ब्रिटेन में नस्लीय भेदभाव की वापसी

  • 2017-02-21 09:30:37.0
  • कुलदीप नैयर

ब्रिटेन में नस्लीय भेदभाव की वापसी

नागरिकता छीनने संबंधी कानून 2005 में हुए विस्फोटों के बाद उपजी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 2006 में लागू किया गया था। इन विस्फोटों में 52 लोगों की मृत्यु हो गई थी और 700 लोग घायल हो गए थे। लागू होने के बाद के चार वर्षों में इसका केवल चार बार उपयोग किया गया, लेकिन पिछले वर्ष हुए सामान्य चुनावों के बाद इसका नौ बार उपयोग किया जा चुका है। और इसी कारण अप्रवासियों में चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही हैं। आरोप लगाने वाले सभी लोग श्वेत हैं। बचाव पक्ष द्वारा अब तक तरह-तरह की दलीलें दी जा रही हैंज

यह कोरा नस्लवाद है। पाकिस्तानी मूल के चार नागरिक यौन शोषण के एक मसले में संलिप्तता साबित होने बाद जेल में भेज दिए गए थे। अब न्यायाधीश मैक्लॉस्की ने इनको अपने मूल देश भेजने की सजा सुनाई है। मुझे आश्चर्य होता, यदि यह सजा किसी श्वेत व्यक्ति विशेषकर किसी यूरोपीय को सुनाई जाती। न्यायाधीश ने अपने आदेश में बिना किसी संकोच के आरोपियों की राष्ट्रीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया। इसके बाद एक अप्रवासी न्यायाधिकार के फैसले ने पाकिस्तानियों के देश वापसी के रास्ते पर मुहर लगा दी। कराची से प्रकाशित होने वाले 'डॉन' अखबार के मुताबिक ये पाक आरोपी उन नौ व्यक्तियों में से हैं, जिन्होंने एक 13 वर्षीय किशोरवय लडक़ी को शराब और नशे का सेवन करा यौन शोषण किया। नागरिकता से वंचित किए नागरिकों में दो सूडानी नागरिक भी शामिल हैं। अभी तक इस निर्णय के खिलाफ 10 से अधिक शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। जिन चार लोगों के खिलाफ देश-निकाला का फैसला सुनाया गया है, उनमें शब्बीर अहमद, आदिल खान, कारी अब्दुल रऊफ और अब्दुल अजीज शामिल हैं। कई अन्य आरोपों का सामना कर रहे अहमद के अतिरिक्त अन्य लोग जमानत पर बाहर हैं। खान, रऊफ और अजीज को इस षड्यंत्र में शामिल होने का दोषी पाया गया है। अजीज के ऊपर किसी भी लडक़ी के साथ यौन उत्पीडऩ का आरोप नहीं लगाया गया है।

न्याय सुनाते समय न्यायाधीश ने इस आरोप को आघातकारी, पाशविक और घिनौना करार दिया। निर्णय करते समय न्यायाधीश ने मानवाधिकार और अधिकारों के बेजा इस्तेमाल संबंधी तमाम दलीलों को दरकिनार कर दिया। यह मामला प्रकारांतर से प्रधानमंत्री थेरेसा से भी जुड़ा हुआ है क्योंकि गृह सचिव रहने के दौरान उन्होंने सार्वजनिक भलाई के लिए नागरिकता को छीनने के कदम की वकालत की थी। गठबंधन सरकार के अस्तित्व में आने के बाद इस नागरिकता छीनने के अधिकार का उपयोग बढ़ता जा रहा है और यह एक सामान्य चलन का रूप धारण करता जा रहा है। नागरिकता छीनने संबंधी कानून 2005 में हुए विस्फोटों के बाद उपजी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 2006 में लागू किया गया था। इन विस्फोटों में 52 लोगों की मृत्यु हो गई थी और 700 लोग घायल हो गए थे। लागू होने के बाद के चार वर्षों में इसका केवल चार बार उपयोग किया गया, लेकिन पिछले वर्ष हुए सामान्य चुनावों के बाद इसका नौ बार उपयोग किया जा चुका है और इसी कारण अप्रवासियों में चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही हैं। आरोप लगाने वाले सभी लोग श्वेत हैं। बचाव पक्ष द्वारा अब तक तरह-तरह की दलीलें दी जा रही हैं, जिनमें एक यह भी है कि लडक़ी वेश्यावृत्ति में संलिप्त थी। एक ब्रिटिश सांसद की दलील है कि इन सभी अपराधियों के देश निकाला संबंधी कानून पर तुरंत अमल होना चाहिए और इन्हें कुकृत्यों को मानवाधिकार की आड़ में छिपाया नहीं जाना चाहिए। अमरीका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद दिए जाने वाले तर्कों और इस तर्क में काफी समानता देखने को मिलती है। एक कार्यकारी आदेश के जरिए उन्होंने कुछ मुस्लिम बहुल देशों के नागरिकों के अमरीका में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। इसमें वे ग्रीन कार्ड धारक भी शामिल हैं, जिन्हें नागरिकता के अधिकार की इच्छा नहीं होती और वे पर्यटन की दृष्टि से अमरीका जाते हैं।

ब्रिटेन की ही तरह, ट्रंप के आदेश में यही तर्क दिया गया है कि यह कदम अमरीका में अपराध और आतंकवादी गतिविधियों को रोकने में सहायक होगा। लेकिन गंभीरता से विचार करें तो इस कार्यकारी आदेश का उद्देश्य कुछ और ही प्रतीत होता है। यह अमरीका में इस्लामोफोबिया पैदा करने का प्रयास है और चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप का यह मुख्य मुद्दा रहा है। हिलेरी क्लिंटन ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि वह अमरीकी संविधान की रक्षा करने के लिए यथासंभव सभी कदम उठाएंगी। अमरीका किसी को रोक नहीं सकता क्योंकि यह प्रवासियों का देश रहा है। किसी नागरिक को राष्ट्रीयताविहीन करने की यह बहस एक अपशगुन है। इसके जरिए किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रविरोधी घोषित कर वापस उसके मूल देश भेजा जा सकता है। यह लेखकों और पत्रकारों के लिए भी बहुत निर्मम स्थिति होगी क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का सबसे अधिक उपयोग यही लोग करते हैं। यह भारत में भी हो रहा है। चुनाव आयोग द्वारा उत्तर प्रदेश में हो रहे चुनावों के पहले चरण के समापन के बाद कुछ अभिमतों को प्रकाशित किए जाने के खिलाफ उठाए गए कदम को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। इस प्रकाशन के खिलाफ लगभग 15 एफआईआर दर्ज कराई गई हैं। इसके पहले सूचना प्रसारण मंत्रालय भी एक चैनल के खिलाफ कार्रवाई करता हुआ नजर आया था, जब उसने अपने प्रसारण पर माफी मांगने से इनकार कर
दिया था। कुछ समय पहले मंत्रालय ने एक खास परिप्रेक्ष्य में सेंसरशिप की भी वकालत की थी। मंत्रालय के अनुसार मात्र एक ही सार्वजनिक चैनल है, जबकि निजी चैनलों की संख्या कई है, इसलिए अपनी बात को रखने के लिए वह मात्र आधिकारिक चैनल का उपयोग कर सकता है। मेरी इच्छा है कि इस विशेषाधिकार का उपयोग दलितों और मुसलमानों की स्थिति को बताने के लिए किया जाए। स्थिति उल्टी है, मीडिया में उच्च जातियों का बाहुल्य होने के कारण दलितों और मुसलमानों का कोई जिक्र नहीं किया जाता। हां, भारत के बारे में यह जरूर कहा जा सकता है कि यह नस्लभेद नहीं है। संसद भवन और मुंबई में हमला करने वाले आतंकवादियों के खिलाफ कई न्यायालयों में मुकदमे चले। दोषी पाए गए सभी आरोपी मुस्लिम थे। पंथ पर जोर दिया जाना अपने आप में बुरा है। सऊदी अरब जैसा इस्लामी देश मुसलमानों को पसंद करता है, लेकिन वहां पर पाकिस्तानी मुसलमानों के बजाय भारतीय मुसलमान अधिक पसंद किए जाते हैं। भारतीय मुसलमानों को छोटी-मोटी गलती करने पर छोड़ दिया जाता है जबकि पाकिस्तानियों को कड़ी सजा दी जाती है। ब्रिटेन में यदि आरोपियों को उनके मूल देश भेज दिया जाता है, तो उसके ऊपर नस्लभेदी होने का आरोप लगेगा। इसके साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि नस्लीय भेदभाव धीरे-धीरे ब्रिटेन में बहस का मुख्य मुद्दा बनता जा रहा है।