आधुनिक शिक्षा बनाम वैदिक शिक्षा

  • 2016-09-01 13:00:54.0
  • मनोज शास्त्री

आधुनिक शिक्षा बनाम वैदिक शिक्षा

*आधुनिक शिक्षा बनाम वैदिक शिक्षा* एक महिला ने स्वामी विवेकानन्द पर व्यंग्य किया कि इनको कपड़े पहनने भी नहीं आते तब स्वामी जी ने उत्तर दिया कि """In America tailor makes a man but in Bharat character makes a man"" भारत की धारणा है कि चरित्र ही सबकुछ है, इसके नाश हो जाने से सर्वस्व समाप्त हो जाता है। गांधी जी के अनुसार सात सामाजिक बुराइयां हैं---

1. नैतिकता के बिना व्यापार

2. चरित्र के बिना शिक्षा

3.विवेक के बिना प्रसन्नता

4. सिद्धान्तों के बिना राजनीति

5. मानवता के बिना विज्ञान

6. काम के बिना धन

7. सेवा के बिना धर्म चरित्र ही मनुष्य की शोभा है। आचरण ही मनुष्य का धर्म है और यही उसका आभूषण है। जिस शिक्षा का प्रभाव हमारे चरित्र पर नहीं होता वह हमारे कुछ काम का नहीं होता। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रोफेसर डी एस कोठारी ने एक बार टिपण्णी की थी कि यदि उन्हें शिक्षा आयोग की अध्यक्षता करने का अवसर मिला तो वे इसे राष्ट्रीय विकास के लिए शिक्षा नहीं अपितु चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा का नाम देंगे। आज हमारे विद्यालय के पाठ्यक्रमों में नैतिक मूल्यों के विषय को पुनः आरम्भ करने की आवश्यकता है। क्योंकि समाज मानवता के नीतिपरक मूल्यों में अपनी अधिकांश आस्था खोता हुआ प्रतीत होता है। भारतीय धर्मग्रन्थों एवं काव्यों में इन मूल्यों पर हमेशा बल दिया गया है। लंबे समय से एक पारिवारिक उत्तरदायित्व के रूप में समझे जाने वाले नैतिक मूल्यों की शिक्षा को किसी भी शैक्षणिक संस्थान के पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनना ही चाहिए। किसी समाज के मूल्यों को मज़बूत बनाने का उत्तरदायित्व केवल व्यक्तिगत प्रयासों तक ही सीमित नहीं है, वरन् शिक्षकों को भी आवश्यकता की इस घड़ी में अवश्य ही परामर्शदाता की भूमिका अपनानी चाहिए और एक बेहतर विश्व की ओर अग्रसर होने के लिए परिवर्तन लाना चाहिए। एक ऐसा विश्व जो हमारे इर्द गिर्द के लोगों के निःस्वार्थ भाव से ओतप्रोत हो। हिन्दू धर्म में चार पुरुषार्थ माने गए हैं--- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यहां धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं है, कर्त्तव्य है, कर्मों की नैतिकता है, तुलसी का ""परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।"" है। यहां धर्म का अर्थ मानवता है। मोक्ष का गहरा अर्थ सांसारिक दुःखों से मुक्ति है, कर्म बन्धनों से मुक्त जो शांति प्राप्त होती है वह मोक्ष है। वैदिक शिक्षा पद्धति में इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करने की शिक्षा दी जाती थी। किन्तु आज धर्म निरपेक्षता के गलत प्रकाश में धर्म की शिक्षा का लोप कर दिया गया है। आज मोक्ष की चर्चा भी नहीं की जाती। यहां तक कि कामनाएं कैसी हों, इसकी भी शिक्षा नहीं दी जाती अर्थात उन चारों पुरुषार्थों में से एक ही पुरुषार्थ की शिक्षा दी जा रही है। कितनी असंतुलित है हमारी शिक्षा पद्धति। मैं अथर्ववेद का (5.7.4) से एक मंत्र का अनुवाद उद्घृत करना चाहूंगा ""हम ऐसी शिक्षा और ऐसा ज्ञान आत्मसात करें और उनका उत्सव मनाएं जो परस्पर सहयोग की भावना बढ़ाएं तथा कल्याणकारी हों।"" अथर्ववेद के उक्त कथन पर आश्चर्य होता है कि उस पुरातन काल में भी उनके विचार इतने अनोखे और सर्वकालिक थे कि आज भी सत्य हैं। और हमारे पास यह ज्ञान जो परस्पर सहयोग की भावनाएं बढ़ाएं तथा कल्याणकारी हों, होते हुए भी हमारी आज की शिक्षा मात्र अर्थोपार्जन की मशीनें पैदा कर रही है। आज के इस पूंजीवादी तथा भोगवादी भारत में शिक्षा मनुष्य को धन कमाने की मशीन बना रही है, और वास्तव में नैतिक शिक्षा की कमी उसे "राक्षस" बना रही है- किसी भी कीमत पर अपने सुख के लिए अपनी इच्छाओं को पूरी करना ही राक्षसत्व है। मानव बनने के लिए यथा समय चारों पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-अर्थात चारों कर्तव्यों की शिक्षा आवश्यक है। धर्म का अर्थ यहां किसी सम्प्रदाय के नियमों का कठोर पालन नहीं, वरन् मानव बनने के लिए जो गुण आवश्यक हैं वह धर्म है, यथा धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य तथा अक्रोध आदि गुण हैं। अर्थों का अर्जन अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए करना भी हमारा कर्त्तव्य है, और मोक्ष अर्थात इस संसार में दुःखों से निवृत्ति भी। इन चारों कर्तव्यों की शिक्षा के स्थान पर आज मात्र एक कर्त्तव्य की शिक्षा ही दी जा रही है और वो है अर्थोपार्जन की शिक्षा। शिक्षा का अर्थ मात्र स्कूली शिक्षा नहीं है वरन् इसमें परिवार तथा समाज का भी बहुत बड़ा हाथ है। शिशु माता-पिता, परिवार आदि से उनके हावभाव, बोलचाल तथा व्यवहार से बहुत कुछ सीख लेता है। पहले 8-10 वर्ष की आयु तक की समस्त प्रकार की शिक्षा उसके व्यवहार की नींव का निर्माण करती है। अतः शिक्षा की नींव के लिए परिवार तथा समाज का उत्तरदायित्व बनता है कि वे अपने व्यवहार से उसे प्रेम, सहयोग, करुणा, संवेदनशीलता, जिज्ञासा, प्रश्नाकुलता, सत्य, निश्छलता, कार्यनिष्ठा, स्वस्थ तथा जिम्मेदार बनने आदि की शिक्षा दें। एक कहावत है कि बालक के विकास के लिए पूरे गांव का योगदान चाहिये। एक महान समाज एक महान पुरुष पैदा कर सकता है और यह भी सच है कि एक महान पुरुष समाज को बदल सकता है। मानव अपनी प्रकृति से अन्य जानवरों की तुलना में, जन्मजात निर्विशेषता के लिए प्रसिद्ध है और यही हम सभी की अतिजीविता के मूलाधार हैं। किन्तु इसका तातपर्य यह नहीं है कि मनुष्य आवश्यकतानुसार अनेकों विशेषताएं प्राप्त कर सकते हैं। प्रकृति से शिक्षा लेते हुए हमें भी अपनी शिक्षा ऐसी बनानी चाहिए कि शिक्षा का मूलाधार "निर्विशेषता"हो और जिससे यथासमय यथोचित विशेषज्ञता प्राप्त की जा सके। निर्विशेषता कैसी हो, इसके लिए हम प्रथमतः देखें विश्व के पुरातन ग्रन्थ वेद। यजुर्वेद के तैत्तरीय उपनिषद में शिक्षावल्ली। अर्थात शिक्षा के विषय में उन ऋषियों के गहन विचार हैं। शिक्षावल्ली के 11 वें अनुवाक में दीक्षांत समारोह के वर्णन में गुरु शिष्यों को अंतिम उपदेश देते हैं-सत्य बोलो, धर्म के अनुसार आचरण करो, अध्ययन से प्रमाद मत करो अर्थात उसे अकर्तव्य समझकर मत छोडो। कौशल से प्रमाद नहीं करना चाहिए, भौतिक समृद्धि से प्रमाद नहीं करना चाहिए, अध्ययन और प्रवचन देने से प्रमाद नहीं करना चाहिए.......हमारे जो अनिंदित कर्म हैं उन्हीं का अनुसरण करना, दूसरों का नहीं। जो हमारे सूचरित हैं उन्हीं का अनुसरण करना, अन्य का नहीं। यद्यपि आज ऐसी निर्विशेष शिक्षा भारत में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बंद हो गई हैं, किन्तु यह तो मानव बनने के लिए हमेशा से ही सत्य हैं।
प्रस्तुति-मनोज चतुर्वेदी शास्त्री

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