नए दोस्त बनाकर शत्रुओं को काबू करे भारत

  • 2016-11-21 09:30:22.0
  • प्रो. एनके सिंह

नए दोस्त बनाकर शत्रुओं को काबू करे भारत

रूस के निजी हित समूचे विदेशी संबंधों को रेखांकित करने का काम करेंगे और इसका एक संभावित नुकसान भारत को झेलना पड़ सकता है। चूंकि सार्क की भविष्य में कोई खास प्रासंगिकता नहीं रह जाएगी, लिहाजा भारत को पूर्व में एक शक्तिशाली गुट गठित करना होगा। दक्षिण कोरिया, जापान और वियतनाम पहले से ही चीन से दूरी बना चुके हैं, जिन्हें इस गुट में शामिल करना आसान होगा। अत: यह अनुकूल समय है कि भारत अपनी विदेश नीति को नए सिरे से गढ़े और अपने दीर्घावधि के मित्रों के साथ अपना भविष्य निर्धारित करे। ट्रंप ने अमरीकी राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में बाजी मार ली है। इसी के साथ जंतर-मंतर पर उनकी विजय के लिए हवन-यज्ञ करने वाले लोगों की इच्छाओं को आधार मानें, तो भारत के मित्रों की सूची में एक और मित्र जुड़ गया है। चाणक्य ने कहा है कि हमें हमेशा समय, अवसर और उन लोगों के बारे में सोचना चाहिए, जो आपकी परवाह करते हैं या आपको अपने साथ मानते हैं। मैं हमेशा उनके विवेक व समझदारी पर विचार करते हुए अचंभित होता रहता हूं, जिन्होंने हमें राज व्यवस्था से संबंधित न जाने कितनी ही कूटनीतिक रणनीतियां प्रदान की हैं। मैंने उनके द्वारा रचित अर्थशास्त्र के महत्त्व को समझते हुए इसके कई महत्त्वपूर्ण विषयों को एमबीए के कोर्स में पढ़ाए जाने वाले प्रबंधन विषय में भी शामिल करवाया, बेशक सरकार ने इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए कोई विशेष निर्देश जारी नहीं किए थे। इसके लिए मैंने प्राध्यापकों को भी स्पष्ट कर दिया कि भले ही पाठ्यक्रम के तहत इसे पढ़ाए जाने की हमारे लिए कोई बाध्यता नहीं है, फिर भी यदि हम निर्धारित पाठ्यक्रम को पूरा कर लेने के साथ-साथ शिक्षार्थियों के बौद्धिक विकास के लिए ऐसे विषय पढ़ाते हैं, तो हमें कोई इसे पढ़ाने से रोक नहीं सकता। आज कई अन्य संस्थानों ने भी अपने पाठ्यक्रम में इसके कुछ अहम विषयों को जोडक़र इसे पढ़ाना शुरू कर दिया है। राज्य व्यवस्था को चलाने या विश्व समुदाय के शेष देशों के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए यह जानना बहुत जरूरी होता है कि कौन हमारा मित्र है और कौन दुश्मन। इस बात को भलीभांति परख लेने के बाद ही हमें उनके साथ जैसा उचित हो, अपना व्यवहार तय करना चाहिए। प्रबंधन, कला या विज्ञान के तौर पर महज किसी संगठन की चारदीवारी या किसी संस्थान के बाहरी ढांचे तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा कौशल है, जो किसी भी संस्थान को शिखर की ओर बढऩे के लिए प्रेरित करता है या किसी भी देश को तेजी के साथ वैश्विक होती जा रही अर्थव्यवस्था में संवृद्धि एवं विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करता है।


संभवतया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस हकीकत को भांप लिया था, इसीलिए अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने सार्क समूह के सभी देशों के प्रमुखों को आमंत्रित किया था। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी शपथ ग्रहण समारोह में अंतरराष्ट्रीय स्तर की हस्तियां एक मंच पर साथ आई हों। भारत शुरू से ही साम्यवादी धड़े के साथ जुड़ा रहा है और पूंजीवादियों से इसने दूरी बनाकर रखी है। शायद यही वजह रही है कि भारत अमरीका या उसके मित्र राष्ट्रों के साथ एक फासला बनाकर चलता रहा है। हम आज तक मुख्य तौर पर रूस पर ही निर्भर रहे हैं। हालांकि वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में इस स्थिति को बदलने की एक हद तक कोशिश जरूर की थी, फिर भी उनकी प्राथमिकताओं के केंद्र में रूस ही रहा। हम पहले से ही चीनी आक्रमण का एक कटु अनुभव झेल चुके हैं और आज भी अपने पड़ोसियों की आकांक्षाओं से अच्छी तरह से वाकिफ हैं।

मोदी ने एक के बाद एक देशों की प्रभावशाली यात्राएं करके न केवल विभिन्न देशों के साथ मित्रतापूर्वक संबंध स्थापित किए, बल्कि अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उन सभी देशों से मदद लेकर अपनी विदेश नीति में एक आमूलचूल परिवर्तन किया है। ताज्जुब की बात यह कि एक समय जिस नरेंद्र मोदी को अमरीकी प्रशासन ने वीजा देने से भी मना कर दिया था, उन्होंने अपने मन में किसी तरह के विद्वेष को स्थान न देते हुए अमरीका के साथ अपने स्वाभाविक प्रेम को बढऩे दिया। मोदी जानते हैं कि आज भारत को तकनीकी विकास और प्रगति के पथ पर आगे बढऩे के लिए अमरीका के साथ की जरूरत है।

साफ तौर पर नरेंद्र मोदी ने ओबामा के साथ व्यक्तिगत रूप से घनिष्ठ मित्रता कर ली, जिससे अमरीकी नीति का झुकाव भारत के पक्ष में हुआ। इसके पश्चात अमरीका ने भले ही पाकिस्तान को पूरी तरह से न भी छोड़ा हो, लेकिन आतंकवाद के मसले पर इसने कई मर्तबा पाकिस्तान को फटकार लगाई है। नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ माहौल तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत की है। जब भारत की एनएसजी समूह में प्रवेश की बारी आई, तो चीन को छोडक़र उन्होंने इसके लिए सभी सदस्य देशों को राजी कर लिया था। भारत के बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ भी बहुत अच्छे संबंध रहे हैं। यदि हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाएं, तो दो पड़ोसी देशों यानी पाकिस्तान और चीन को छोडक़र सभी देशों के साथ संबंध सौहार्दपूर्ण ही रहे हैं। अभी हाल ही में हुई ब्रिक्स देशों की बैठक में भी साफ देखा जा सकता है कि पड़ोसी मुल्कों के साथ तो भारत के अच्छ संबंध हैं ही, लेकिन रूस और ब्राजील सरीखी ताकतें भी भारत के प्रति सकारात्मक सोच रखती हैं। मोदी के सामने सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान के साथ शत्रुता या चीन-पाकिस्तान ध्रुव से होने वाला विरोध की ही रही है। हालांकि नवाज शरीफ से मुलाकात करके मोदी ने अपने व्यक्तिगत जलवे का उपयोग भारत-पाक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए भी किया, लेकिन आतंकवाद के जरिए अपने हितों को पोषित करती आई पाकिस्तानी फौज ने उनके प्रयासों को सफल नहीं होने दिया। इन तमाम कोशिशों के बावजूद सीमापार से फैलाए जा रहे आतंक में कोई कमी नहीं आई। पाक की इन्हीं हरकतों का नतीजा है कि मोदी ने फिर अपने ही अंदाज में पाकिस्तान को उसकी इन हरकतों के लिए जवाब देना मुनासिब समझा, जिसे सर्जिकल स्ट्राइक कहा जाता है।

ब्रिक्स देशों समेत किसी भी देश ने आतंकवाद पर मोदी की इस कार्रवाई की निंदा नहीं की और न ही कोई मीन-मेख निकाला। यहां तक कि पाकिस्तान का पक्ष लेने वाला चीन भी खुले तौर पर इस कदम के लिए भारत का विरोध नहीं कर सका। लेकिन पाकिस्तान द्वारा उपहार स्वरूप कश्मीर का जो हिस्सा चीन को दिया गया है या रणनीतिक लिहाज से अहम माने जा रहे ग्वादर बंदरगाह के निर्माण में पाकिस्तान ने जो मदद की है, उसके कारण परोक्ष रूप से चीन ने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए चालाकी भरा व्यवहार किया। मेरा आकलन है कि रूस इस गठबंधन में शामिल हो सकता है, क्योंकि वह अमरीका और यूरोप के खिलाफ एक मोर्चा गठित करने की तैयारियों में जुटा हुआ है।

हमारे रूस के साथ पुराने मित्रतापूर्वक सबंध होने के बावजूद आज रूस उस देश का साथ चाहता है, जो अमरीका के खिलाफ उसके साथ खड़ा हो सके। रूस के निजी हित समूचे विदेशी संबंधों को रेखांकित करने का काम करेंगे और इसका एक संभावित नुकसान भारत को झेलना पड़ सकता है। भारत के लिए यह संभव है कि इस गुट के खिलाफ यह जापान या पूर्व के अन्य देशों को अपने साथ जोड़ ले। जापान के साथ हमारे संबंध बेहद अहम हैं। आर्थिक और तकनीकी लिहाज से यह दोस्ती दोनों ही देशों के हित में रहेगी। चूंकि सार्क की भविष्य में कोई खास प्रासंगिकता नहीं रह जाएगी, लिहाजा भारत को पूर्व में एक शक्तिशाली गुट गठित करना होगा।