भारत की समस्याएं और बांग्लादेश की त्रासदी

  • 2016-12-28 12:30:49.0
  • कुलदीप नैयर

भारत की समस्याएं और बांग्लादेश की त्रासदी

बांग्लादेश को अपने राष्ट्र की सेकुलर लोकतांत्रिक छवि को बरकरार रखने के लिए अपने मूल्यों में बदलाव लाना होगा। जमात-ए-इस्लामिया सरीखे रुढि़वादी संगठन इसमें जरूर कुछ अड़चनें पैदा करेंगे, लेकिन इस राष्ट्र के निर्माता मुजिब-उर-रहमान के दिमाग में ऐसा कोई विचार नहीं था, जिसमें अल्पसंख्यकों से कोई पक्षपात किया जाए। शेख हसीना को भी उनके नक्श-ए-कदम पर चलना होगा, लेकिन उनके आचरण में इसकी कोई झलक नहीं दिखती। यही बांग्लादेश की सबसे बड़ी त्रासदी है।

यह बात समझ से परे है कि बांग्लादेश में हिंदुओं के मंदिरों व संपत्ति को क्यों तहस-नहस किया जा रहा है, जबकि थोड़े ही वक्त बाद यह आजादी के 45 वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाने जा रहा है। हिंदू बहुल आबादी वाले भारत ने 45 वर्ष पहले पश्चिमी पाकिस्तान के दमन के सताए पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को आजादी दिलाने में मदद की थी। इस्लामाबाद के विरुद्ध लड़े गए उस युद्ध में 2000 से भी ज्यादा भारतीय सैनिकों व अधिकारियों ने बलिदान दिया था। इसके अलावा देश की मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना उन मुजिब-उर-रहमान की बेटी हैं, जिन्होंने एक जन आंदोलन के मार्फत इस क्षेत्र को आजादी दिलवाई थी। पांथिक ताकतों को कुचलने को लेकर उनकी प्रतिबद्धताओं को संदेह की नजर से नहीं देखा जा सकता। यह अलग बात है कि रुढि़वादियों से लड़ाई के बहाने वह विपक्षी दलों से ही निपटना चाहती हैं।

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने शिकायत दर्ज करवाई है कि इन रुढि़वादी तत्त्वों के बहाने उन्हें निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि देश के समक्ष फिलहाल वही उनका विकल्प है। सत्तारूढ़ अवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना पर उन्होंने यह आरोप भी चस्पां किया है कि वह विपक्ष को खत्म करने के लिए हर तरह के हथकंडे आजमा रही हैं। अफवाहें तो यहां तक फैलाई जा रही हैं कि खालिदा जिया भारत के खिलाफ रही हैं, इसलिए उनकी छवि को धूमिल करने के भी प्रयास किए जा रहे हैं। मुझे आज भी याद है, जब मैं बांग्लादेश की आजादी के बाद मुजिब-उर-रहमान से ढाका में मिला था। तब मैंने उनसे यह शिकायत भी की थी कि आपके देश में भारत विरोध की एक मजबूत भावना पैदा हो चुकी है। मैं ढाका प्रेस क्लब गया, तो वहां के पत्रकारों में इस बात को लेकर गहरा रोष था कि स्मॉक्ड हिसला फिश कोलकाता के होटलों में तो उपलब्ध है, लेकिन ढाका में नहीं। इतना ही नहीं, वहां मौजूद पत्रकारों ने इस बात की भी कड़ी निंदा की कि नई दिल्ली और कोलकाता ने बांग्लादेश की आजादी में भी लाभ लिया था। उन्होंने उस दौरान भारतीय सैन्य टुकडिय़ों का नेतृत्व करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह आरोड़ा पर भी कई गंभीर आरोप लगाए। शेख मुजिब-उर-रहमान ने मुझे बताया कि आजादी के लिए संघर्ष के उस दौर में भारत के सहयोग को बंगाली अवाम भूली नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश में पंथनिरपेक्षता गहराई तक समाई हुई है, जिसकी किसी भी स्थिति में अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन बड़े ताज्जुब की बात है कि बांग्लादेश की पंथनिरपेक्षतावादी पहचान इन दिनों सवालों के घेरे में है। जनरल एचएम इर्शाद के सैन्य शासन के दौरान सत्ता का हिस्सा रही जमात-ए-इस्लामिया मौजूदा समय में भी शासन को इस्लामिक मार्ग पर बढ़ाने के भरसक प्रयास कर रही है। यह विश्व के इस्लामिक राज्य के साथ भी मजबूत संबंध कायम करना चाहती है। सुखद यह कि व्यावहारिक तौर पर बांग्लादेश में इसे कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है।
हालांकि शेख हसीना की अलोकप्रियता ने बांग्लादेशियों की पहचान न केवल भारत विरोधी, बल्कि इस्लाम के प्रति नरम दृष्टिकोण के रूप में स्थापित की है। वह केवल अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी बेगम खालिदा जिया के समर्थकों को खत्म करने पर तुली हुई हैं। इस लड़ाई में खालिदा जिया के पक्ष में खड़े सेकुलर लोगों को भी सांप्रदायिक करार देकर उनसे तमाम तरह की ज्यादतियां की जा रही हैं। शेख हसीना इस वक्त सत्ता का हिस्सा बनने के बजाय अपने विरोधियों से निपटने को ज्यादा उत्कंठित दिखती हैं। विपक्षी दल खुलेआम कहते फिर रहे हैं कि चुनावों के जरिए भी उन्हें सत्ता से हटाना उनके वश की बात नहीं है, क्योंकि वह कभी स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव होने ही नहीं देंगी। शेख हसीना तो पहले ही खुले तौर पर राजवंशीय शासन की बात करती रही हैं और इसके लिए बाकायदा अमरीका में रहने वाले अपने पुत्र से शासन संबंधी मसलों पर सलाह-मशविरा करती रही हैं।

इस लीक पर अपनी सोच को केंद्रित करते हुए वह वहां के विश्वविद्यालयों व अन्य अहम शैक्षणिक संस्थानों के अहम पदों पर अपने खासमखास लोगों को नियुक्ति दे रही हैं, बेशक उन लोगों के पास उस पद के लिए शैक्षणिक योग्यता न भी हो। इस प्रक्रिया में वह योग्यता पर आधारित रहे शैक्षणिक तंत्र को तहस-नहस करने में जुटी हुई हैं। लेकिन इससे उनको कोई खास सरोकार भी नहीं है, क्योंकि पंथनिरपेक्षता के नाम पर वह अपने वफादारों को देश के महत्त्वपूर्ण संस्थानों के प्रमुख पदों पर नियुक्त कर सकती हैं। वह इस तरह का व्यवहार कर रही हैं, मानों उन्हें शासन का कोई जन्मसिद्ध अधिकार हासिल हो। इतना ही नहीं, वहां एक ऐसा विधेयक लाने की तैयारी हो रही है, जिससे उनके या उनके पिता के शासन को चुनौती देने वाले को देश विरोधी करार दिया जाएगा। वास्तव में यह लोकतांत्रिक परंपराओं को देखने का एक अजीब ही नजरिया है, लेकिन जब यह विधेयक वहां कानून बन जाएगा, तो बांग्लादेश में इसी तरह की अजीबो गरीब चीजें सामान्य हो जाएंगी। उनके टारगेट पर आज जो विपक्षी दल हैं, उनकी आने वाले समय में कोई आवाज ही नहीं रह जाएगी। इस प्रकार यह माहौल और भी सत्तावादी तथा तानाशाही बन जाएगा। उस दौरान बहुत कम ऐसे लोग रह जाएंगे, जो शासन के खिलाफ सवाल उठा पाएंगे। शेख हसीना के तमाम फैसलों के जरिए ऐसा प्रतीत होना शुरू हो गया है कि वह देश के कल्याण का विषय भूल ही चुकी हैं। अब जबकि थोड़े वक्त में बांग्लादेश अपनी सालगिरह मनाने जा रहा है, इसके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यही मौजूद है कि आर्थिक विकास के जरिए सरकार वहां के लोगों का कल्याण किस तरह से कर सकती है।
दुर्भाग्य से आज वहां यह कोई मुद्दा ही नहीं दिखता। प्रधानमंत्री महज अपने कट्टर समर्थकों की नियुक्तियां कराकर लाभ गिनने के मूड में दिखती हैं। आज यह हकीकत हो सकती है, लेकिन किसी ने कभी भी इस बात की कल्पना नहीं की थी कि वहां हिंदुओं के मंदिरों या अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाएगा। तथ्य यही है कि भारत में रहने वाले 18 करोड़ से ज्यादा मुस्लिमों का व्यवहार बांग्लादेशी मुसलमानों को इस तरह का आचरण न करने के लिए मजबूर करेगा कि वे कुछ भी ऐसा न करें, जिससे नई दिल्ली या यहां की हिंदू आबादी के मन में उनके प्रति विलगाव पैदा हो। बांग्लादेश को अपने राष्ट्र की सेकुलर लोकतांत्रिक छवि को बरकरार रखने के लिए अपने मूल्यों में बदलाव लाना होगा। जमात-ए-इस्लामिया सरीखे रुढि़वादी संगठन इसमें जरूर कुछ अड़चनें पैदा करेंगे, लेकिन इस राष्ट्र के निर्माता मुजिब-उर-रहमान के दिमाग में ऐसा कोई विचार नहीं था, जिसमें अल्पसंख्यकों से कोई पक्षपात किया जाए। शेख हसीना को भी उनके नक्श-ए-कदम पर चलना होगा, लेकिन उनके आचरण में इसकी कोई झलक नहीं दिखती। यही बांग्लादेश की सबसे बड़ी त्रासदी है।