हमारा राष्ट्रीय अभिवादन-'नमस्ते'

  • 2016-08-14 11:45:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारा राष्ट्रीय अभिवादन-नमस्ते

'नमस्ते' हमारा राष्ट्रीय अभिवादन है आपको याद होगा, अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा जब गणतंत्र दिवस के अवसर पर पिछले दिनों हमारे देश में आये थे-तो उन्होंने भारतभूमि पर उतरते ही-उपस्थित लोगों से 'नमस्ते' का अभिवादन हाथ जोडक़र किया था। नमस्ते से अलग नमस्कार और प्रणाम जैसे कई अभिवादन भी हमारे देश में प्रचलित हैं। परंतु इन सबमें श्रेष्ठ नमस्ते ही है। क्योंकि 'नमस्ते' का अभिवादन वेदसंगत है। कुछ विद्वान लोगों ने 'नमस्कार' को कहीं अधिक उपयुक्त मानने की भ्रांति उत्पन्न की है। इसका कारण उन्होंने भारत में 'सूर्य नमस्कार' जैसे प्रचलित अभिवादन को बना लिया है, जिससे कई विद्वानों की मान्यता बन गयी है कि नमस्कार उगते हुए सूर्य को किया जाता है जबकि नमस्ते अस्त होते हुए सूर्य को किया जाता है। व्याकरण के आधार पर और विज्ञान के आधार पर उनकी यह धारणा उचित नही कही जा सकती।


अब हमें नमस्ते और नमस्कार के शाब्दिक अर्थ पर विचार करना चाहिए। नमस्ते का अभिप्राय है-'आपके लिए सत्कार हो' नमन हो अर्थात मैं आपका अहंकार शून्य हृदय से मान्य करता हूं, मैं आपके लिए झुका हूं मेरे हृदय में आपके प्रति श्रद्घा है।

दोनों हाथ जोडक़र सीने से लगाकर नतमस्तक होकर 'नमस्ते' करना वैदिक प्रकार है। 'नमस्ते' में 'ते' का अर्थ तेरे लिए या आपके लिए है।

जिसका अभिप्राय स्पष्ट है कि नमन आपके लिए हो रहा है और नमस्ते का उत्तर देने वाला भी यही कह रहा है कि आपके लिए भी नमन। इस प्रकार 'नमस्ते' छोटा करे या बड़ा करे-दोनों एक दूसरे को बहुत कुछ दे जाते हैं या दोनों एक दूसरे से बहुत कुछ ते जाते हैं। इसलिए यह बात भी अपने आप ही समाप्त हो जाती है कि 'नमस्ते' सदा छोटे को बड़ों से करनी चाहिए। 'नमस्ते' का अभिवादन कोई भी किसी से भी कर सकता है। 'नमस्कार' नम:+कार: से बनती है। इसका अभिप्राय है-सत्कार किया। किसने किसका किया यह बात नमस्कार में स्पष्ट नही होती-क्योंकि इसमें 'ते' (अर्थात आपका या तेरा) नही है।

यजुर्वेद में 'नमस्ते रूद्र मन्यवे' आया है, जिसका अभिप्राय है कि दुष्टों को रूलाने वाले परमात्मा को नमन है। शतपथ ब्राह्मण में आया है-''सा हो वाच-नमस्ते याज्ञवल्क्याय।'' 'महाभारत' में आया है-'ज्येष्टो राजन वरिष्ठो असि नमस्ते भारतवर्षभ।' अर्थात शकुनि ने युधिष्ठिर को नमस्कार किया। गुरूग्रंथ साहब में आया-'हर ए नमस्ते हर ए नमइ। अर्थात हरि को नमन है नमन है।
यजुर्वेद (36/21) में आया है-
''नमस्ते अस्तु विद्यतु नमस्ते स्तनचित्नवे।'' अर्थात हे भगवान! परमैश्वर्य युक्त परमेश्वर जिस कारण आप हमारे लिए सुख के अर्थ सम्यक चेष्टा करते हैं, इससे बिजली के समान अभिव्याप्त आपके लिए नमन है। अधिकतर गर्जन वाले विद्युत के तुल्य दुष्टों को भय देने वाले आपके लिए नमन है। इसी प्रकार यजुर्वेद (36/20) और 38/16 में भी नमस्ते शब्द का प्रयोग किया गया है। अत: यह नही कहा जा सकता कि ढलते हुए या अस्त होते सूर्य को ही नमस्ते कहा जाता है।

इतना ही नही यजुर्वेद (27/11) और सामवेद में 'नमस्ते अग्न ओज से' कहकर नमस्ते शब्द की मान्यता की गयी है। कठोपनिषद में महर्षि यमाचार्य अपने शिष्य नचिकेता को 'नमस्ते' करते हैं। गीता (1/39) में अर्जुन ने श्रीकृष्ण जी को 'नमस्ते' किया है। जबकि भवभूति के उत्तर राम चरित में राम ने सीता को 'भगवति नमस्ते' कहकर नमस्ते किया है।

लिंग पुराण (3/27/7) में आया है :-
''देव देव जगन्नाथ नमस्ते भुवनेश्वर।''
वराहपुराण (1/21) में पृथिवी की वराह को नमस्ते की गयी है :-
''नमस्ते सर्वदेवेश नमस्ते मोक्षकारिणे।'' वराह पृथिवी कहते हैं :-
''नमोअस्तु विष्णवे नित्यं नमस्ते पीतवाससे।
नमस्ते चाद्यरूपाय नमस्ते जल रूपिणे।।
'शिवपुराण' में केतकी का फूल महादेव जी को 'नमस्ते' करता है। कहता है :-
'नमस्ते नाथ मे जन्म निष्फलम् भवदाज्ञया।'
'शिवपुराण' (1/10) में ब्रह्म तथा विष्णु महादेवजी को नमस्ते करते हुए कहते हैं :-
''नम: सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने।''
शिवपुराण में स्त्री और शूद्रों के लिए 'नमस्ते' करने का भी श्लोक है। शिवपुराण (2/2/32) में विष्णु ने दधीचि को नमस्ते की है।
विभमीति सकृद वक्तुर्मसि त्वं नमस्तव।''
शिवपुराण वायु सं. 7 खण्ड 1 अ. 12 में ब्रह्मा ने अपने पुत्रों को नमस्ते की है।
ब्रह्मोवाच-''नमस्ते भगवान रूद्र भास्करामित तेजसे।''
पदमपुराण (ख.अ./7) में तो ब्रह्माजी ने अपनी धर्मपत्नी सावित्री को चरण स्पर्श कर नमस्ते की है। कहा है-''देवी नमो अस्तुते।''

'पाण्डवगीता' पूजन में नमस्ते भगवान रूद्र पान्ती पतये नम:।' कहकर नमस्ते का महिमामंडन किया गया है। इसी प्रकार सारस्वतसूत्र 248 में देवी भागवत ने जगत रक्षिका दुर्गा को 10 बार नमस्ते की है। शब्द भी सीधे 'नमस्ते' ही रखा गया है। 'सत्यनारायण' में नमस्ते वांग्यनोतीतरूपाय कहकर नमस्ते को प्रमुखता दी गयी है। 'दुर्गादास' के पंचम अध्याय के 16वें श्लोक से लेकर 79 वे श्लोक तक अनेक प्रकार 'नमस्ते' शब्द का प्रयोग किया गया है। गीता में श्रीकृष्ण जी ब्राह्मणों को नमस्ते करते हैं। 'ब्रहदरण्य कोपनिषद' में याज्ञवल्क्य जी जनक को 'नमस्ते' कहते हैं। जंगल में सीताजी विराध नामक राक्षस को 'नमस्ते राक्षसोत्तम' कहकर 'नमस्ते' करती हैं। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में सर्ग (4/3) में आया है।

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 50 श्लोक 17 में विश्वामित्र ने वशिष्ठ को नमस्तेअस्ते कहकर 'नमस्ते' की है। अथर्ववेद (10/10/1) में स्त्री जातिमात्र को 'नमस्ते' का विधान किया गया है। कहा गया है :-
'नमस्ते जायमानाये'
इस प्रकार उपरोक्त साक्षियों और प्रमाणों से सिद्घ है कि भारत की परंपरा 'नमस्ते' के अभिवादन की ही रही है विदेशों में भी हमें 'नमस्ते' वालों के रूप में ही जाना जाता है। तभी तो बराक ओबामा को भारत की यात्रा पर आने से पूर्व 'नमस्ते' करना सीखना पड़ा था। 'नमस्ते' की एक और विशेषता भी है। इसका नम: शब्द न केवल 'नमन' की या श्रद्घा की या विनम्रता की शिक्षा देता है अपितु यास्काचार्य ने नम: का अर्थ 'वज्र' या अन्न भी किया है। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार नम: का अर्थ परिवर्तन हो जाता है। कहने का अभिप्राय है कि जब बड़ा छोटों से 'नमस्ते' करे तो उसका अभिप्राय यह होता है कि तू फले फूले समृद्घिशाली हो अन्नादि से तेरे कोष सदा आपूरित रहें। दूध-पूत धन धान्य सब तेरे पास हों। 'नमस्ते' कितना प्यारा शब्द है बड़ा छोटे से करे तो अपने आशीर्वाद बना सकता है और यदि छोटा बड़े से करे तो 'श्रद्घा' बन जाता है। है कोई ऐसा प्यारा शब्द संस्कृत से अलग किसी अन्य शब्द कोष में? ढूंढ़े से भी नही मिलेगा। अपनी संस्कृति को अपनाओ-अपने संस्कारों को अपनाओ-आनंद मिलेगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1596 )

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