नालंदा की विरासत हमारे अतीत का एक सेतु है

  • 2016-07-29 13:00:23.0
  • अरविंद जयतिलक

नालंदा की विरासत हमारे अतीत का एक सेतु है

यह सुखद है कि संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने वैश्विक धरोहरों की सूची में भारत के तीन नामांकनों को मंजूरी दी है, जिनमें चंडीगढ़ के कैपिटल कॉम्पलेक्स और सिक्किम के कंचनजंघा नेशनल पार्क के अलावा नालंदा विश्वविद्यालय भी शामिल है। गौरतलब है कि यूनेस्को की वैश्विक धरोहर समिति ने तुर्की के इस्तांबुल में हुई अपनी चालीसवीं बैठक में इन नामों पर मुहर लगाई है। इस पहल से नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति बढ़ेगी और वह अपनी ऐतिहासिक विरासत से दुनिया को अवगत कराएगा। उल्लेखनीय है कि बिहार स्थित नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण उसी स्थान पर हो रहा है जहां इस ऐतिहासिक अकादमिक स्थल के भग्नावशेष मौजूद हैं। ऐतिहासिक रूप से बौद्ध शिक्षा का केंद्र रहे नालंदा की एक शानदार गौरवमयी पृष्ठभूमि है। पांचवीं से सातवीं शताब्दी के मध्य यह विश्वविद्यालय अपनी ज्ञान ज्योति से संपूर्ण संसार को आलोकित करता रहा। लेकिन कालांतर में वैष्णव धर्म के उत्थान

, विश्वविद्यालय को मिलने वाले अनुदान में कमी और विदेशी आक्रमणों ने शिक्षा के इस महान केंद्र को धूल-धूसरित कर दिया।

भौगोलिक रूप से नालंदा विश्वविद्यालय दक्षिण बिहार स्थित राजगीर के समीप है। इसके ध्वंसावशेष आज भी बड़ागांव ग्राम तक फैले हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना बौद्ध संन्यासियों द्वारा की गई थी

, जिनका मूल उद््देश्य एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करना था जो ध्यान व अध्यात्म के लिए उपयुक्त हो। ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध ने नालंदा की कई बार यात्रा की थी। बहरहाल, इस विश्वविद्यालय का निर्माण कब हुआ था इसे लेकर विद्वानों में एक राय नहीं है। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों से जानकारी मिलती है कि इस विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तवंशी शासक कुमारगुप्त ने की थी।

चीनी यात्री ह्वेनसांग और अन्य बौद्ध यात्रियों ने अपने विवरणों में सम्राट कुमारगुप्त को इस विश्वविद्यालय का संस्थापक बताया है। नालंदा के उत्खनन से प्राप्त मुद्राओं से भी इसकी पुष्टि होती है। इस विश्वविद्यालय की अति प्राचीनता पर किसी को शक भी नहीं है। इसके प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। गुप्तवंशी शासक कुमारगुप्त (

414 से 455) द्वारा इस बौद्ध शिक्षा केंद्र को दान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। ह्वेनसांग ने अपने विवरण में लिखा है कि
470 ई. में गुप्त सम्राट नरसिंहगुप्त बालादित्य ने नालंदा में एक सुंदर मंदिर निर्मित करवा कर इसमें अस्सी फुट ऊंची तांबे की बुद्ध प्रतिमा को स्थापित करवाया।

चीनी यात्री इत्सिंग के विवरण से भी नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में भरपूर जानकारी मिलती है। उसने इसकी विशालता का उल्लेख करते हुए यहां छात्रों की संख्या तीन हजार बताई है। इत्सिंग के विवरण में नालंदा के अलावा विक्रमशिला विश्वविद्यालय का भी जिक्र है। आठवीं शताब्दी में पालवंशीय शासक धर्मपाल द्वारा बिहार प्रांत के भागलपुर में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। पूर्व मध्यकालीन भारत में इस विश्वविद्यालय का महत्त्वपूर्ण स्थान था। इस विश्वविद्यालय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली भिक्षु दीपंकर ने दो सौ गं्रथों की रचना की। जिस समय चीनी यात्री ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहा था

, उस समय विद्यार्थियों की संख्या करीब दस हजारऔर शिक्षकों की संख्या डेढ़ हजार थी। ऐसा कहा जाता है कि यहां के पुस्तकालय में हजारों की संख्या में पुस्तकें और संस्मरण उपलब्ध थे। उल्लेखनीय है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया तो उसने लगभग छह वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। उसके ग्रंथ सी-यू-की से तत्कालीन भारतीय समाज व संस्कृति के बारे में भरपूर जानकारी मिलती है। ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षक परिवार का हिस्सा भी था। कहा जाता है कि वह अपने साथ भारत से बुद्ध के कोई एक सौ पचास अवशेषों
, सोने, चांदी व चंदन की लकड़ी से बनी बुद्ध की मूर्तियां और करीब साढ़े छह सौ पुस्तकों की पांडुलिपियां ले गया था। यह भगवान बुद्ध में उसकी आस्था का प्रमाण है। महान विद्वान शीलभद्र नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उन्होंने अपने ज्ञानपुंज से नालंदा विश्वविद्यालय को जगत-प्रसिद्ध किया।

ह्वेनसांग ने अपने विवरण में अपने समय के महान विद्वान शिक्षकों- धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणपति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, आर्यदेव, दिगनाग और ज्ञानचंद्र आदि- का उल्लेख किया है। ये शिक्षक अपने विषयों के साथ-साथ अन्य विषयों में भी पारंगत, निपुण और ज्ञानवान थे। नागार्जुन, असंग, वसुबंधु जैसे महान बौद्ध महायानी इसी विश्वविद्यालय की उपज थे। असंग का महायान सूत्रालंकार, वसुबंधु का अभिधर्म कोश और नागार्जुन की दिव्यावदान

, महावस्तु, मंजुश्रीमूलकल्प, प्रज्ञापारमिता, शतसाहस्त्रका और माध्यमिका सूत्र जैसी रचनाएं नालंदा विश्वविद्यालय के ज्ञान की ही देन हैं। नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म व दर्शन के अतिरिक्ति न्याय, तत्त्वज्ञान, व्याकरण तथा विज्ञान की भी शिक्षा दी जाती थी।

वस्तुत: नालंदा विश्वविद्यालय के अधिकतर छात्र तिब्बतीय बौद्ध संस्कृतियों वज्रयान और महायान से संबद्ध थे। विश्वविद्यालय प्रशासन जितना कठोर था

, शिक्षा को लेकर उतना ही जागरूक, संवेदनशील और सतर्क था। यह इसी से समझा जा सकता है कि प्रवेश के इच्छुक विद्यार्थियों को पहले द्वारपाल से वाद-विवाद करना पड़ता था और फिर उसमें उत्तीर्ण होने पर ही उन्हें प्रवेश मिलता था। छात्रों को रहने के लिए छात्रावास की सुविधा उपलब्ध थी। इत्सिंग के लेखन के अनुसार यहां होने वाली चर्चाओं में सभी की भागीदारी आवश्यक थी। सभा में मौजूद सभी लोगों के फैसले पर संयुक्त रूप से आम सहमति की आवश्यकता होती थी। विश्वविद्यालय के संचालन के लिए राजाओं द्वारा विशेष अनुदान दिया जाता था। लेकिन विश्वविद्यालय के संचालन में उनका किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं था। आश्चर्य यह कि बौद्ध धर्म न अपनाने वाले शासक भी इस विश्वविद्यालय को भरपूर अनुदान देते थे। यह शिक्षा के प्रति उनकी अनुरक्ति को ही रेखांकित करता है। विश्वविद्यालय को सुचारु रूप से चलाने के लिए हर्षवर्धन ने दो सौ ग्रामों का अनुदान दिया था जिससे पर्याप्त राजस्व प्राप्त होता था। वैष्णव धर्म के अनुयायी गुप्त शासक भी नालंदा विश्वविद्यालय को भरपूर अनुदान देने में अपना गौरव समझते थे। नालंदा विश्वविद्यालय का प्रांगण बहुत बड़ा था। उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से जानकारी मिलती है कि विश्वविद्यालय में व्याख्यान के लिए छोटे-बड़े कई कमरे थे। पुरातत्त्वविदों का निष्कर्ष है कि यहां सात बड़े और तकरीबन तीन सौ से अधिक छोटे कक्ष थे। शैलेंद्र शासक बालपुत्र देव द्वारा तत्कालीन मगध के राजा देवपाल की अनुमति से नालंदा में जावा से आए भिक्षुओं के निवास के लिए एक विहार के निर्माण का भी उल्लेख है।

इस अंतरराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त विश्वविद्यालय में भारत के अलावा जावा, चीन, तिब्बत, श्रीलंका व कोरिया के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। विद्यार्थियों के बीच बौद्ध दर्शन के अलावा अन्य विषयों- इतिहास

, भूगोल, तर्कशास्त्र और विज्ञान- पर भी वाद-विवाद होता था। लेकिन बौद्ध धर्म की महायान शाखा का विशेष रूप से अध्ययन-अध्यापन होता था। शिक्षा पालि भाषा में दी जाती थी। यहां हस्तलिखित ग्रंथों का एक नौमंजिला 'धर्मगज' नामक पुस्तकालय था जो रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नाम के तीन बड़े भवनों में विभाजित था। समय जानने के लिए जलघड़ी का उपयोग होता था। इस महान बौद्ध शिक्षा केंद्र का विनाश कैसे हुआ इस पर अब भी धुंध छाई हुई है। हालांकि इसकी ऐतिहासिकता को जानने के लिए पुरातत्त्व विभाग ने कई बार उत्खनन कराया लेकिन किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका। बहरहाल
, उसके ध्वंषावशेषों से यही प्रतीत होता है कि शिक्षा का यह महान केंद्र किसी अग्निकांड का ग्रास बना। सच्चाई जो हो, नालंदा विश्वविद्यालय की पुनस्र्थापना से भारत समेत दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में मदद मिलेगी। साथ ही चीन
, जापान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, फिलीपींस, श्रीलंका, कोरिया, विएतनाम और थाईलैंड से सांस्कृतिक संबंध मजबूत करने में भी, जिनका भारत से ऐतिहासिक-सांस्कृतिक लगाव रहा है। अच्छी बात यह है कि पिछले साल हुए पूर्वी एशियाई सम्मेलन के दौरान विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की पुनस्र्थापना में मदद के लिए आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, कंबोडिया, ब्रूनेई, न्यूजीलैंड और म्यांमा ने अपनी स्वीकृति दी। शिक्षा के इस महान केंद्र के प्रति वैश्विक जगत में कितना आकर्षण है यह इसी से समझा जा सकता है कि इसके पहले ही सत्र में देश-दुनिया से दाखिले के लिए हजारों छात्रों ने आवेदन किया। गौरतलब है कि वर्ष
2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने इस प्रतिष्ठित संस्थान को पुनस्र्थापित करने का सुझाव रखा था। उसके बाद केंद्र सरकार ने नालंदा विश्वविद्यालय पुनस्र्थापना से जुड़े विधेयक को राज्यसभा से पारित कराया। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा इस महान विश्वविद्यालय की पुनस्र्थापना में विश्व समुदाय विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों को जोडऩे की पहल हो रही है जिनका भारत से सांस्कृतिक लगाव रहा है। यह विश्वविद्यालय की गरिमा और परंपरा के अनुकूल भी है।

निश्चित रूप से इस पहल से विश्वविद्यालय की ख्याति और बढ़ेगी। पिछले वर्ष से शैक्षिक सत्र की शुरुआत हो चुकी है और देश-विदेश के छात्र अध्ययन शुरू कर चुके हैं। यूनेस्को ने इसे वैश्विक धरोहरों में शामिल कर इसकी गरिमा में वृद्धि की है। इससे न सिर्फ ऐतिहासिक विरासत को सहेजने में मदद मिलेगी बल्कि इसके जरिए विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया में सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सुनिश्चित करने तथा शांति व सुरक्षा को प्रोत्साहित करने में मदद भी मिलेगी। उचित होगा कि यूनेस्को भारत के अन्य शैक्षिक

, कलात्मक और सांस्कृतिक केंद्रों को भी वैश्विक धरोहरों में शामिल करे, जिससे कि दुनिया भारत के शानदार इतिहास से परिचित हो।

अरविंद जयतिलक ( 12 )

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