भारत की राजनीतिक एकता के लिए संघर्ष करते रहे गुर्जर प्रतिहार वंशी शासक -2

  • 2016-09-23 12:30:16.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की राजनीतिक एकता के लिए संघर्ष  करते रहे गुर्जर प्रतिहार वंशी शासक -2

राकेश कुमार आर्य
राजनीतिक फूट का रोना
जिस काल्पनिक फूट का रोना हमारे विषय में बार-बार रोया जाता है-वह कुछ और न होकर हमारी राजनीतिक फूट थी। जिस पर हम कई बार अलग-अलग दिखाई देते थे, पर यह राजनीतिक फूट इतनी बलवती नही थी कि भारत की एकता को ही छिन्न-भिन्न कर देती। इस राजनीतिक फूट को भी इतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना संतरे की एक एक फाड़ी को मिलता है। जैसे फाड़ी संतरा नही बनती और न वह संतरे से अलग हो सकती है, वैसे ही कभी भारत में किसी राजा ने अपने आपको संतरे से अलग करने का प्रयास नही किया। सब संतरे के छिलके अर्थात भारत की सांस्कृतिक एकता के नीचे छुपे रहे। जिससे भारत की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता बनी रही। हां, इस क्षेत्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने के लिए हमारे कितने ही राजाओं और सम्राटों ने राजनीतिक प्रयास भी किये।

गुर्जर सम्राटों के हमारी राजनीतिक एकता को बनाये रखने के प्रयास
गुर्जर सम्राटों का चिंतन उस समय इसी दिशा में कार्य कर रहा था। वे भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करना चाहते थे। इसके पीछे कारण यह था कि कि भारत की सीमाओं को तो अपने मजबूत सैन्य दल से सुरक्षित कर चुके थे, पर उन्हें भीतरी परिस्थितियां ऐसी लगती थीं जो हमारी शक्ति को दुर्बल कर रही थीं। अत: उन्होंने भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करने के लिए सैन्य अभियानों का सहारा लिया।

विशुद्घानंद पाठक की पुस्तक 'उत्तर भारत का राजनीतिक इतिहास' (पृष्ठ 3-4) से हमें पता चलता है कि गुर्जर प्रतिहार राजवंश की उपलब्धियां बहुविध हैं। इस राजवंश के शासकों ने पराक्रम के द्वारा ऐसी साम्राज्य सीमा निर्मित करने में सफलता प्राप्त कर ली जो कतिपय अर्थों में हर्ष की साम्राज्य सीमा से भी विस्तृत थी। मिहिर भोज के अधिकार में उत्तर पूर्व में संपूर्ण उत्तर प्रदेश पश्चिम में राजस्थान का अति विस्तृत क्षेत्र दक्षिण पश्चिम में गुजरात, दक्षिण में बुंदेलखण्ड और मालवा सहित नर्मदा की उत्तरी घाटी का क्षेत्र भी सम्मिलित था।
विदेशी आक्रांताओं ने जब भारत का इतिहास तैयार कराया तो भारत का अंतिम हिंदू सम्राट हर्ष को सिद्घ करने का प्रयास किया। इसका कारण यह था कि हर्ष इस्लामिक आक्रमणों से पूर्व ही स्वर्ग सिधार गया था। इसलिए उससे उनकी कोई शत्रुता नही थी। पर उसके जाने के पश्चात भारत का नेतृत्व जब गुर्जरों के हाथों में आया तो उन्होंने इस्लाम के आक्रमणों को देश की सीमाओं पर ही रोक दिया, और ऐसी मजबूत किलेबंदी देश की कर डाली कि तीन सौ वर्ष तक अरब वाले भारत की ओर पैर करके भी सोना भूल गये। भारत के इन पराक्रमी गुर्जर सम्राटों का लोहा अरब वाले मान गये, जिसके विषय में अरबी इतिहासकारों ने भी लिखा है, परंतु भारत के इतिहास में इस गुर्जर प्रतिहार वंश को भुला देना ही अरब आक्रांताओं के हित में था। फलस्वरूप उन्होंने भारत के इतिहास से इस वीर जाति के योगदान को मिटाने का कार्य किया।

मिहिर भोज के नाम से घबराते थे अरबवासी
कल्हण की 'राजतरंगिणी' से हमें पता चलता है कि गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के पराक्रम की यशगाथा अरबों के कर्णकुहर में भय का संचार कर रही थी। प्रतिहार वंश के राजाओं के भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करने के प्रयासों का ही परिणाम था कि (राजतरंगिणी के अनुसार) पंजाब के उत्तरी भाग में स्थित धक्किय नामक राजवंश के किसी शासक के अधिराज भोज ने भूमि छीनकर उसे प्रतिहारी का कार्य करने को विवश कर दिया था।

'इपिग्राफिया इंडिया' से हमें पता चलता है कि बालादित्य के चाटसू अभिलेख में उल्लेखित है कि गुहिल हर्षराज ने उदीच्य राजाओं को जीतकर भक्तिपूर्वक भोजराज को दे दिया था। अरबी लेखक सुलेमान यह स्पष्ट करता है कि भोज के पराक्रम से अरब अत्यंत भयभीत थे। सुलेमान की इस बात को इस पारिस्थितिकीय साक्ष्य से भी समझा जा सकता है कि उस समय अरब आक्रांताओं ने भारत की ओर न बढक़र विश्व के अन्य देशों की ओर अपनी लुटेरी सेनाओं को भेजना आरंभ कर दिया था।

तब देश का इतिहास ही कुछ दूसरा होता
यदि मिहिर भोज और उनके वंश के गुर्जर शासक अरबों को भारत से बाहर रखने का उद्यम पूर्ण पुरूषार्थ न करते तो इस देश के इतिहास की दिशा ही बदल गयी होती। तब बहुत संभव था कि देश में न तो कोई 'गांधी' होता और ना ही पाकिस्तान की मांग करने वाला 'जिन्नाह' होता। क्योंकि इस्लाम को यदि प्रारंभ के तीन सौ वर्ष में इस देश में उत्पात मचाने का अवसर मिल गया होता तो यह संपूर्ण भारत ही 'पाकिस्तान' बन गया होता।

इस प्रकार गुर्जर प्रतिहार वंशी शासकों का हिंदू जाति और भारतीय राष्ट्र पर महान उपकार है। अलमसूदी का ही कथन है कि भारत के शासकों में मिहिर भोज से बढक़र कोई राजा इस्लाम का शत्रु नही है। उसका राज्य जिह्वा के आकार का है और उसके अतिरिक्त कोई ऐसा राज्य नही है जो डाकुओं से इतना सुरक्षित है।
अल मसूदी की भारत यात्रा का काल इतिहासकारों ने 912-916 ई. माना है। वह कन्नौज के बऊरा शासक की सैन्य शक्ति की बात करता है और कहता है कि उसके शत्रुओं में राष्ट्रकूट शासक तथा सिंध व मुल्तान के शासक हैं। स्पष्ट है कि सिंध और मुल्तान को बऊरा के राजा (जिसे इतिहासकारों ने महीपाल प्रथम के रूप में स्वीकार किया है) से भय लगता था कि वह भारत की और उनके बढऩे में तो बाधक है ही साथ ही उसके रहते उनके अपने राज्य भी सुरक्षित नही हैं। वास्तव में किसी देश का शासक ऐसा ही होना भी चाहिए जो शत्रुओं में भय उत्पन्न करने की क्षमता रखता हो।

फारसी भूगोल गं्रथ की साक्षी
दसवीं शताब्दी में फारसी में एक भूगोल ग्रंथ की रचना हुई। जिसका नाम 'हदूद-उल-आलम' रखा गया इससे पता चलता है कि भारत के अधिकांश शासक 'किन्नौज के राय' की आज्ञा का पालन करते हैं।
जिससे स्पष्ट है कि प्रतिहार वंशी शासकों को भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करने में सफलता मिली। 'हदूद-उल-आलम' भी यह स्वीकार करती है कि भारत के गुर्जर प्रतिहार राजवंश की अपरिमित सैन्य शक्ति और पुरूषार्थ का अरबों के भीतर अत्यधिक आतंक था।

स्वामी शंकराचार्य जी का महान उपकार
गुर्जर प्रतिहार वंश देश में राजनीतिक एकता स्थापित करने के लिए प्रयासरत क्यों था? यदि इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि इसका कारण उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों के दृष्टिगत स्वामी शंकराचार्य जी महाराज का वह प्रयास था जिसके चलते प्रतिहारों ने भारत को विदेशी आक्रांताओं से मुक्त करने-कराने का महान संकल्प लिया था। अपने इसी संकल्प को पूर्ण करने के लिए इस वंश के शासकों ने देश की सीमाओं को सुरक्षित करने का दायित्व निभाया। परिणामस्वरूप अरबों के द्वारा सिंध और मुल्तान पर अधिकार करने के उपरांत भी वे लोग भारत की सीमाओं में प्रवेश करने का साहस नही कर पाए थे।

'आदिवराह' कहलाए मिहिर भोज
भारत की यह प्राचीन परंपरा रही है कि व्यक्ति के जैसे गुण, कर्म, स्वभाव होते हैं लोग उसे वैसा ही नाम या उपाधि दे दिया करते हैं। यह नाम या उपाधि अक्सर उसके मूल नाम से अलग होती है, जिससे उसके संपूर्ण जीवन के सार को संक्षेप में अभिव्यक्ति मिल जाती है। जैसे महाभारत में भीष्म का मूल नाम देवव्रत था, पर उनकी आजीवन ब्रह्मचारी रहने की भीषण प्रतिज्ञा के कारण उन्हें भीष्म कहा गया, इसी प्रकार युधिष्ठिर को उनके गुण, कर्म, स्वभाव के कारण धर्मराज और सुयोधन को दुर्योधन कहा गया। इसी प्रकार गुप्तवंशीय शासक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को शकों का विनाश करने के कारण 'शकारि' कहा गया। इतिहास में ऐसे और भी अनेकों उदाहरण हैं।

गुर्जर प्रतिहार वंशी महान शासक सम्राट मिहिर भोज ने अपने शासनकाल में अरब आक्रमणकारियों को पूर्णत: असहाय और अशक्त बना दिया था, इसलिए उन्हें 'आदिवराह' की उपाधि दी गयी थी। इस तथ्य की पुष्टि ग्वालियर का विक्रमी संवत 932 का लेख करता है। इसके अतिरिक्त मिहिर भोज के सिक्कों पर 'आदिवराह' की उपाधि अंकित है। मिहिर भोज के इस वंदनीय कार्य से प्रतिहार (द्वारपाल) शब्द ही सार्थक हो गया था।

सचमुच उन परिस्थितियों में इस वंश के शासकों ने और विशेषत: मिहिर भोज ने भारत के लिए 'द्वारपाल' का ही कार्य किया था। मिहिर भोज के इस कार्य को यदि गंभीरता से समझा जाए तो पता चलता है कि उन्होंने उस समय ऐसा करके देश की बहुत बड़ी सेवा की थी।
वैदिक धर्म और संस्कृति के संवाहक मिहिर भोज
अथर्ववेद का मंत्र है-
अदारसृद्भवतु देव सोमास्विन यज्ञे मरूतो मृडता न:। मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विददवृजिना द्वेष्या या ।। 1 ।। (अथर्ववेद 1/20/1)
अर्थात ''हे सोमदेव! हम सबसे आपास की फूट हटाने वाला (और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ कराने वाला) कार्य होता रहे। हे मरूतो! (राष्ट्रीय एकता स्थापित करने के अपने इस पावन याज्ञिक कार्य में) इस यज्ञ में हमें सुखी करो। अपने शत्रुओं से संघर्ष करते हुए हमें कभी भी पराभव या पराजय का सामना न करना पड़े, अर्थात हमारा पराक्रम शत्रुओं पर सदा भारी रहे। दुष्कीर्ति या कलंक हमारे पास न आवे, और जो द्वेष भाव बढ़ाने वाले कुटिल कृत्य हैं, वे भी हमारे पास न आवें। अर्थात अपने राष्ट्रीय दायित्व के निर्वाह में हम पारस्परिक फूट या वैमनस्य के शिकार ना हों। हम सदा संगठित रहें, तभी सामाजिक और राजनैतिक पराजय से बच सकते हैं, क्योंकि एकता ही राष्ट्र की शक्ति है।''

वेद का यह मंत्र मिहिर भोज और उनके साथियों का मानो मूल प्रेरणास्रोत बन गया था, जिससे वे ऊर्जान्वित होकर राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करते रहे। राष्ट्र यज्ञ में जो व्यक्ति ऐसी भावना से प्रेरित होकर आहुति डालता है वह 'मिहिर भोज' बन ही जाता है। यजुर्वेद (1/8/48) में भी आया है कि-''हे परमेश्वर विद्वन आप हम लोगों के ब्रह्मवेत्ता विद्वानों में प्रीति से प्रीति को स्थापित कीजिए। हम लोगों के क्षत्रियों, शूरवीरों में प्रीति से प्रीति कराइए। प्रजाजनों में से हमारे वैश्यों, व्यापारियों तथा शूद्रों, कारीगरों, शिल्पियों आदि में पारस्परिक प्रीति और मुझ में भी प्रीति स्थापित कीजिए, अर्थात समाज के सभी प्रकार के मनुष्य आपस में प्रीतिपूर्वक व्यवहार करें और प्रत्येक अपना कार्य श्रेष्ठता से संपन्न करता हुआ दूसरे के कार्यों के प्रति सम्मानभाव रखे और प्रीति करे।''
हमने वेद के ये दो मंत्र यहां जानबूझकर उद्घृत किये हैं, इन्हें उद्घृत करने के पीछे हमारा उद्देश्य यही है कि जिस देश की संस्कृति का मूलाधार वेद हो उस वेद की शिक्षाओं को अपने जीवनव्रत के रूप में अपनाना उस देश के महानायकों की पहली विशेषता होती है। जिन्हें अपनाकर वे अपना, अपने देश का, और अपने देशवासियों का भला करते हैं। हर देश के प्राचीन धर्मग्रंथ उसके राष्ट्रनायकों की कार्यशैली में अवश्य ही परिलक्षित हुआ करते हैं। अब जिस प्रतिहार वंश की स्थापना वेद मंत्रों के उपरोक्त संकल्पों के साथ माउंट आबू में यज्ञ के माध्यम से हुई थी उससे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि उसने अपने दायित्व निर्वाह में किसी प्रकार चूक की हो?

प्रतिहारवंशी शासकों का साम्राज्य विस्तार
इंद्रप्रस्थ अभिलेख और बुलंदशहर के आहार अभिलेख से पता चलता है कि सम्राट मिहिर भोज उत्तरांचल के प्राचीन राज्य हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, अहिच्छत्र, काम्पिल्य आदि भी गुर्जर प्रतिहार सम्राट नागभट्ट के समय से ही गुर्जर साम्राज्य के आधीन थे। गुर्जरत्रा: (गुजरात) 735 ई. से ही गुर्जर साम्राज्य का अंग था यह क्षेत्र सन 1000 तक गुर्जर प्रतिहारों के आधीन रहा। सत्यकेतु विद्यालंकार 'भारत का इतिहास' पृष्ठ 105 पर बताते हैं कि मिहिर भोज ने पाल नरेशों से पूर्वी बिहार, उत्तरी व पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, तथा कलिंग के प्रदेश जीतकर उन्हें गुर्जर साम्राज्य का अंग बनाया। मिहिर भोज ने अरबों को सिंधु घाटी के पश्चिम की ओर खदेड़ दिया था, सिंधु के पश्चिमी तट पर मिहिर भोज ने अपने नाम से वराह नगर की स्थापना की थी। के.एम. मुंशी हमें बताते हैं कि सिंधु पार भी गुर्जर साम्राज्य का कुछ सीमा तक अधिकार था। नागभट्ट प्रथम और नागभट्ट द्वितीय ने भी अरबों को सिंधु तट के पार खदेड़ा था। मिहिर भोज के समय में मुल्तान नगर में गुर्जर सेना की छावनी थी। (संदर्भ : रतनलाल वर्मा, 'भारतीय संस्कृति के रक्षक', पृष्ठ 126)

उस समय देवल ऋषि हिन्दू समाज के लिए बहुत बड़ा कार्य कर रहे थे। उनके सत्कारियों की चर्चा दूर दूर तक फैल गयी थी। उनकी सलाह पर गुर्जर प्रतिहारों हिन्दू से बलात् मुसलमान बना लिये गये लोगों को पुन: हिन्दू बनाने का इतिहास प्रसिद्घ कार्य किया था। इन लोगों को अरब वालों ने 'काफिर' कहा था उस समय की परिस्थितियों के दृष्टिगत गुर्जर प्रतिहार शासकों का यह कार्य बहुत ही प्रशंसनीय कहा जा सकता है।

देवी सिंह मंडावा के द्वारा हमें पता चलता है कि सम्राट मिहिर भोज की सहायता से राघव देव ने 879 ई. तक संपूर्ण नेपाल प्रदेश को तिब्बत साम्राज्य से मुक्त कर गुर्जर साम्राज्य के अधीन लाकर उसे अपना सामंत बनाया।

कलहण़ की 'राजतरंगिणी' से हमें पता चलता है कि संपूर्ण पंचनद (पंजाब) प्रांत भी गुर्जर साम्राज्य के अधीन था। सम्राट मिहिर भोज के शासन काल में गुर्जर प्रतिहार वंश की सीमाओं के अंतर्गत वर्तमान संपूर्ण पंजाब, पुंछ, राजौरी, जम्मू, हिमाचल, हरियाणा, राजस्थान, हैदराबाद प्रांत (पाकिस्तान) गुजरात, लाट (भड़ौंच), मध्य प्रदेश बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल आदि आते थे।
इस प्रकार स्पष्ट है कि गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और उनके वंश के अन्य राजाओं में भारत की सांस्कृतिक एकता को राजनैतिक एकता में परिवर्तित करने हेतु हरसंभव प्रयास किये, और देश की अतुलनीय सेवा की।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1589 )

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