ओपेक देशों की असलियत की आहट

  • 2016-12-13 12:30:44.0
  • डॉ. अश्विनी महाजन

ओपेक देशों की असलियत की आहट

'ओपेक' देश दुनिया की कुल तेल खपत का 42 प्रतिशत उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में इन देशों की एकाधिकारिक स्थिति के चलते उनके द्वारा उत्पादन को घटाने के निर्णय के बाद तेल की कीमतों पर असर पडऩा स्वाभाविक ही था। 29 नवंबर, 2016 को ओपेक और गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों की बैठक में भी इसी प्रकार के निर्णय, कि वे मिलकर तेल उत्पादन घटाएंगे, के बाद कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 55 डालर प्रति बैरल के आसपास आ गई है। इस कारण इस बात पर असमंजस बना हुआ है कि क्या घटती तेल कीमतों का युग समाप्त हो गया है और भविष्य में तेल कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं.


पिछले लगभग तीन सालों से लगातार घटती कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण पेट्रोलियम उत्पादों के भारत समेत निवल तेल उपभोक्ता देशों को भारी फायदा हुआ। गौरतलब है कि भारत में कुल तेल की खपत का 70 प्रतिशत से ज्यादा आयात करना पड़ता है। घटती तेल कीमतों के चलते भारत का तेल के आयात का बिल वर्ष 2012-13 में 164 अरब डालर से घटता हुआ 2015-16 में मात्र 83 अरब डालर तक पहुंच गया। इसके कारण हमारा व्यापार घाटा वर्ष 2012-13 में 190 अरब डालर से घटता हुआ 2015-16 में मात्र 118 अरब डालर ही रह गया। स्पष्ट है कि यदि तेल की कीमतें घटती नहीं, तो यह सब संभव नहीं होता और हमारा रुपया काफी कमजोर हो जाता, जिसका असर आगे चलकर भुगतान शेष पर तो पड़ता ही, मुद्रा स्फीति भी नियंत्रण से बाहर हो जाती।
तेल की घटती कीमतों ने सरकारी खजाने को भी भारी फायदा पहुंचाया। तेल की घटती कीमतों के मद्देनजर सरकार ने तेल पर कर बढ़ा दिया, जिसके कारण तेल की घटती कीमतों का पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचा। लेकिन सरकार का राजस्व बढ़ गया, जिससे राजकोषीय अनुशासन लाने में सुविधा हो पाई और 2015-16 तक आते-आते हमारा राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.9 प्रतिशत तक पहुंच गया। कुल मिलाकर घटती तेल कीमतों के चलते न केवल विदेशी व्यापार घाटा कम हुआ, सरकार का राजकोषीय घाटा भी कम हो गया। घटती तेल कीमतों के चलते हमारी ग्रोथ भी पहले से बेहतर हुई और मुद्रास्फीति भी घटी।

पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढऩी शुरू हुई हैं। कच्चे तेल की कीमत जो किसी समय 30 डालर प्रति बैरल से भी नीचे पहुंच गई थी, कुछ दिन पहले 55 डालर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। इस वर्ष सितंबर माह में ओपेक देशों ने यह निर्णय किया कि अपने कुल उत्पादन को वे 17 लाख बैरल प्रतिदिन घटाएंगे। गौरतलब है कि 'ओपेक' देश दुनिया की कुल तेल खपत का 42 प्रतिशत उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में इन देशों की एकाधिकारिक स्थिति के चलते उनके द्वारा उत्पादन को घटाने के निर्णय के बाद तेल की कीमतों पर असर पडऩा स्वाभाविक ही था। 29 नवंबर, 2016 को ओपेक और गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों की बैठक में भी इसी प्रकार के निर्णय, कि वे मिलकर तेल उत्पादन घटाएंगे, के बाद कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 55 डालर प्रति बैरल के आसपास आ गई है। इस कारण इस बात पर असमंजस बना हुआ है कि क्या घटती तेल कीमतों का युग समाप्त हो गया है और भविष्य में तेल कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं?
ओपेक देशों द्वारा तेल उत्पादन को घटाने के निर्णय और बाद में उनकी और गैर ओपेक देशों की आम सहमति के बाद वैश्विक स्तर पर ऐसा लगने लगा कि शायद तेल कीमतें दोबारा बढऩे लगेंगी, लेकिन बाजार की खबरें इस सोच को पुष्ट नहीं करतीं। ऐसा माना जा रहा है कि बाजार में दोनों प्रकार की शक्तियां काम कर रही हैं। एक ओर ओपेक और गैर ओपेक देश उत्पादन घटा कर कीमत बढ़ाने की इच्छा रखते हैं, लेकिन दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ दूसरी शक्तियां तेल कीमतों को बढऩे नहीं देना चाहतीं। अमरीका की एनर्जी इन्फार्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) का मानना है कि अगले साल भी तेल कीमतें 50 डालर प्रति बैरल से नीचे ही रहेंगी।

हालांकि ईआईए का मानना है कि ओपेक देश समझौते के अनुसार तेल उत्पादन को घटाएंगे जरूर, लेकिन पूर्ति के आधिक्य के चलते कीमतें बढ़ेंगी नहीं। ईआईए का यह मानना है कि अमरीकी तेल कंपनियों का उत्पादन बढ़ेगा और गैर ओपेक देशों में भी उत्पादन बढ़ेगा, जिसके चलते ओपेक देशों द्वारा तेल की आपूर्ति घटने का प्रभाव कीमतों पर नहीं पड़ेगा। अमरीका में लगातार तेल निकालने की गतिविधियों में तेजी आई है और कंपनियों द्वारा लाभ रिकार्ड किए जा रहे हैं। ऐसे में उनके द्वारा तेल उत्पादन बढऩे की पूरी आशा है। रायटर नाम की समाचार एजेंसी द्वारा एकत्र जानकारियों के अनुसार ओपेक की तेल कीमतें बढ़ाने की कोशिश इस कारण से नाकाम हो जाएगी कि गैर ओपेक तेल उत्पादन बढ़ेगा। हालांकि रायटर, ईआईए के इस अनुमान से सहमत नहीं है कि तेल कीमतें 50 डालर प्रति बैरल के आसपास रहेंगी, क्योंकि उनका मानना है कि तेल कीमतें 55 से 57 डालर प्रति बैरल रहेंगी। रायटर और ईआईए के अनुमानों में असहमति के बावजूद इस बात पर सहमति जरूर है कि तेल कीमतें 60 डालर प्रति बैरल से कम ही रहने वाली हैं। उधर, विशेषज्ञ 'ओपेक' द्वारा उत्पादन घटाने के बारे में भी पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं। जबकि ओपेक देशों ने अपना कुल उत्पादन 17 लाख बैरल प्रति दिन घटाने का निर्णय लिया है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि गैर ओपेक देश अपना उत्पादन छह लाख बैरल प्रतिदिन घटाएं। अभी तक केवल रूस ने ही अपना उत्पादन तीन लाख बैरल प्रतिदिन घटाने का वादा किया है। हालांकि ओपेक देशों के प्रतिनिधि अभी भी यह कह रहे हैं कि चाहे गैर ओपेक देश तेल उत्पादन घटाएं या न घटाएं, उनके द्वारा तेल उत्पादन घटाने की मुहिम जारी रहेगी।

इन तमाम अपेक्षाओं और आशंकाओं के मद्देनजर यही संभावना बनती है कि तेल कीमतें अपने वर्तमान स्तर 55 डालर प्रति बैरल के स्तर पर या उससे भी कम रह सकती हैं। यह सही है कि 1973 के बाद ओपेक देशों द्वारा अपनी आपूर्ति घटाने की ताकत के बल पर तेल कीमतों में लगातार नियंत्रण और अपने लाभों को अधिकतम करने की कवायद को दुनिया ने देखा है। लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, क्योंकि उस समय दुनिया में तेल की आपूर्ति का 52 प्रतिशत ओपेक देशों से प्राप्त होता था, जो घट कर अब मात्र 42 प्रतिशत रह गया है। तेल की आपूर्ति करने वाले गैर ओपेक देश अब एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। ओपेक के कुछ सदस्य देशों (जैसे सऊदी अरब) और गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों (जैसे रूस) के बीच व्यावसायिक या अन्य कारणों से तनाव भी जगजाहिर है। उधर, अमरीका द्वारा पिछले लंबे समय से उत्पादन को 50 लाख बैरल से लगभग 90 लाख बैरल तक बढ़ाए जाने ने भी तेल कीमतों को घटाने में बड़ी भूमिका अदा की है।