प्रयोगों की मार झेलते सरकारी विद्यालय

  • 2016-09-16 12:30:55.0
  • उगता भारत ब्यूरो

प्रयोगों की मार झेलते सरकारी विद्यालय

राम लाल राणा
यह कहना तर्कसंगत नहीं कि सरकारी स्कूलों में पढ़े विद्यार्थियों में गुणात्मक शिक्षा की कमी होती है। हमने समाज में देखा है कि जो बच्चे किसी पद के लिए चयनित हो रहे हैं, उनमें से अधिकतर सरकारी स्कूलों में पढ़े हुए बच्चे ही होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सरकारी स्कूलों में गुणात्मक शिक्षा की कमी नहीं।

इसी सप्ताह बंजार विधानसभा क्षेत्र में प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को भरी सभा में खरी-खरी सुनाई। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूलों के सभी अध्यापक निठल्ले हैं, परंतु कुछ काली भेड़ें अवश्य हैं, जो पूरे शिक्षक समाज को बदनाम कर रही हैं। उन कामचोर अध्यापकों के ऊपर अवश्य कार्रवाई होनी चाहिए, जो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं। हिमाचल प्रदेश में हाल ही में शिक्षा के क्षेत्र में कई सर्वे हुए, जिनमें हर सर्वे में बताया कि सरकारी स्कूलों में ही यह गिरावट आई है, जबकि निजी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता काफी अच्छी है। सरकारी और निजी स्कूलों के बीच में गुणवत्ता में बढ़ती खाई पर यदि एक नजर डाली जाए, तो उसके पीछे कई कारण ऐसे हैं जिन पर नियंत्रण सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के हाथों में नहीं है।

सबसे पहले निजी स्कूलों में प्रथम कक्षा से पहले बच्चे को दो वर्ष नर्सरी और केजी की पढ़ाई दी जाती है। उसे तीन वर्ष में ही दाखिल किया जाता है, जबकि सरकारी स्कूल में बच्चे को पांच साल का पूरा होने पर ही दाखिल किया जाता है। जिस समय सरकारी स्कूल का बच्चा अध्यापकों के पास पहुंचता है, वह कोरे कागज की तरह होता है, जबकि निजी स्कूल में बच्चा दो वर्ष नर्सरी और केजी में बहुत कुछ सीख जाता है। इस बारे में सरकार को चाहिए कि सरकारी और निजी विद्यालयों में दाखिल होने के लिए एक समान नीति अपनाई जाए। दूसरी बात यह है कि सरकारी स्कूलों में ज्यादातर समाज के गरीब वर्ग के बच्चे आते हैं। उन्हें शिक्षा के बारे में जागरूकता नहीं होती, क्योंकि इस वर्ग के लोगों का ज्यादा ध्यान रोटी प्राप्त करने पर होता है। समाज के अधिकतर जागरूक परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं, क्योंकि उन स्कूलों में उनके बच्चों को प्रतिस्पर्धा करने के लिए अधिक अच्छा माहौल मिल जाता है। कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने इस विषय पर एक कानून बनाने की कोशिश की थी कि कोई भी सरकारी अध्यापक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में नहीं पढ़ाएगा। यह कानून सिर्फ अध्यापक के ऊपर ही थोपा जा रहा था। इसको थोड़ा संशोधित रूप से लागू करने की जरूरत है कि सभी सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों के बच्चे केवल सरकारी स्कूलों में ही पढ़ें। यदि सरकार ऐसा कानून पास करती है, तो अवश्य ही सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा।
तीसरी बात यह है कि छोटी कक्षाओं में सीसीई ग्रेडिंग प्रणाली को हटाया जाए, क्योंकि सरकारी स्कूलों में प्रथम कक्षा में बहुत सारे ऐसे बच्चे आते हैं, जिन्हें प्रथम कक्षा में सीखने के लिए थोड़ा ज्यादा समय लगता है। उन्हें कई बार दो बर्षों तक पहली कक्षा में पढ़ाने की जरूरत होती है। मौजूदा प्रणाली के मुताबिक यदि कोई बच्चा परीक्षा में शून्य अंक भी लेता है, तो उसे भी पास करना पड़ता है।

मुख्यमंत्री द्वारा ग्रेडिंग प्रणाली को खत्म करने की घोषणा सचमुच एक सराहनीय कदम है। यह ग्रेडिंग प्रणाली ही सारी बीमारी की जड़ है। इसमें कोई भी विद्यार्थी फेल नहीं होता, जिसके कारण बच्चों के अंदर किसी भी प्रकार की असफलता का भय नहीं रहता है। बहुत सारे विद्यार्थी यह सोचते हैं कि बिना पढ़े भी पास तो हो ही जाते हैं, तो पढऩे की क्या जरूरत है।यह भी कि सरकारें अपने राजनीतिक हितों के लिए जरूरत से ज्यादा स्कूलों को अपग्रेड करती है। ज्यादा स्कूलों को अपग्रेड करने से शिक्षा में गुणवत्ता नहीं आएगी, बल्कि स्कूलों में अध्यापकों व मूलभूत सुविधाओं का प्रबंध करने से ही शिक्षा में गुणवत्ता आएगी। सरकारी स्कूलों में कई स्कूल ऐसे हैं, जो केवल एक अध्यापक के सहारे ही चले हैं। उस एक अध्यापक को स्कूल में पांच कक्षाओं को दिन के 20 पीरियड पढ़ाने के साथ-साथ बच्चों के दोपहर के भोजन से लेकर स्कूल की कई प्रकार की डाकों को भी तैयार करना पड़ता है। ऐसे में हम उस अध्यापक से गुणात्मक शिक्षा की आशा कैसे कर सकते हैं।

सरकारी स्कूलों में जब नया सत्र शुरू होता है, तो लगभग दो महीने तक बच्चों को किताबें ही नहीं मिल पाती हैं। इसलिए बच्चों का बहुत-सा मूल्यवान समय किताबों के इंतजार में ही चला जाता है। इस बारे में विशेष व्यवस्था करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही सबसे अहम पहलू यह है कि सबसे पहले अध्यापक भी अपने विषय के मास्टर हों। अध्यापकों को अपने विषय में बहुत ज्यादा अपडेट होने की जरूरत है। इसके लिए सरकार ने सर्व शिक्षा के माध्यम से अध्यापकों को प्रशिक्षित करने का बहुत प्रयास किया, परंतु कहावत है कि ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता ही गया। यही हाल आज शिक्षा जगत का हो रहा है। एक प्रयास और करने की जरूरत है, अमरीका व इंग्लैंड आदि देशों की तरह अध्यापकों का हर वर्ष की शीतकालीन और ग्राष्मकालीन छुट्टियों के समय-अपने विषय का अपडेट टैस्ट होना चाहिए। यह कहना भी तर्कसंगत नहीं है कि सरकारी स्कूलों में पढ़े हुए विद्यार्थियों में गुणात्मक शिक्षा की कमी होती है। हमने समाज में देखा है कि जो बच्चे किसी पद के लिए चयनित हो रहे हैं, उनमें से अधिकतर सरकारी स्कूलों में पढ़े हुए बच्चे ही होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सरकारी स्कूलों में गुणात्मक शिक्षा की कमी नहीं, परंतु कमी व्यक्तिगत व व्यवस्था के रूप में ज्यादा पाई जाती है।