भारतीय गौरव और स्वाभिमान

  • 2016-09-15 08:00:43.0
  • वेदवसु आर्य

भारतीय गौरव और स्वाभिमान

हम आए दिन विदेशियों के कुत्सित प्रचार और मीडिया के पाखंडपर्ण रवैये की वजह से अपने गौरवशाली अतीत को कोसते रहते हैं। हमारी मानसिकता ही ऐसी बना दी गई है कि भारत का अतीत यानि हमारे लिए शर्म का विषय। जबकि हकीकत ये है कि भारत का अतीत जितना समृध्द और गौरवशाली रहा है वहाँ तक पहुँचने के बारे में दुनिया का कोई देश सोच भी नहीं सकता है। राष्ट्रवादी चिंतक और भारतीय गौरव और स्वाभिमान के लिए अपना जीवन समर्पित कर देने वाले स्वर्गीय राजीव दीक्षित ने अपने शोधपूर्ण व्याख्यानों में भारत के स्वर्णिम अतीत को सप्रमाण प्रस्तुत किया है- प्रस्तुत है उनके व्याख्यानों की श्रृंखला की ये पहली कड़ी। पूर्णत: दोषी आप नहीं है, संपन्नता एवं उन्नति रूपी प्रकाश हेतु हम पूर्व की ओर ताकते है किंतु सूर्य हमारी पीठ की ओर से निकलता है। देशकाल की दृष्टि से कहूँ तो मात्र 190-240 वर्ष पूर्व का भारत, दूसरे शब्दों में, मनुष्य की औसत आयु 60 वर्ष भी मान ले तो मात्र 3-4 पीढ़ी पूर्व। दो सौ से भी अधिक विद्वान इतिहासकारों ने, शोधकर्ताओं ने जब सोने की चिडय़िा (वर्तमान भारतियों में भारत के इतिहास के नाम पर शेष) पर शोध कर जो शोधपत्र, पुस्तके आदि लिखी उसके कुछ अंश आपसे साझा कर रहा हूँ। जिनमें से एक थे, थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) जो 1834 में आये एवं 1851 लगभग 17 वर्ष तक भारत में रहे। जिस कुव्यवस्था के कारण हमे अपने ही देश का अतीत आपको विदेशी विद्वानों के प्रमाणों आदि से बताना पड़ रहा है, उसमें इनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। इन्हें अभी विराम देते है, लोगो में धारणा बनी रहती है की अंग्रेजो के पहले का भारत मात्र कृषि प्रधान देश था जो की पूर्णत: असत्य है। अंग्रेजी इतिहासकार विलियम डिग्वी जिनके बारे में प्रचलित है की वे बिना किसी प्रमाण के कुछ बोलते नहीं, लिखते नहीं उन्होंने 17 वी शताब्दी में भारत को सर्वश्रेष्ठ व्यापारिक, कृषि एवं औद्योगिक देश लिखा है। भारत की भूमि को सबसे उपजाऊ, व्यापारियों को सबसे निपुण एवं भारतीय शिल्पकारों एवं दस्तकारो द्वारा निर्मित किसी भी उत्पाद का केवल स्वर्ण के ही बदले विक्रय होने की बात लिखता है। आगे इनकी लेखनी से यह निश्चित हो जाता है की भारत निर्यात प्रधान देश था।


फ्ऱांसिसी इतिहासकार फ्रांस्वा पेराड ने सन 1711 में भारत पर लिखे ग्रन्थ में सैकड़ों प्रमाण दिए है, वे लिखते है मेरी जानकारी में भारत देश में 36 प्रकार के ऐसे उद्योग चलते है जिनमें उत्पादित प्रत्येक वस्तु विदेशो में निर्यात होती है, भारत के उत्पाद सबसे उत्कृष्ट एवं सबसे सस्ते होते है, मुझे मिले प्रमाण के अनुसार है भारत का निर्यात 3000 वर्षों (अर्थात बुद्ध से 500 वर्ष एवं महावीर जी से लगभग 650 वर्ष पूर्व) से निर्बाधित रूप चलता आ रहा है। स्कॉटिश इतिहासकार मार्टिन लिखते है जब ब्रिटेन एवं इंग्लैण्ड के निवासी बर्बर एवं जंगली जानवरों की तरह जीवन जीते थे तब भारत में सर्वोच्च कोटि का वस्त्र बनता था एवं विश्व के देशों में विक्रय होता था। आगे लिखते है की मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है की भारतवासियों ने विश्व को कपड़ा पहनना एवं बनाना सिखाया है इसके साथ वह यह भी जोड़ते है की रोमन साम्राज्य में जितने भी राजा रानी हुए है उन सभी ने भारत में ही निर्मित कपड़े पहने है, आयात किये है।

विलियम वार्ड ने एवं फ्ऱांस के टेवर्नियर ने भी भारत के वस्त्र उद्योग के बारे में बहुत से प्रमाण दिए है। सन 1813 में अंग्रेजो की संसद में बहस के समय कई अंग्रेजी सांसदों ने कई प्रमाणों एवं सर्वेक्षणों के आधार पर विवरण दिया, सारे विश्व का लगभग 43त्न उत्पादन अकेले भारत में होता है,यही बात उन्होंने 1835 में एवं 1840 तक उद्धरण की।

ऐसे ही सारे विश्व के निर्यात में भी भारत का भाग लगभग 33त्न था इसे भी संसद में 1840 तक तक उद्धरण किया गया। इसी क्रम में एक अकड़ा सकल जगत की कुल आमंदनी का अंग्रेजो ने उद्धरण किया जिसमें से लगभग 27 प्रतिशत भाग हमारा था। जी.डब्ल्यू.लिटनेर, थोमस मुनरो, पैनडर्कास्ट्, कैम्पवेल आदि अधिकारीयों ने भी भारत की तकनीकी एवं शिक्षा व्यवस्था पर बहुत कार्य किया।
कैम्पवेल लिखते है जिस देश का उत्पादन सबसे अधिक होता है यह तभी संभव है जब वहाँ कारखाने हो, कारखाने तभी संभव है जब तकनिकी हो, तकनीकी तभी संभव है जब विज्ञान हो एवं जब विज्ञान मूल रूप से शोध के लिए प्रस्तुत हो तब उसमें से तकनीकी का निर्माण होता है।

वेदवसु आर्य ( 18 )

Bureo Chief Sambhal, Babrala.