अब यह सच पढ़ाया जाए कि सुभाष बाबू ने अंग्रेजों को भगाया

  • 2016-11-13 10:30:53.0
  • उगता भारत ब्यूरो

अब यह सच पढ़ाया जाए कि सुभाष बाबू ने अंग्रेजों को भगाया

मोदी सरकार ने सुभाष बाबू से संबंधित सभी गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर दिया है। अब उनका कर्तव्य है कि सुभाष बाबू के साथ राजनेताओं व इतिहासकारों द्वारा किए गए अन्याय से उन्हें न्याय दिलवाए।

कांग्रेस के हाथों में सत्ता का हस्तांतरण इसलिए नहीं हुआ था कि उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से भगाया था। उनके हाथों सत्ता का हस्तांतरण इसलिए हुआ था कि उन्होंने 1945 के केंद्रीय असेंबली का चुनाव इस आश्वासन के आधार पर जीता था कि देश का विभाजन कांग्रेस कभी नहीं होने देगी। इससे पहले 1942 के कांग्रेस के 'भारत छोड़ो आंदोलन' को पूर्णत: विफल करने के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विन्सेंट चर्चिल ने गर्व के साथ कहा था, 'मैं महामहिम सरकार का प्रधानमंत्री इसलिए नहीं हूँ कि ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त कर दूँ।'
3 जून, 1947 को प्रधानमंत्री सर क्लीमेंट एटली ने ब्रिटेन की संसद् में इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट संसद् पटल पर रखा, तब विपक्ष के नेता विन्सेंट चर्चिल ने प्रधानमंत्री सर एटली से प्रश्न किया कि इस कानून को पास करने के अलावा कोई विकल्प नहीं कि भारतवर्ष को स्वाधीन न करके ब्रिटेन के लिए बचाया जा सके। ब्रिटेन के हाथ से भारतवर्ष निकला जा रहा है। इससे अत्यंत दु:खी सर एटली अधिक कुछ नहीं कह सके। सर चर्चिल ने प्रश्न का उत्तर सिर्फ दो वाक्यों में दिया—भारतवर्ष को स्वतंत्रता प्राप्त करने का कारण वहाँ की सेना सिर्फ रोटी के लिए अंग्रेजों की वफादार नहीं रही एवं ब्रिटेन के पास वह शक्ति नहीं है कि हिंदुस्तानी सेना को अपने नियंत्रण में रख सके।
हिरोशिमा और नागासाकी पर अणुबम गिराने के बाद जब जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया तब 15 अगस्त, 1945 को सुभाष बाबू ने कहा था—हमारी आजादी की लड़ाई जारी रहेगी और एक दिन हम आजाद होंगे।

आजाद हिंद आंदोलन के चलते स्वाधीनता आंदोलन में एक नई उपलब्धि हुई। रोटी-रोजी के चलते अंग्रेजों के प्रति वफादार रहनेवाली भारतीय सेना देश के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति वफादार बन गई। इसका चरम प्रहार 18 फरवरी, 1946 को देखने को मिला और यह स्वतंत्रता संग्राम का स्वर्णिम दिवस बन गया। जब भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बंबई में एच.एन.आई.एम. के ऊपर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। दूसरी तरफ यह विद्रोह नौसेना के 22 जहाजों व तटवर्ती नौ वाहिनी में फैल गया। 21 फरवरी, 1946 कासल बैरक में नौसेना के सैनिकों ने स्वाधीनता का प्रयत्न आरंभ कर दिया। कराची में विद्रोह आरंभ हुआ। हिंदुस्तान से ब्रिटेन की सेना पर तोपें दागी जानी लगीं। यूनियन जेक उतारकर तिरंगा झंडा फहराने लगा।
बंबई व कलकत्ता के बाद दूसरे शहर प्रतिवाद में मुखर होने लगे। अंग्रेज आतंकित हो गए। पुलिस थाना, डाकघर, ट्राम, डिपो व शराब की दुकानें जलाई जाने लगीं। वाई.एम.सी.ए. के केंद्र भी अछूते नहीं रहे।

सब मिलाकर 78 जहाज, 20 बेड़ा व 20 हजार के लगभग नौसेना के सैनिक इस विद्रोह में शमिल हुए। इसके साथ-साथ बंबई, मद्रास, पुणे, कलकत्ता, जशोहर तथा अंबाला में भारतीय वायु सेना के सैनिकों ने हड़ताल आरंभ कर दी। अंग्रेज शासक भारतीय सैनिकों के विद्रोह से थर-थर काँपने लगे।
चारों तरफ अपनी विजय के अभियान में पागल ब्रिटिश शासकों ने आजाद हिंद फौज के सेनापति व सैनिकों पर अत्याचार किए। इनको वैधानिक दंड देने की व्यवस्था कायम की। ब्रिटिश सरकार के प्रधान सेनापति ने आजाद हिंद फौज के सेनापति सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस दंड प्रक्रिया स्वरूप उत्पन्न नौसेना विद्रोह से लेकर जन विद्रोह को दबाने में असमर्थ भारतीय नेताओं को बुलाकर कहा, 'अविलंब आप लोग इस विद्रोह को शांत करवाइए। विद्रोही सैनिकों से कह दीजिए कि आजाद हिंद फौज के सेनापति व अन्य सैनिकों का कारादंड प्रधान सेनापति माफ करेंगे व भारतवर्ष को आजादी दी जाएगी।' 23 जनवरी, 1946 के दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सरदार पटेल व मुसलिम लीग के जिन्ना इस समाचार को लेकर बंबई गए एवं विद्रोही सैनिकों को आश्वासन दिया कि अविलंब आजाद हिंद फौज के सेनापति व सैनिकों की दंड प्रक्रिया बंद होगी। हम लोग जल्द ही स्वाधीनता प्राप्त करेंगे। आप लोग अपनी-अपनी जगह चले जाएँ।
स्वतंत्र भारत के राजनेताओं ने देश को आजादी दिलानेवाले सुभाष बाबू व आजाद हिंद फौज के साथ कैसा व्यवहार किया, उसको दिखाने के लिए आजाद हिंद फौज की डॉक्टर कर्नल लक्ष्मी सहगल ने मुझे 9 दिसंबर, 2004 को एक पत्र लिखा, उसके कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ—
''1947 में देश के आजाद होने के बाद से ही मैं लगातार देश के प्रधानमंत्रियों, विशेष रूप से पंडित जवाहरलाल नेहरू से संपर्क कर देश की आजादी में सुभाष चंद्र बोस और आई.एन.ए. के योगदान को मान्यता देने की माँग को लेकर संपर्क करती आ रही हूँ। यहाँ तक कि हमारे दुश्मन (ब्रिटिशों) ने खुलेआम स्वीकार किया कि हम सुभाषचंद्र बोस व आई.एन.ए. के कारण भारत को आजाद कर रहे हैं, क्योंकि उन्होंने भारतीय सेना की वफादारी बदल दी, लेकिन आज तक आई.एन.ए. को 'देशद्रोही' माना जाता है।''
—आपकी
—डॉ. (कर्नल) लक्ष्मी सहगल, आई.एन.ए.

भारतीय सैनिकों में सुभाष बाबू की लोकप्रियता को देखकर नेहरू सरकार ने सेना के बंबई मुख्यालय से 16 फरवरी, 1949 के आदेश संख्या एस 155211-1 द्वारा सुभाष चंद्र बोस की फोटो लगाने, दिखाने व चिपकाने की मनाही कर दी।
सुभाष बाबू व आजाद हिंद फौज के साथ पिछली सरकारों ने जो अन्याय किया है, मोदी सरकार को उसे तुरंत समाप्त कर आनेवाली पीढ़ी को इतिहास की सटीक जानकारी देनी चाहिए।

श्यामसुंदर पोद्दार

उगता भारत ब्यूरो ( 2474 )

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