न्यायपालिका और कार्यपालिका को समझनी होगी अपनी सीमा रेखाएं: एस.के. वर्मा

  • 2016-08-05 10:00:58.0
  • श्रीनिवास आर्य

न्यायपालिका और कार्यपालिका को समझनी होगी अपनी सीमा रेखाएं: एस.के. वर्मा

(श्री एस. के. वर्मा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के विधि व्यवसायी हैं। स्वभाव से घुमक्कड़ एकाकी, स्वाध्यायशील एवं संगीतज्ञ श्री वर्मा की भारत की राजनीति समाज और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को लेकर भी अच्छी पकड़ है। मूलरूप से बिहार की एक पूर्व रियासत के रहने वाले 66 वर्षीय श्री सिंह कभी उस एक रियासत के स्वामी भी रहे हैं। पर उसे वह बीते दिनों की बात कहकर खत्म कर देते हैं। आत्मप्रशंसा की ओर बात को बढऩे से रोक देते हैं। जो कि उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक गंभीर एवं शालीन बनाता है। उनसे पिछले दिनों 'उगता भारत' के वरिष्ठ संपादक श्रीनिवास आर्य की बातचीत हुई। जिसके कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं :-साहित्य संपादक)
उगता भारत : वर्माजी, आपने अपना विधि व्यवसाय कब और कहां से प्रारंभ किया?
वर्मा जी : मैंने अपना विधि व्यवसाय पटना उच्च न्यायालय से 1973 में प्रारंभ किया था। उसके एक वर्ष पश्चात ही मैं दिल्ली आ गया और 1974 से निरंतर मैं भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय कर रहा हूं।
उगता भारत : 1974 से यदि आप दिल्ली में हैं तो आपको आपातकाल की भी भली प्रकार याद होगी। कोई प्रसंग बताएंगे?
वर्मा जी : 1975 की जून में जब देश में आपातकाल लगा तो दिल्ली के लोग सहम से गये थे। उनके सहमेपन को हमने अच्छी प्रकार तब महसूस किया था जब आपातकाल हटाया गया और लोगों ने खुली हवा के झोकों को बड़े आनंद भाव से अनुभव किया था। उस समय दिल्ली के रामलीला मैदान में बुलाई गयी विपक्षी दलों की बड़ी रैली को लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, बाबू जगजीवन राम सहित विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं ने संबोधित किया था। जिसे मैंने भी सुना था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी का कहना था कि हम आपकी वोट और नोट से सरकार बनाएंगे, इसलिए नोट और वोट दोनों दो। हमने तब अपने लिए किराये लायक पैसे छोडक़र अपने पर्स का बाकी धन उन्हें सौंप दिया था।
उगता भारत : आपको न्यायपालिका का कार्यपालिका के मामलों में बढ़ता हस्तक्षेप कितना उचित लगता है?
वर्मा जी : देखिये न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की सीमा रेखाएं हमारे संविधान ने निश्चित की हुई हैं। मेरा मानना है कि लोकतंत्र के ये तीनों ही प्रमुख आधार स्तंभ हैं। इनके साथ चौथा स्तंभ प्रेस का है। सभी को अपनी सीमा रेखाएं समझनी चाहिए। वैसे न्यायपालिका भारत में बड़ी मजबूती से कार्य कर रही है और कई बार इसने एक अच्छे समीक्षक या संरक्षक की भूमिका का निर्वाह भी किया है।
उगता भारत : आपका दयाशंकर सिंह और मायावती की चल रही जंग पर क्या कहना है?
वर्मा जी : दयाशंकर सिंह ने मायावती के लिए जो कुछ कहा वह उचित नही था। उन्हें नारी की गरिमा का सम्मान रखना चाहिए था पर उसके पश्चात मायावती जी की पार्टी की ओर से जो कुछ कहा गया या किया गया वह तो और भी गलत हो गया, क्योंकि मायावती जी से एक नारी होने के नाते यह अपेक्षा की जाती है कि वे नारी के सम्मान का पुरूष समाज से अधिक ध्यान रखेंगी। पर ऐसा हुआ नही। इसे निराशाजनक ही कहा जाएगा।
उगता भारत : कश्मीर के विषय में क्या कहेंगे?
वर्मा जी : कश्मीर के विषय में भारत की मोदी सरकार का 'कठोर स्टैण्ड' लोगों को रास आ रहा है। वहां पर जिस प्रकार की परिस्थितियां बनी हुई हैं। उनमें देश की सरकार को किसी भी स्थिति में पीछे हटने की आवश्यकता नही है। पीछे हटने का अर्थ है कश्मीर को थाली में सजाकर दुश्मन को सौंप देना। जबकि आज देश की जनता की इच्छा है कि पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया जाए कि वह कश्मीर का राग भूल जाए।
उगता भारत : मोदी सरकार के विषय में आपकी क्या राय है?
वर्मा जी : 'सबका साथ और सबका विकास' मोदी सरकार का घोषित एजेंडा है। जाहिर है कि मोदी जी देश की सर्वानुमति से सरकार चलाने के पक्षधर हैं। मेरा मानना है कि एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री के लिए यही उचित भी है कि वह सबको साथ लेकर चलें।
उगता भारत : 'उगता भारत' के पाठकों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?
वर्मा जी : 'उगता भारत' एक राष्ट्रवादी समाचार पत्र है। इसके पाठकों से मैं यही कहना चाहूंगा कि भारतीयता ही भारत का राष्ट्रवाद है और भारतीयता का अर्थ है कि अपना हर कार्य मां भारती के लिए समर्पित हो। वैसे यह समाचार पत्र भारतीयता का संवाहक और प्रचारक प्रतिनिधि पत्र है। मेरी इसके लिए शुभकामनाएं हैं।