भारत की राजनीतिक एकता के लिए संघर्ष करते रहे गुर्जर प्रतिहार वंशी शासक

  • 2016-09-23 05:15:49.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की राजनीतिक एकता के लिए संघर्ष  करते रहे गुर्जर प्रतिहार वंशी शासक

भारत के विषय में यह सत्य है कि इस देश ने कभी किसी देश की संप्रभुता पर आक्रमण नही किया। इसके उपरांत भी आर्यावत्र्तीय राजाओं ने चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित कर संपूर्ण भूमंडल पर आर्य संस्कृति का परचम लहराने के लिए समय-समय पर भारी उद्योग एवं पुरूषार्थ अवश्य किया। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज ने भी इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। हमारे इन महान शासकों को जानबूझकर इतिहास से ओझल किया गया है। हमारे राजाओं, सम्राटों या राष्ट्र नायकों का भारतीय संस्कृति के प्राण स्रोत वैदिक ऋचाएं मौन आवाहन करती रहीं कि-

यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरननभ्य वर्तयन्। गवाम् श्वानां वयसश्चत विष्ठाभगं वर्च: पृथिवी नो दधातु।। (अथर्व. 12 /1 /5)

अर्थात ''जिस हमारी मातृभूमि में पुराने समय में हमारे पूर्वज लोग, बल, बुद्घि, ऐश्वर्य से प्रसिद्घ सब भांति पराक्रम रूप कत्र्तव्य अच्छी तरह करते रहे हैं जिसमें विद्वान और वीरपुरूष राक्षसी स्वभाव वाले लोगों को जीतते रहे हैं जो गायों, घोड़़ों और विभिन्न प्रकार के पशु पक्षियों को विशेष सुख देने का स्थान है वह हमारी मातृभूमि हमको ऐश्वर्य, तेज और शौर्य प्रदान करे, अर्थात हमारे पूर्वजों ब्राह्मणों ने अपने ज्ञान द्वारा, क्षत्रियों ने वीरता द्वारा, वैश्यों ने वाणिज्य द्वारा और कारीगरों व शिल्पकारों ने कारीगरी द्वारा, श्रेष्ठ आदर्शों एवं मापदण्डों को स्थापित किया है। जिन्होंने मिलकर दुष्ट, घातकी, हिंसक और आततायी लोगों को नष्ट किया है, ऐसी मातृभूमि हमें सर्वांगीण समृद्घि प्रदान करे।''

मिहिर भोज भारतवर्ष के उन्हीं शासकों में से एक थे जिन्होंने भारतीय वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठाया और दुष्ट व राक्षसी एवं भारतीय संस्कृति का नाश करने के उद्देश्य से भारत पर आक्रमण करने आने वाले विदेशी विधर्मी शासकों का विनाश करने का संकल्प लिया।

बड़ी सेना रखने का राज
अपने समय के सभी आर्यावत्र्तीय शासकों में मिहिर भोज के पास सबसे बड़ी सेना होने का कारण भी यही था कि भारत और भारतीयता के शत्रुओं का नाश किया जा सके और उन विदेशी शासकों को भारत से बाहर रखने के लिए भारत की केन्द्रीय सत्ता को मजबूत किया जा सके। किसी भी देशभक्त राजा के भीतर इन दो गुणों से अन्य कोई तीसरा गुण और हो भी नही सकता कि वह भारत और भारतीयता के शत्रुओं का दमन करे और विदेशी शासकों को भारत से बाहर रखने का संकल्प ले।

मिहिर भोज की विशेषता
सम्राट मिहिर भोज की कार्यशैली और जीवन शैली का यदि अवलोकन किया जाए तो पता चलता है कि उन्होंने भारतीय राष्ट्र की अखण्डता और एकता को बनाये रखने के लिए अपना जीवन खपा दिया था वे ऐसे शासक थे-जिन्हें सोते-जागते, उठते-बैठते सदा देश की ही चिंता रहती थी।

इलियट एण्ड डाउसन ने इसीलिए कहा है :-''गुर्जर प्रतिहार राजवंश के द्वारा राजनैतिक अस्थिरता समाप्त करने का जो सराहनीय प्रयास किया गया उसका प्रभाव केवल उत्तरी भारत तक ही सीमित नही रहा। सीमा पार की आक्रमणकारी शक्तियां भी इस राजवंश के बढ़ते हुए पराक्रम एवं प्रभाव से सशंकित रहीं।'' (संदर्भ : हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्ट्रीयन्स, भाग-1 पृष्ठ 131)

प्रतिहार वंशी शासकों का संकल्प
यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस्लाम ने अपनी स्थापना के 70-80 वर्षों के भीतर ही हिंदूकुश पर्वत के पार मध्य एशिया के क्षेत्रों तथा उत्तरी अफ्रीका में इस्लामी धार्मिक सैनिकवाद को फैलाने में सफलता प्राप्त कर ली थी। तब भारत में चाहे राजनैतिक अस्थिरता थी अर्थात कोई सार्वभौम केन्द्रीय सत्ता नही थी, परंतु केन्द्रीय सार्वभौम सत्ता की स्थापना की आवश्यकता अवश्य अनुभव की जा रही थी। इसी आवश्यकता को लेकर प्रतिहार वंशी गुर्जर राजा चिंतित थे। इस चिंता के महान चिंतन से उदभूत हुए गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और उनके वंश के लोगों ने भारत को वृहत्तर बनाने का संकल्प लिया।

गुर्जर राजाओं की इस नीति की इसलिए भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने आत्मकेन्द्रित रहकर आत्मसुरक्षा तक स्वयं को सीमित करने में मूर्खता समझी। इसके स्थान पर उन लोगों ने आत्मविस्तार की गौरवमयी परंपरा का पालन किया। यह नीति उस समय बहुत ही उचित थी। क्योंकि इस्लाम उस समय तलवार के बल पर फैलता जा रहा था और विश्व की अनेकों संस्कृतियों को मिटाता जा रहा था, तब उचित यही होता कि अपने घर शत्रु का स्वागत करने के स्थान पर शत्रु की भूमि पर जाकर ही उसे ललकारा जाता। यदि हमारे सभी शासक गुर्जर राजाओं की इस नीति का पालन करते तो भारत को आगे चलकर जिन दुर्दिनों का सामना करना पड़ा, उनसे बचा जा सकता था।

''सम्राट मिहिर भोज से पूर्व अरबों के आक्रमण को राजा दाहर के पुत्र जयसिंह ने और उसके पश्चात चालुक्य शासक पुलकेशिराज अवनिजिनाश्रय ने रोकने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की थी।'' (संदर्भ : 738 का नौसारि अभिलेख)

प्रतिहार वंश का महाराणा संग्रामसिंह
सम्राट मिहिर भोज के पूर्ववर्ती शासक नागभट्ट प्रथम के भीतर देशभक्ति का लावा धधकता था। उसे इस वंश का महाराणा संग्रामसिंह कहा जा सकता है। वह शत्रु की आहट सुनकर भी उसे ललकारने के लिए चल पडऩे वाले वीर योद्घा शासक थे। 'इपि ग्राफिया इंडिया' (भाग 18 पृष्ठ 102-107) से हमें पता चलता है कि नागभट्ट प्रथम की ग्वालियर प्रशस्ति में म्लेच्छों अथवा अरबों को परास्त करने का श्रेय दिया जाता है, उपरोक्त पुस्तक इस गुर्जर शासक के और भी महत्वपूर्ण तथ्यों से हमें अवगत कराती है। वह कहती है कि इस शासक ने आनर्त, मालव, मत्स्य किरात और वत्स के पर्वतीय दुर्गों के साथ-साथ तुरूषकों पर भी बलपूर्वक अधिकार स्थापित कर लिया था।

भारत की सांस्कृतिक एकता की महत्ता
भारत के विषय में यह तथ्य जानने और समझने योग्य हैं कि इस देश की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने में यहां की सांस्कृतिक एकता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस देश के सभी निवासियों को वेदों की ऋचाओं ने, उपनिषदों के अध्यात्म दर्शन ने, पुराणों के ऐतिहासिक वृतांतों ने, रामायण की मर्यादा ने और महाभारत में गीतोपदेश ने सदा एकसूत्र में बांधे रखने का उल्लेखनीय और सराहनीय कार्य किया। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1589 )

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