विरोधाभासी नीतियों के बीच गंगा

  • 2016-09-28 09:30:50.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

विरोधाभासी नीतियों के बीच गंगा

एनडीए सरकार द्वारा गंगा से बिजली, पानी एवं जहाजरानी लेने-लेने का ही प्रयास किया जा रहा है। गंगा में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम सही दिशा में हैं। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा को प्रशासनिक अधिकार देने का स्वागत है, परंतु ये कदम अपर्याप्त होंगे। गंगा का मूल गंगत्व बहाव, वनस्पतियों एवं जीव जंतुओं से उत्पन्न होता है। इन्हें पहले संरक्षित करना चाहिए। जल विद्युत, सिंचाई तथा जहाजरानी परियोजना से गंगा को मृत्यु के घाट उतारकर उसकी सफाई करने की क्या सार्थकता है.


केंद्र सरकार ने निर्णय लिया है कि नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा को प्रशासनिक अधिकार दिए जाएंगे। यह मिशन जल संसाधन मंत्रालय के अधीन एक सोसायटी के रूप में कार्य करता है। इसका प्रमुख कार्य नगरपालिकाओं को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए धन आबंटित करना है। गंगा में प्रदूषित पानी डालने वाली नगरपालिकाओं एवं उद्योगों के विरुद्ध मिशन स्वयं कोई कार्रवाई नहीं कर पाता था। मिशन के अधिकारियों को राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सूचना देनी होती थी। राज्य बोर्ड के अधिकारियों द्वारा स्थानीय पुलिस की मदद ली जाती थी। इस चक्रव्यूह में मिशन के हाथ बंध जाते थे। अब मिशन द्वारा गंगा में प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर सीधे कार्रवाई की जा सकेगी। प्रदूषण बोर्ड को जमीन, पानी तथा हवा में पूरे राज्य में फैल रहे प्रदूषण पर ध्यान देना होता है। उनके कार्य में गंगा का प्रदूषण एक छोटा हिस्सा है, इसलिए इसकी प्राथमिकता नहीं रहती है। प्रशासनिक अधिकार नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के पास आने से आगे त्वरित कार्रवाई हो सकेगी। सरकार द्वारा वर्तमान में उठाए जा रहे कदमों को बल मिलेगा।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पीके मिश्रा के अनुसार क्षेत्र के उद्योग सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने पर अब गंभीरता से विचार कर रहे हैं। प्लांट को डिजाइन करने के लिए उनसे संपर्क कर रहे हैं। हां, कुछ चालाकी बरत रहे हैं। जैसे भदोही के किसी उद्यमी द्वारा गंदे पानी को नाले में बहाने के स्थान पर बोरवेल खोदकर उसे जमीन में डाला जा रहा है। इस प्रकार की गड़बड़ी दर्शाती है कि उद्योगों पर सरकार का दबाव है। इसी प्रकार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के प्रोफेसर विनोद तारे के अनुसार गंगा बेसिन के कागज के कारखानों ने भूसे और गन्ने की खोई जैसे कच्चे माल का उपयोग कम कर दिया है। इस माल को पकाने में कास्टिक सोडा का उपयोग होता है। माल पकाने के बाद बचा ब्लैक लिकर अति प्रदूषणकारी होता है। इसे नाले में बहाने पर सरकार द्वारा रोक लगाए जाने के कारण फैक्टरियों ने इन कच्चे माल का उपयोग ही बंद कर दिया है। वे रद्दी कागज को रिसाइकिल करके कागज बना रहे हैं।

सरकार द्वारा शहरी निकायों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए भारी रकम उपलब्ध कराई जा रही है। मौजूदा सरकार के इस प्रयास का परिणाम भले देर से आए, पर आएगा जरूर। नदी की स्वच्छता बरकरार रहे, इसके लिए इसमें मछली का होना जरूरी है। मछली इस बात का प्रमाण है कि पानी में पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन उपलब्ध है। मछली के जीवित रहने के लिए जरूरी है कि नदी में पर्याप्त मात्रा में पानी हो। यूपीए सरकार ने सात आईआईटी के समूह को गंगा बेसिन के प्रबंधन की योजना तैयार करने को दी थी। समूह ने निर्णय दिया कि गंगा की पूर्णता को बनाए रखने के लिए लगभग 52 प्रतिशत पानी नदी में छोड़ा जाना चाहिए और शेष 48 प्रतिशत पानी का उपयोग सिंचाई एवं बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है। आईआईटी की यह रपट यूपीए सरकार के कार्यकाल की संध्या में प्रस्तुत की गई थी, इसलिए यह कहना कठिन है कि यूपीए सरकार द्वारा इस सुझाव को लागू किया जाता या नहीं, यद्यपि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में यूपीए सरकार ने आईआईटी द्वारा किए जा रहे अध्ययन के प्रति अपना विश्वास जताया था। बहरहाल इतना कहा जा सकता है कि एनडीए सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया है। वर्तमान स्थिति यह है कि नदी में पानी की मात्रा न्यून है। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा बिजली कंपनियों को दी जा रही स्वीकृति में 52 प्रतिशत प्रवाह छोडऩे की शर्त नहीं लगाई जा रही है। पूर्व में बनी परियोजनाओं द्वारा वर्तमान में मात्र एक प्रतिशत पानी छोड़ा जा रहा है। पिछले दो वर्षों से एनडीए सरकार ने अधिक पानी छोडऩे की पहल नहीं की है।

नदी का निरंतर प्रवाह बनाए रखना भी जरूरी है। गंगा नदी के निचले क्षेत्र से हिलसा मछली अंडे देने के लिए बनारस एवं इलाहाबाद तक आती थी। अंडे बहकर वापस समुद्र में जाते थे। वहां बड़े होकर बड़ी मछली अगले चक्र में ऊपर आती थी। फरक्का बैराज बनने के बाद फरक्का के ऊपर हिलसा लुप्त हो चुकी है, चूंकि समुद्र से मछली अपने प्रजनन क्षेत्र को नहीं पहुंच रही है। इसी प्रकार उत्तराखंड में माहशीर मछली का साइज छोटा होता जा रहा है। यह मछली अंडे देने के लिए ऊपर पीपलकोटी जाती थी। श्रीनगर में विद्युत परियोजना बनने के कारण माहशीर अपने प्रजनन क्षेत्र तक नहीं पहुंच पा रही है। इस समस्या से निपटने के लिए आईआईटी ने सुझाव दिया था कि नदी के बहाव की निरंतरता को बनाए रखा जाए। एनडीए सरकार को इस सुझाव पर अमल करना चाहिए, ताकि मछली जीवित रहे।

मछली के जीवन के लिए यह भी जरूरी है कि उसकी रिहाइश की बालू से छेड़छाड़ न की जाए। मछली, कछुए आदि जलीय जंतुओं की कई प्रजातियां छिछली बालू में अंडे देती हैं। इनके संरक्षण के लिए जरूरी है कि नदी की बालू को यथावत रहने दिया जाए। नदी के द्वारा अपनी प्रकृति के अनुसार तीन-चार साल के बाद जमा हुई बालू को बाढ़ में स्वत: समुद्र में पहुंचा दिया जाता है।
बाढ़ प्राकृतिक अवस्था है। इससे जलीय जंतुओं को हानि नहीं होती है। यूपीए सरकार ने गंगा पर नेशनल वाटर-वे बनाने का प्रस्ताव बनाया था, परंतु कार्यान्वित नहीं किया था। अतएव गंगा की मछलियां एवं कछुए अपने बालू के घरों में सुरक्षित थे। वर्तमान सरकार नेशनल वाटर-वे को मूर्त रूप देना चाहती है। इस हेतु गंगा में ड्रेजिंग का कार्य चल रहा है। मछलियां अपने बसेरे से बेदखल हो रही हैं। देश के पर्यावरण कानून की स्वीकृति के बिना यह कार्य हो रहा है।

पूरा विश्व प्रयासरत है कि नदियों के कुछ हिस्सों को प्राकृतिक रूप में बरकरार रखें। विशेषकर उन हिस्सों से कोई मानवीय छेड़छाड़ न की जाए, जो उसके सौंदर्य एवं जैव विविधता पर प्रभाव डाले। अमरीका में नदियों की कई साइटों को 'वाइल्ड एवं सीनिक' घोषित किया गया है। इनके किनारे पशु को चराना भी वर्जित है।

इस सिद्धांत को अपनाते हुए यूपीए सरकार ने उत्तर काशी के ऊपर के क्षेत्र को ईको सेंसिटिव क्षेत्र घोषित किया था। पद संभालने के बाद प्रधानमंत्री ने गंगा की स्थिति पर भावुक होकर कहा था, 'अब हमें गंगा से कुछ लेना नहीं है, बस देना ही देना है।', लेकिन फिलहाल धरातल पर ऐसा नहीं दिख रहा है। एनडीए सरकार द्वारा गंगा से बिजली, पानी एवं जहाजरानी लेने-लेने का ही प्रयास किया जा रहा है। गंगा में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम सही दिशा में हैं। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा को प्रशासनिक अधिकार देने का स्वागत है, परंतु ये कदम अपर्याप्त होंगे। गंगा का मूल गंगत्व बहाव, वनस्पतियों एवं जीव जंतुओं से उत्पन्न होता है। इन्हें पहले संरक्षित करना चाहिए। जल विद्युत, सिंचाई तथा जहाजरानी परियोजना से गंगा को मृत्यु के घाट उतारकर उसकी सफाई करने की क्या सार्थकता है?