जर, जोरू और जमीन, भाग-5

  • 2017-03-04 09:45:44.0
  • राकेश कुमार आर्य

जर, जोरू और जमीन, भाग-5

ये षडय़ंत्रकारी मिथक भी अब टूटना चाहिए कि भूमि को लेकर विश्व लड़ता आया है। इसके स्थान पर भारतीय संस्कृति की यह क्षात्र-परम्परा अब पुन: प्रतिष्ठित हो कि दूसरों की भूमि को लेकर हड़पना, उन पर अपना वर्चस्व स्थापित करना दुष्टता है, जिसके विरोध में हम सदा युद्घ करते आये हैं और करते रहेंगे। संक्षेप में जर, जोरू और जमीन पर विश्व के लडऩे के मिथक को ही अब परिवर्तित करने का समय आ गया है। राष्ट्रवादी सोच वाले लोग विचार करें कि इस प्रकार के मिथकों से हमारे समाज और राष्ट्र को क्या-क्या हानियां उठानी पड़ी हैं।'


निर्लिप्त भावना
महामति चाणक्य की इस घोषणा से सीख लेनी चाहिए कि-
'सत्य मेरी मां है। ज्ञान मेरा पिता है। धर्म मेरा भाई है। दया मेरी बहन है। शांति मेरी पत्नी है। क्षमा मेरा पुत्र है। मुझ अकिंचन राजनीतिज्ञ के यही छह सबसे प्रिय बंधु-बांधव हैं। जिस देश का प्रधानमंत्री कुटिया में रहता है वहां की प्रजा भव्य भवनों में निवास करती है। जिस देश का प्रधानमंत्री महलों में रहता हो, वहां की प्रजा तो झोंपडिय़ों में ही रहेगी। प्रजा का कोप सब कोपों से भयंकर होता है, क्योंकि देश की जनता ही सबसे बड़ी शक्ति होती है। इसीलिए सरकार को चाहिए कि पहले वह प्रजा को सुखी रखे।'
यदि कोई राजा प्रजा को दुखी करेगा तो वह दिन दूर नहीं जब प्रजा उसके विरूद्घ अवश्य विद्रोह कर देगी। ऐसी हालत में सरकार को कोई भी बचा नहीं सकता। भारत में प्रजा का कोप शांत हो गया। उसकी चेतना शक्ति मौन हो गयी। उसने भारत में उस राजनीतिक व्यवस्था को विकसित नहीं होने दिया, जिससे वह सचमुच राजा की निर्माता कही जा सके। सदियों से वह मौन रही है, उदासीन रही है, तटस्थ रही है-अपने स्वयं के राष्ट्रधर्म के प्रति। इसकी परिणति हुई है-राजनीतिज्ञों की आपराधिक छवि के रूप में।

मंदिरों की भूमिका
मुझे मथुरा दर्शन का सौभाग्य मिला। एक बात अंतस में वेदना बनकर मुझे बार-बार कचोटती रही। मैंने देखा कि हमारी संस्कृति के महान केन्द्र श्रीकृष्ण की इस भूमि में राधा-कृष्ण की ही धूम थी। किंतु 'राष्ट्रदेव' की कहीं उस समय चर्चा नहीं थी। योगीराज कृष्ण के राष्ट्र के प्रति राजनीतिक दर्शन और उनके 'यौद्घेय-स्वरूप' की कहीं चर्चा नहीं की जाती। इतने महान और आप्त पुरूष को केवल राधा का उपासक ही बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। यह हमारे राष्ट्र के लिए भारी अपशकुन है।
ऐसे मंदिर क्यों नहीं हैं जहां कृष्ण, कंस की हत्या कर रहे हों, जरासन्ध और शिशुपाल को उनके किये की सजा दे रहे हों और द्रोपदी के चीरहरण पर उनकी रक्षार्थ वहां हस्तिनापुर की राज्यसभा में जाकर अपना रौद्र रूप दिखा रहे हों। अत: महामति चाणक्य के इस कथन के उत्तर में कि-
'प्रजा का कोप सब कोपों से भयंकर होता है,'- उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि-प्रजा का मौन व उसकी तटस्थ भावना भी सब मौनों से भयंकर होती है।'प्रजा का कोप सब कोपों से भयंकर होता है,'- उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि-प्रजा का मौन व उसकी तटस्थ भावना भी सब मौनों से भयंकर होती है।

आज क्या हो रहा है?
जनता आज भी मौन है, तटस्थ है। सदियों से चुप रहकर मौन साध कर और तटस्थ रहकर भारत की जनता ने जिस कटुफल का रसास्वादन किया है, उससे उसने आज भी कोई शिक्षा नहीं ली है। मथुरा भ्रमण में मेरी पीड़ा इसी चिंतन से कुश्ती करती रही।
आज के 'अर्जुन' में तो वे गुण ही नहीं हैं तो फिर कृष्ण क्या करेंगे-अवतार लेकर। यहां उन्हें कौन मिलेगा? इन राजनीतिज्ञों की भीड़ में ऐसा कौन होगा जो आगे आकर कहेगा कि दुष्टों के संहार के लिए मैं स्वयं को बलि वेदी पर समर्पित करता हूं? मेरे पास गांडीव है, आप सारथी बनें, रण मैं झेलूंगा। याद रहे हमारे 'कृष्ण' को तो मात्र सारथी ही बनना है, लडऩा तो 'अर्जुन' को ही है। यदि कृष्ण साक्षात हमारे समक्ष आ उपस्थित हों तो हमने कभी यह नहीं सोचा कि हम उन्हें 'अर्जुन' के रूप में किन्हें देंगे? राजनीतिज्ञों में से गुण तो ऐसे उड़ गये हैं जैसे धूप में रखने पर कपूर उड़ जाता है। आज देश का प्रधानमंत्री झोंपड़ी में नहीं अपितु भव्य भवनों में है और देश की प्रजा झोंपड़ी में है। बहुत से लोगों के लिए तो सिर छुपाने के लिए यह झोंपड़ी भी नहीं है। जनता फिर भी तटस्थ है।

इतिहास और संस्कृति को परिवर्तित किया जा रहा है। यह कार्य राष्ट्र हत्या से कम जघन्य अपराध नहीं है। किंतु भारत की जनता इसे आपराधिक मौन साधकर चुपचाप देख रही है। इस देश में 'हिंदी, हिंदी और हिंदुस्तान' का नारा गुंजाने वाले लोग, जिनकी राष्ट्रभक्ति सदैव असंदिग्ध रही, यहां शासन और सत्ता से दूर रखे गये। यदि जनता अपने राजनैतिक अधिकारों और कत्र्तव्यों के प्रति जरा भी सावधान होती तो यहां ऐसा न होता। यहां की जनता सदा राष्ट्र-धर्म से पतित लोगों को शासन सुख भोगने का अधिकार देती रही। फलस्वरूप मुस्लिम तुष्टिकरण यहां बढ़ता गया और हिंदू विरोध की राजनीति करना धर्मनिरपेक्षता का पर्यायवाची बनता गया। कारण था-जनता की आपराधिक तटस्थता की नीति। जिसकेेकारण भारत के सांस्कृतिक मूल्यों से गंभीर छेड़छाड़ की गयी और उस छेड़छाड़ को हमने सहज रूप में झेल लिया। इस षडय़ंत्र का भण्डा फोडऩे का प्रयास नहीं किया।

जनसंख्या विस्फोट
आज इस्लाम में आस्थावान लोगों की संख्या एक सुनियोजित योजना के अंतर्गत देश में बढ़ रही है। इसके पीछे कुछ लोगों की एक योजना है, एक सोच है कि एक दिन यहां पुन: शासन सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया जाएगा।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)