है?

प्रो. एनके सिंह ( 34 )

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