गंभीर अपराधों के प्रति असहिष्णुता की दरकार

  • 2016-08-13 06:30:07.0
  • प्रो. एनके सिंह

गंभीर अपराधों के प्रति असहिष्णुता की दरकार

मेरा मानना है कि हम लोगों ने बहुत सहिष्णु बन लिया। अब उन चीजों के प्रति सार्वजनिक तौर पर असहिष्णु बनने का समय है, जो साफ तौर पर निंदनीय हैं और सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करती हैं। यदि कोई व्यक्ति दुष्कर्म, हत्या, राजद्रोह या फिर घोर असभ्य भाषा का इस्तेमाल सरीखे अपराधों में लिप्त पाया जाता है, तो उसके प्रति रत्ती भर सहिष्णुता नहीं दिखाई जानी चाहिए। इन गैर कानूनी और अपमानजनक गतिविधियों में कमी लाने के लिए असहिष्णुता बरतना बेहद आवश्यक है।


इन दिनों सहिष्णुता के लिए चिल्ल-पौं मची रहती है, लेकिन किसी को पता नहीं कि आखिर इसका वास्तविक अर्थ क्या है? क्या इसका अर्थ सांस्कृतिक व सामाजिक सहिष्णुता है? यह बात उभरकर सामने आई है कि तकनीक की बढ़ी रफ्तार और विश्व में हितों के बढ़ते टकराव के कारण जीवन में सहिष्णुता और संयम लगातार घटता जा रहा है। राजनीतिक राज व्यवस्था के तौर पर हमने अपरिहार्य वैमनस्य को बढ़ाने वाली रेखाएं खींच ली हैं। एक समय था, जब उर्दू के मशहूर शायर मीर तकी मीर ने लिखा था,यानी कि आप लोग मेरा मजहब क्यों पूछ रहे हो? मैंने कब का इस्लाम छोड़ दिया है और एक मंदिर में प्रवेश पाने के लिए माथे पर सिंदूरी रंग लगा लिया है। निश्चित तौर पर यदि आज के समय में उन्होंने ऐसा कहा होता, तो उन पर फतवा जारी होने की तलवार लटकी होती, लेकिन भारत तो ऐसी उदारता के साथ जीता आया है। मेरा मानना है कि इस विषय पर बहस करना निरर्थक है। अब तक तो इस मुद्दे को दफना दिया जाना चाहिए था, लेकिन मनोहर पर्रिकर द्वारा कुछ जानी-मानी हस्तियों के राष्ट्रविरोधी बयानों के लिए की गई निंदा ने एक बार फिर इस आग में घी डालने का काम किया है। इस पूरी चर्चा में इसे किसी सरकार के साथ जोडऩा गलत है, क्योंकि यहां कानून का शासन लागू है और देश का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यदि हम धार्मिक माहौल की बात करें, तो इसमें अकबरुद्दीन ओवैसी, जाकिर नाइक या फिर तोगडिय़ा, साध्वी प्राची और ज्योति के बयानों के जरिए असहिष्णुता का असर कुछ ज्यादा देखने को मिलता है। तुच्छ कारणों से एक-दूसरे समुदाय पर हमले करके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया जाता रहा है। जो मुस्लिम नेता असहिष्णुता को लेकर हाय-तौबा मचाए हुए हैं, उन्हें पहले गंभीर संयम और अनुकूलन के साथ जीने की आदत डालनी होगी, तभी वह समान अधिकारों का दावा कर सकेंगे। सांप्रदायिक आग को भडक़ाने या आपसी घृणा पैदा करने सरीखे अपराध करने वाले किसी भी सूरत में क्षमा के पात्र नहीं हैं। साथ ही जब राष्ट्रीय हितों को कुचलने के लिए यदि कोई हरकत की जाती है तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह राज्य के संवैधानिक प्रावधानों का भी मखौल उड़ाती है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो कुछ भी घटित हुआ, वह पूरी तरह से असंगत था। वहां उन आतंकियों की याद में आजादी के नारे लगाए गए थे, जिन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक में जिरह के बाद फांसी पर लटकाया गया था। उस देश के पक्ष में नारेबाजी करना, जिसके साथ हमारे संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं हैं या अफजल गुरू की करामात को महान समर्पण बताकर उसका समर्थन करना कतई अपेक्षित नहीं था और न ही यह हरकतें कानून की परिधि में आती हैं। जब केजरीवाल या इस कुनबे के अन्य लोग अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए इन प्रदर्शनों के समर्थन में उतर आते हैं, तो क्या यह जरूरी है कि उन हरकतों के प्रति राज्य सहिष्णुता दिखाए? क्या अब संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन या फिर देश के नागरिकों की गैर कानूनी गतिविधियों को रोकने के संदर्भ में सहिष्णुता की एक अंतिम सीमा तय नहीं की दी जानी चाहिए? क्या यह तय सीमा अंतिम सीमा नहीं होनी चाहिए?

विवादों का अब एक नया कारण उभरकर सामने आया है, जिसमें गोरक्षा में जुटे लोग खूब हल्ला-गुल्ला काट रहे हैं और गोमांस खाने वाले इसका प्रचार कर रहे हैं। संविधान में भी गाय के संरक्षण के लिए प्रावधान हैं और बड़ी संख्या में राज्यों ने भी इसे क्रियान्वित किया है। लंबे समय से चले आ रहे इन कानूनों पर आपत्ति जताने का किसी को कोई हक नहीं है, फिर चाहे वह हमारी प्राथमिकताओं से मेल खाएं या न खाएं। लेकिन गाय को जानवरों की रक्षा का प्रतीक बनाना बंद किया जाना चाहिए, जैसा कि मुसलमान भी सूअर के मांस को परोसे जाने के बाद करते हैं। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि कुछ एयरलाइंज अपने यात्रियों को आश्वासन देती हैं कि उन्हें हलाल मांस उपलब्ध करवाया जाएगा, जबकि हिंदुओं या अन्य समुदायों के लोगों के लिए इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं होती, क्योंकि उन्हें सहिष्णु जो माना जाता है। ऐसे विवादाग्रस्त बिंदुओं को सहिष्णुता के साथ शांत किया जाना चाहिए, न कि आग में घी डालकर उसे भडक़ाना चाहिए।

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में दुष्कर्म की जो घटना घटी, वह सन्न कर देने वाली है। मां-बेटी को अगवा करके उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म को अंजाम दिया गया। चूंकि मामले के आरोपी अन्य समुदाय से संबंधित थे, इसलिए मंत्री आजम खान ने इसे एक झटके में भाजपा का षड्यंत्र करार दे दिया। भाजपा हो या कोई दूसरा राजनीतिक दल, किसी को भी दुष्कर्म या हत्या सरीखे जघन्य अपराधों को सियासी बढ़त के अवसर के तौर पर देखने से बचना होगा। मेरे विचार में इन उथल-पुथल भरे हालात में जरूरी हो गया है कि दुष्कर्म सरीखे गंभीर किस्म के अपराध की प्रवृत्ति पर जोरदार प्रहार किया जाए और इस तरह के अपराधों के लिए किसी तरह की सहिष्णुता नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य के प्रमुख हैं और देश के सम्मान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे ही कई अन्य नेता हैं, जो आदर के योग्य हैं। इसके बावजूद हर दिन प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्द बके जा रहे हैं और दोषियों पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जा रही है। अभी हाल ही में आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष और आशीष खेतान ने ट्विटर पर पोस्ट कर कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मानसिक संतुलन खो चुके हैं। ऐसी टिप्पणी के लिए उन्हें सुधार गृह भेजा जाना चाहिए था। विश्व के किसी भी देश में इस कद्र खुले तौर पर गाली-गलौज का माहौल देखने को नहीं मिलता है और न ही इसके लिए क्षमा मिलती है। यदि बिना तुक या कारण के इस तरह के अमर्यादित शब्द सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे हैं, तो इसका यही मतलब निकलता है कि सहिष्णुता का मुखौटा पहनने का ढोंग अब काफी हो गया। इस तरह की असभ्य अभिव्यक्तियों के खिलाफ सख्त फटकार या सजा सरीखे कदम उठाने होंगे। मेरा मानना है कि हम लोगों ने बहुत सहिष्णु बन लिया। अब उन चीजों के प्रति सार्वजनिक तौर पर असहिष्णु बनने का समय है, जो साफ तौर पर निंदनीय हैं और सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करती हैं। यदि कोई व्यक्ति दुष्कर्म, हत्या, राजद्रोह या फिर घोर असभ्य भाषा का इस्तेमाल सरीखे अपराधों में लिप्त पाया जाता है, तो उसके प्रति रत्ती भर सहिष्णुता नहीं दिखाई जानी चाहिए। इन गैर कानूनी और अपमानजनक गतिविधियों में कमी लाने के लिए असहिष्णुता बरतना बेहद आवश्यक है।