समझने की आवश्यकता है : क्या है डॉपिंग का इलाज

  • 2016-08-01 07:00:07.0
  • अभिषेक कुमार

समझने की आवश्यकता है : क्या है डॉपिंग का इलाज

वैसे तो हाल में सबसे ज्यादा चर्चा ओलंपिक में हिस्सा लेने जा रहे 387 रूसी खिलाडय़ों के दल की रही है, जिनमें से 105 खिलाड़ी प्रतिबंधित दवाओं केसेवन की जांच करने वाले डोप टेस्ट में पकड़े गए। फिर, अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आइओसी) ने समूचे रूसी दल पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव भी दे दिया था, हालांकि बाद में इसमें कुछ नरमी के संकेत दिए गए और सिर्फ डोपिंग के दोषी खिलाडिय़ों को दल से बाहर रखने पर सहमति बनी है। पर इस विदेशी किस्से के साथ कदमताल करती कुछ खबरें हमारे देश से भी सामने आई हैं। ओलंपिक शुरू होने से कुछ ही दिन पहले हमारे दो खिलाड़ी नरसिंह यादव और इंद्रजीत सिंह राष्ट्रीय डोपिंग निरोधक एजेंसी (नाडा) द्वारा कराई गई जांच में नाकाम हो गए हैं, जिससे इन्हें ओलंपिक दल में भेजा जाना संदिग्ध हो गया है। नरसिंह का आरोप है कि उनके साथ साजिश हुई है और भारतीय कुश्ती संघ ने भी उनके इस आरोप की सीबीआइ जांच कराने की मांग की है। नरसिंह यादव के साथ सहानुभूति के बावजूद इस बारे में अंतरराष्ट्रीय कायदों और नाडा के नियमों की अवहेलना नहीं की जा सकती। ओलंपिक या इसी तरह के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में हमारे खिलाड़ी किसी डोप टेस्ट में न फंस जाएं, इसके लिए जरूरी है कि घर पर ही सारी चीजें ठीक कर ली जाएं। आज भले ही भारतीय कुश्ती संघ नरसिंह के पक्ष में खड़ा है, उनके गांव के लोग प्रधानमंत्री मोदी तक से अपील कर रहे हैं कि नरसिंह को एक साजिश का शिकार मानते हुए उन्हें ओलंपिक में जाने की इजाजत दे दी जाए, लेकिन साजिश की आशंका के बावजूद उन्हें ओलंपिक में भेजना भारतीय ओलंपिक संघ के लिए एक मुश्किल काम होगा। नरसिंह को ओलंपिक में भेजने की जिद करने के बजाय यह समझने की कोशिश होनी चाहिए कि हमारे खेल संघ और भारतीय खेल प्राधिकरण देश में ऐसा माहौल बनाने में क्यों नाकाम रहे हैं कि खिलाड़ी प्रतिबंधित ताकतवर दवाओं को लेने से बाज आएं। और यदि ऐसा साजिशन किया जा रहा है तो यह और भी शर्मनाक है कि इस साजिश को भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के अहाते में अंजाम दिया गया है।


यह उल्लेखनीय है कि डोपिंग के ऐसे मामले सिर्फ विदेशों में नहीं हो रहे हैं। बल्कि ताकतवर दवाएं लेकर अपना खेल-प्रदर्शन सुधारने की चेष्टा अपने देश में कई खिलाड़ी करते रहे हैं। इस मामले में धाविका सुनीता रानी का किस्सा काफी चर्चित है, जिन्हें नेड्रोलॉन नामक दवा के सेवन के संदेह में बुसान एशियाड के दो पदकों की वापसी तक काफी जलालत सहनी पड़ी थी। आस्ट्रेलिया में 2006 में संपन्न हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय खेल बिरादरी को तब शर्मनाक स्थितियों का सामना करना पड़ा था, जब दो भारतीय वेटलिफ्टर डोपिंग के दोषी पाए गए थे। एडविन राजू और तेजिंदर सिंह के दो नमूनों को वल्र्ड एंटी डोपिंग एजेंसी की जांच में पॉजिटिव पाया गया था।

हाल के दशक में क्रिकेट जैसे जेंटलमैन खेल में भी डोपिंग ने जोर पकड़ा है। कुछ वर्ष पूर्व आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी शेन वॉर्न को डोपिंग का दोषी पाया गया था और उन पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध भी लगा था। उस वक्त वॉर्न ने कंधे की चोट का हवाला देकर प्रतिबंधित दवा ड्यूरेटिक्स श्रेणी की हाइड्रोक्लोरोथायजाइड और एमिलोराइड टेबलैट्स लेने की बात कह कर डोपिंग के आरोप से बचने की कोशिश की थी, पर उनकी दलील सही नहीं मानी गई थी। क्रिकेट में वॉर्न प्रतिबंधित ड्रग सेवन के अकेले दोषी नहीं रहे; इयान बाथम, डियोन नैश, एडम परोरे, शेन थॉम्प्सन, मैथ्यू हार्ट, फिल टफेल और डी. स्पेंसर जैसे दूसरे क्रिकेटर पहले ही इस मामले में पकड़ में आ चुके थे। शोएब अख्तर और मोहम्मद आसिफ समेत कई पाकिस्तानी क्रिकेटर भी ऐसी अनैतिक कोशिशों में फंसे पाए गए।

इसी तरह टेनिस जैसे शानदार खेल पर भी डोपिंग के बदनुमा छींटे पड़ चुके हैं। इस साल के आरंभ में रूसी टेनिस स्टार मारिया शारापोवा आस्ट्रेलियाई ओपन के दौरान डोप टेस्ट में फेल हो गई थीं। उनका कहना था कि डायबिटीज के कारण वे 2006 से ही मेल्डोनियम दवा का सेवन कर रही थीं। पांच बार की ग्रैंड स्लैम चैंपियन रह चुकी इस खिलाड़ी के निलंबन से पूरा खेल जगत स्तब्ध रह गया था, लेकिन उसने दवा लेने की बात स्वीकार की और कहा था कि इसके प्रतिबंधित होने की जानकारी उसे नहीं थी। इंटरनेशनल टेनिस फेडरेशन के मुताबिक प्रतिबंधित दवा के सेवन के लिए खिलाड़ी खुद जिम्मेदार होता है और खिलाडिय़ों को दिसंबर 2015 में ही पांच बार इस दवा के बारे में चेता दिया गया था। प्रतिबंधित सूची में यह दवा अनायास शामिल नहीं हो गई थी। पचास से ज्यादा विविध खेलों के खिलाड़ी इसका सेवन करते पाए गए थे। इससे खिलाडिय़ों के प्रदर्शन पर असर भी पड़ता दिखा।

यही नहीं, पिछले साल अक्तूबर में ही चर्चा थी कि मेल्डोनियम को प्रतिबंधित दवाओं की सूची में डाला जा सकता है। एक जनवरी से तो वह इस सूची में शामिल भी हो गई थी। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि शारापोवा इस सूचना के लिंक को नजरअंदाज कर गईं और उन्हें बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ा। यों कहना मुश्किल है कि खिलाड़ी और उनके कोच ताकतवर प्रतिबंधित दवाओं के बारे में जागरूक नहीं होंगे। कई खिलाड़ी तो खेल संघों और प्राधिकरणों को यह जानकारी तक नहीं देते कि किस वक्त वे कहां होंगे। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि कोई डोपिंग-रोधी एजेंसी उसी स्थान पर पहुंच कर उनका डोप टेस्ट न ले ले।

मुश्किल यह है कि कई बार बेहद प्रतिष्ठित खिलाड़ी भी प्रतिबंधित दवाओं का जान-बूझकर सेवन करते हैं। कुछ ही अरसा पहले अमेरिकी टीवी के चर्चित टॉक शो में ओपरा विन्फ्रे के सामने मशहूर साइकिलिस्ट लांस ऑर्मस्ट्रांग ने डोपिंग यानी प्रतिबंधित दवाओं के सेवन की स्वीकारोक्ति की थी। जानलेवा बीमारी कैंसर से जुझारू ढंग से उबरने के बाद रिकॉर्ड सात बार टुअर डि फ्रांस का खिताब 1999 से 2005 तक लगातार अपने नाम करने वाले ऑर्मस्ट्रांग पूरी दुनिया में सम्मान के पात्र रहे हैं। लेकिन ऑर्मस्ट्रांग को अपने किए की सजा मिल गई। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आइओसी) ने उनसे वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक में जीता कांस्य पदकछीन लिया। अंतरराष्ट्रीय साइकिलिंग यूनियन (यूसीआइ) भी उन्हें डोपिंग का दोषी करार देते हुए टुअर डि फ्रांस के सातों खिताब उनसे पहले ही छीन चुकी थी, हालांकि इस कार्रवाई के बाद भी लंबे समय तक ऑर्मस्ट्रांग खुद को बेकसूर बताते रहे। लेकिन यूसीआइ ने उनकी दलीलों को सही नहीं माना और एक अगस्त 1998 के बाद के उनसे वे सारे खिताब भी छीन लिए जो उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीते थे।

बहरहाल, ये सभी घटनाएं साबित करती हैं कि खेलों को डोपिंग यानी प्रतिबंधित दवाओं के बल पर सफलता पाने वाले खिलाडिय़ों से छुटकारा दिलाना आसान नहीं है। अपने देश में ऐसा न हो, इस उद््देश्य से वर्ष 2009 में राष्ट्रीय डोपिंग एजेंसी (नाडा) का गठन किया गया था। वर्ष 2013 में एक आरटीआइ-आवेदन के जवाब में नाडा ने बताया कि पांच साल के अंतराल (2009-2013 के बीच) में ही देश में करीब पांच सौ एथलीट डोप टेस्ट में फेल पाए गए। इन खिलाडिय़ों को एंटी डोपिंग नियमों के उल्लंघन का दोषी पाते हुए एंटी डोपिंग डिसिपिलिनरी पैनल (एडीडीपी) ने चार सौ तेईस खिलाडिय़ों को दंडित किया, जिनमें सबसे अधिक संख्या ट्रैक एंड फील्ड के एथलीटों की थी, जबकि दूसरे स्थान पर वेटलिफ्टर थे।

वैसे तो आज हर बड़े खेल आयोजन से पहले खिलाडिय़ों के रक्त और मूत्र की जांच से शक्तिवर्धक प्रतिबंधित दवाओं के सेवन की धरपकड़ आधुनिक तकनीकों की बदौलत आसान हो गई है। लेकिन एक सच्चाई यह है कि खिलाड़ी, कोच, खेल संघ और यहां तक कि कुछ देश भी पदक तालिका में आगे रहने के लालच में डोपिंग का सहारा लेने के लिए तरह-तरह की तरकीबें भिड़ा रहे हैं। प्रतिबंधित दवाएं लेने के अलावा वे ब्लड डोपिंग (यानी किसी प्रतियोगिता से ठीक पहले प्रयोगशाला में सुरक्षित रखवाया गया अपना रक्त चढ़वाना जिससे कि शरीर में आक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता में कई गुना इजाफा हो जाए) और जीन डोपिंग जैसे आधुनिक चोर रास्तों का इस्तेमाल कर डोप टेस्ट (प्रतिबंधित दवाओं के सेवन आदि की धरपकड़ की जांच) से बचने का प्रयास कर रहे हैं। कई कोच खुद ऐसी दवाएं खिलाडिय़ों को देते हैं। इस मामले में प्रख्यात वेटलिफ्टर और बेलारूस के कोच लियोनिद तारानेंको का नाम उल्लेखनीय है, जिन पर आरोप लगा था कि उन्होंने अपनी टीम के खिलाडिय़ों को जान-बूझ कर प्रतिबंधित दवाएं दी थीं।

इस दशा में कोई सुधार तभी संभव है, जब खेलों में भाग लेने वाले देश, खेल संगठन और खिलाडिय़ों के कोच सभी मिलकर खेल भावना का आदर करें और उन खिलाडिय़ों पर नजर रखें जो ऐसे कुत्सित प्रयास कर खेलों में गंदगी फैलाने का काम कर सकते हैं। डोपिंग के दोषी खिलाडिय़ों को दी जाने वाली सजाएं इस मर्ज को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं क्योंकि उनकी हरकत पता लगने और उन्हें पदकमिल जाने के बाद उन पर कार्रवाई करने में लंबा अरसा बीत जाता है। तब तक वह खिलाड़ी अपनी सफलता के बल पर काफी धन और ख्याति कमा चुका होता है जबकि उसकी ऐसी हरकत के कारण जीत के असली हकदार कुंठित होकर खेलना तक छोड़ चुके होते हैं।