भारतीय दृष्टि व एकता के प्रतीक हैं शिवाजी

  • 2016-12-31 06:30:56.0
  • प्रो. एनके सिंह

भारतीय दृष्टि व एकता के प्रतीक हैं शिवाजी

शिवाजी स्मारक के निर्माण को लेकर देश के कई तथाकथित सेकुलर और उदारवादी लोगों ने विरोध में हल्ला काटना शुरू कर दिया कि इस परियोजना में 3600 करोड़ रुपए खर्च करने की क्या जरूरत थी? ये राष्ट्रीय गौरव और मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीक हैं, जिनसे इनका अनुसरण करने वालों को भी प्रेरणा मिलती है। ऐसी चीजों को पैसों के तराजू पर कभी तौला ही नहीं जा सकता, क्योंकि समर्पण, स्नेह या शौर्य ऐसे गुण हैं, जिन्हें सिक्कों के तुच्छ भाव से कभी मापा ही नहीं जा सकता.

हाल ही में हम शिवाजी महाराज के अदम्य साहस और दृष्टि को श्रद्धांजलि अर्पित करने और उनके जीवन से प्रेरणा लेने के लिए एक आकर्षक प्रतिमा की स्थापना से जुड़ी महत्त्वाकांक्षी परियोजना के लोकार्पण के साक्षी बने हैं। इसे दुखद ही माना जाएगा कि इसके बाद देश के कई तथाकथित सेकुलर और उदारवादी लोगों ने हल्ला काटना शुरू कर दिया कि इस परियोजना में 3600 करोड़ रुपए खर्च करने की क्या जरूरत थी? इस धन को शिक्षा, स्वास्थ्य या फिर नए रोजगार के सृजन के लिए भी तो खर्च किया जा सकता था। इसमें दो राय नहीं कि यह एक बड़ी राशि है और बजट में ऐसे व्ययों पर विचार करना लाजिमी हो जाता है, लेकिन सवाल यह कि यह खर्च एक प्रतिमा पर ही क्यों किया गया? यह इसलिए कि ऐसे स्मारक राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाने के उद्देश्य से बनवाए जाते हैं, जो कि हमें हमारे राष्ट्रीय नायकों के पराक्रम और उनके जीवन मूल्यों से रू-ब-रू करवाते हैं।
एक बार मैं अब्राहम लिंकन स्मारक में गया। विश्व के एक शक्तिशाली लोकतंत्र के निर्माण हेतु महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले एक महान नेता की प्रतिमा को देखकर मैं वहां कुछ समय के लिए बड़ी श्रद्धा व आदर भाव से खड़ा रहा। ये प्रतीक राष्ट्रीय गौरव और मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनसे इनका अनुसरण करने वालों को भी प्रेरणा मिलती है। ऐसी चीजों को पैसों के तराजू पर कभी तौला ही नहीं जा सकता, क्योंकि समर्पण, स्नेह या शौर्य ऐसे गुण हैं, जिन्हें सिक्कों के तुच्छ भाव से कभी नहीं मापा जा सकता। जब अमरीका में लिबर्टी स्टैच्यू की स्थापना की जा रही थी, तो उस समय वहां किसी ने भी उसकी लागत के बारे में सवाल नहीं किया था और न ही किसी ने यह उपदेश झाड़ा था कि उस पैसे का कहीं और सदुपयोग कैसे किया जा सकता है।
एक हद तक हमारी अज्ञानता के कारण ही मूर्खतापूर्ण पंथनिरपेक्षता की ऐसी अवधारणाएं पैदा होती हैं। हम समझ नहीं पा रहे हैं कि एक प्रतिमा की प्रतिष्ठा से किन उद्देश्यों की प्राप्ति हो सकेगी। जब हम देश में गांधी, नेहरू या सुभाष चंद्र बोस के किसी स्मारक को देखकर राष्ट्रीय गौरव की अनुभूति करते हैं, तो उसके आगे उनके निर्माण पर खर्च हुए धन के कोई मायने नहीं रह जाते। भारत शुरू से ही आदर्शों और आदर्शों को पूजने वालों का देश रहा है। इतना ही नहीं, भारतभूमि में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सरीखे श्रेष्ठ मूल्यों को असंख्य मंदिरों और देवी-देवताओं की मूर्तियों के रूप में संजोने का भी प्रयास किया गया है। इन हजारों वर्ष पुरानी मूर्तियों में सत्यम-शिवम-सुंदरम् या ऐसे न जाने कितने ही उच्च आदर्श वाक्य गहराई तक समाए हुए हैं। अगर हम समझने की कोशिश करें, तो पाएंगे कि ये सब चीजेंकई मायनों में विशिष्ट हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज भी इन्हीं महान भारतीय आदर्शों में से एक थे, जो हर तरह की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय एकता व अस्मिता के लिए खड़े रहे। इस सबसे बढक़र वह करुणा सरीखे मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए डटे रहे। वह उस दौर के एकमात्र ऐसे योद्धा थे, जो हिंदू राष्ट्र के लिए लड़ते रहे, लेकिन इससे पंथनिरपेक्षता में भी उनकी आस्था में कभी कमी नहीं आई। उन्होंने अपनी आस्था और राज्य की जिम्मेदारी के बीच अंतर को बखूबी रेखांकित कर रखा था। इसी कारण उनके राज्य में अन्य मतावलंबियों को भी पूरी तरह से पांथिक स्वतंत्रता मिली हुई थी। यहां तक कि उनके प्रति पूर्वाग्रह रखने वाले खफी खान ने भी कहा था, 'शिवाजी अपने राज्य क्षेत्र में आने वाले लोगों के सम्मान की रक्षा के लिए हमेशा संघर्षरत रहे।' अपने सैन्य एवं रणनीतिक अभियानों के दौरान वह किसी तरह के अमर्यादित आचरण से दूर ही रहे। इस दौरान जब कुछ मुस्लिम महिलाएं व बच्चे उनकी गिरफ्त में आ गए थे, तो भी उन्होंने उनके सम्मान पर आंच तक नहीं आने दी। सेना को उनकी तरफ से स्पष्ट आदेश दिया गया था कि फिरौती मांगने के लिए जब लोगों को बंदी बनाया जाए, तो किसानों व महिलाओं को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचाया जाए। जो सिपाही उनके आदेशों की अवहेलना करते थे, उन्हें कड़ी सजा दी जाती थी। प्रख्यात इतिहासकार अब्राहम एराली ने कहा है कि अपने सफर को मंजिल तक पहुंचाने के लिए शिवाजी ने हिंदू व मुस्लिम संतों की संगत का सहारा लिया था। उनका विश्वसनीय सचिव मुस्लिम काजी हैदर था। एराली ने यह भी लिखा है, 'शिवाजी का हिंदुत्व में गहरा विश्वास होने के बावजूद वह औरंगजेब की तरह मजहब को लेकर कट्टर नहीं थे। वह निश्चित तौर पर धर्मांध नहीं थे। वह एक हिंदू थे, जिसके साथ वह किसी तरह का समझौता करने को राजी नहीं थे, लेकिन यह भी सच है कि अपने धर्म के साथ-साथ वे दूसरों की धार्मिक आस्थाओं का भी उतना ही सम्मान करते थे। इस सबसे कहीं बढक़र उस समय के कर्कश और निर्दयता के माहौल में धार्मिक संवेदनशीलता और लूटपाट के बावजूद सत्यनिष्ठा की भावना उनमें काफी गहरे तक समाई हुई थी।'
शिवाजी की सेना में कई मुस्लिम सैनिक व सेनापति भी भर्ती थे। रायगढ़ स्थित अपने राजभवन के ठीक पीछे उन्होंने इनके लिए एक मस्जिद का भी निर्माण करवाया हुआ था। उनके मुस्लिम गुरु केल्सी के बाबा यकूत थे। कई क्रूर मुगल शासकों के विपरीत अपने जीवन काल में उन्होंने कभी मस्जिदों को नहीं उजाड़ा। जब कभी कुरान उनके हाथों में आई, तो उन्होंने इसे पूरे सम्मान के साथ मुस्लिमों के हवाले कर दिया।
नवाचार व दृष्टि के धनी इस महान शासक ने एक दौर में समूचे दक्कन क्षेत्र पर शासन किया। एक बड़ी टोली के रूप में भारत पर शासन करने वाले विशाल मुगल साम्राज्य ने ब्रिटिश या विदेश से आने वाली अन्य ताकतों के साथ मिलकर समुद्री सेना गठित करने का कभी विचार भी नहीं किया था, लेकिन उस समय इस योद्धा ने इसे भी मुमकिन कर दिखाया।