जब महाराजा हरिसिंह ने इंसाफ को अपना मजहब घोषित किया

  • 2016-08-07 08:30:35.0
  • उगता भारत ब्यूरो

जब महाराजा हरिसिंह ने इंसाफ को अपना मजहब घोषित किया

प्रो. भीमसिंह

जब से दुनिया बनी है तब से अनेकानेक राजेमहाराजे और राजकुमार हो गये उनमें से अनेको ंने गरिमा और गौरव के साथ राज्य किया, लेकिन फिर भी दुनिया के किसी हिस्से से किसी एक शाक ने इतना साहस नही दिखाया कि वह इंसाफ को ही अपना मजहब घोषित कर दे। 9 जुलाई 1925 को अपनी ताजपोशी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने घोषित किया इंसाफ ही मेरा मजहब है। इससे अनेकों मजहबी अलम्बदार नाराज हो गये फिर भी हरिसिंह अपने अहद पर कायम रहे।

1927 में महाराजा हरिसिंह ने शाही हुक्म जारी किया जिसके द्वारा राज्य के बाशिंदों स्टेट सब्जेक्टस जिसका अभी दोबारा नामकरण स्थायी निवासी किया गया के लिए एक महान क्रांतिकारी विधान बनाया गया। कश्मीर के महाराजा की यह कितनी महान परिकल्पना थी और ऐसे वक्त में जबकि कोई मजहबी टकराव नही था और न ही कोई अंदरूनी तनाव था हालांकि गिलगित से कश्मीर तक 86 फीसदी आबादी मुस्लिम समुदाय की थी महाराजा हरिसिंह की यह धारण अतुलनीय दूरदर्शिता को प्रदर्शित करती है जिसके द्वारा जम्मू-कश्मीर के वाशिंदों की न केवल जमीन जायदाद की रक्षा हो सकी
, लेकिन लद्दाखियों कश्मीरियों बस्तियों डोगरों और अन्य लोगों की पहचान को बचाये रखने का एक स्थायी तंत्र कायम किया। अगर ऐसा विधान नही होता तो खासकर कश्मीरियों ने न केवल अपनी जमीन जायदाद खो दी होती बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान भी गुम हो जाती। लोगों में यह एक मिथ्या धारणा है कि भारतीय संविधान की धारा
370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर के बाशिंदों की पहचान और जमीन की रक्षा हो सकी जबकि यह धारणा सरासर गलत है। कश्मीरियों कीपहचान और जायदाद कीरक्षा महाराजा हरिसिंह द्वारा 1947 में बनाये गये बेमिसाल कानून द्वारा हो सकी।

1928 में महाराजा हरिसिंह की एक अन्य राजाज्ञा के द्वारा जम्मू-कश्मीर में उच्च न्यायालय की स्थापना की गयी। उच्च न्यायालयों को जम्मू-कश्मीर के लोगों के नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की रक्ष के लिए जिम्मेदार बनाया गया और सेशन जजों को इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण यािचका सहित अन्य याचिकाओं को सुनने के अधिकार दिये गये।

जम्मू-कश्मीर शायद भारत से पहला रजवाहा था, जिसने तमाम सार्वजनिक स्थानों मंदिरों कुंओं आदि को हरेक नागरिक के लिए खुलवा दिया, जिनमें दलित वर्ग के लोग भी शामिल थे जिन्हें अब अनुसूचित जाति कहा जाता है। महाराजा हरिसिंह ने छुआछूत को एक जुर्म घोषित कर दिया और बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाया साथ ही वेश्यावृत्ति तथा नशीले पदार्थों के इस्तेमाल पर भी रोक लगायी। महाराजा ने एक आध्यादेश के द्वारा बलिस्तान से औरतों को दूसरे क्षेत्रों में ले जाने पर प्रतिबंध लगाया।

सन 1934 में महाराजा हरिसिंह ने संसदीय प्रणाली का आगाज किया और राज्य सासंद यानि प्रजा सभा के चुनाव करवाए। कुछ कानूनी दिग्गजों और मिर्जा अफजल वेग जैसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया। जम्मू-कश्मीर पहला ऐसा राज्य था जिसने महाराजा हरिसिंह के नेतृत्व में एक स्वतंत्र संविधान को विकसित किया जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों प्रजा सभा के सदस्यों और स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की अवधारणा की गयी।

ये महाराजा हरिसिंह ही थे जिन्होंने कश्मीर को दुनिया के नक्शे पर उजागर किया उन्होंने ही पहलगाम, गुलमर्ग, डाचिगाम आदि को अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन के लिए विकसित किया। यह तो इतिहास के छात्र भी स्वीकार करेंगे कि

1947 के बाद कश्मीर में किसी भी स्थल को विश्व पर्यटन के लिए विकसित नही किया गया।

पूरी तरह से सत्ता संपन्न होते हुए भी महाराजा ने आश्वस्त किया कि विरोधियों को उनके प्रशासन अथवा पुलिस द्वारा न तो परेशान किया जाएगा न कोई नुकसान पहुंचाया जाएगा। शेख मौहम्मद अब्दुल्ला मिर्जा अफजल वेग और अन्य अनेक नेता महाराजा के विरूद्घ अभियान चला रहे थे लेकिन महाराजा के प्रशासन की ओर से किसी भी तरह उनको दबाया कुचला नही गया।

1846 से 1947 के 101 साल के महाराजा हरिसिंह अथवा किसी अन्य डोगरा शासक के शासन के दौरान एक भी हिरासती मौत का उदाहरण नही है।

1931 में कश्मीर में एक उपद्रवी भीड़ पर पुलिस को गोली चलानी पड़ी और उसमें कई लेाग मारे गये। महाराजा हरसिंह ने अपनी ओर से ग्लांसी कमीशन में एक ब्रिटिश अधिकारी को इसकी जांच करने के आदेश दिये। इस कमीशन की सिफारिशों पर कुछ ही महीनों में अमल करके दोषी पुलिसकर्मियों को सजा दी गयी। क्या आज के तथाकथित किसी लोकतंत्रीय शासन में महाराजा के शासन में इंसाफ दिलाने के सिस्टम का मुकाबला किया जा सकता है

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महाराजा हरिसिंह ने अपनी लोकतंत्रवादी और राष्ट्रवादी आस्था को सही साबित किया जब विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए वे महारानी और अपने पुत्र युवराज कर्णसिंह को श्रीनगर से जम्मू तक स्वयं गाड़ी चलाकर ले गये। श्री वीपी मेनन ने महाराजा से जम्मू आकर विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने की गुजारिश की थी। अनेक इतिहासकार और राजनीतिज्ञ महाराजा पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने

14 अगस्त 1947 से पहले विलयपत्र पर हस्ताक्ष्ज्ञर करने में विलंब किया। अगर महाराजा ने पहले विलयपत्र पर हस्ताक्षर कर दिये होते तो वही आलोचक उन पर जल्दी करने का आरोप लगाते। उस वक्त के जानेमाने राजनीतिज्ञ और कश्मीरी मुसलमानों के नेता शेख अब्दुल्ला ने महाराजा का विरोध करने के लिए शायद जिन्ना के साथ हाथ मिला लिया होता। यह स्थिति कश्मीर के लोगों की भावनाओं के अनुरूप नही होती और ना ही वे भारत संघ के पक्ष में काम करती। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि बुद्घिवेत्ताओं
, खासकर इतिहासविदों ने महाराजा हरिसिंह की महान बुद्घिमत्ता को महसूस हीनही किया। जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान सरकार ने 16 अगस्त 1947 को महाराजा के साथ युद्घ नही समझौता किया था
, लेकिन पाकिस्तान ने अपने ही समझौते का उल्लंघन करते हुए कश्मीर को हड़पने के लिए जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। पाकिस्तान के हमले का मुकाबला करने के लिए जम्मू-कश्मीर के लोग एकजुट होकर खड़े हो गये। 26 अक्टूबर 1947 को बारामूला के बाहरी इलाकों में महान डोगरा नायक ब्रि. राजेन्द्रसिंह ने अपने 125 डोगरों सैनिकों की कुर्बानी दी। पाकिस्तानी हमलावरों के गुस्से से जम्मू-कश्मीर के लोगों को बचाने के लिए ही महाराजा को भारत संघ में विलय की प्रक्रिया को तेज करना पड़ा।

भारत के प्रति महाराजा और उनकी प्रतिबद्घता की महानता इसी में थी कि उन्होंने और उनके परिवार ने तमाम बेइज्जती और शर्मिंदगी को सहन किया, जो विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने के बा उनके सामने पेश आयीं।

महाराजा हरिसिंह को देश निकाले पर मजबूर किया गया और अपने गृह राज्य जम्मू-कश्मीर को छोडक़र 14 साल तक उन्होंने बंबई में निर्वासन व्यतीत किया

, लेकिन एंग्लो-अमेरिकन घड़े के द्वारा भडक़ाए जाने और अनेक प्रलोभन दिये जाने के बावजूद महाराजा ने भारत संघ में जम्मू-कश्मीर के विलय को रद्द घोषित नही किया। महाराजा हरिसिंह का 66 साल की कम उम्र में बंबई में इंतकाल हो गया और जम्मू-कश्मीर के लिए वे एक स्पष्ट संदेश छोड़ गये कि उनका भविष्य भारत के साथ रहने में ही सुरक्षित है।

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