भाषाओं का विश्व युद्घ और हिन्दी

  • 2016-12-11 04:45:03.0
  • राकेश कुमार आर्य

भाषाओं का विश्व युद्घ और हिन्दी

एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार विश्व की जितनी भर भी समृद्घ भाषाएं हैं उनमें हिन्दी का 10वां स्थान है। दु:ख की बात ये है कि यह स्थिति तब है जबकि सारे संसार में हिंदी बोलने व समझने वालों की संख्या सबसे अधिक है।
भाषाओं के विश्व युद्घ में हिंदी क्यों पिछड़ गयी? यह चिंता और चिंतन का विषय है। आइये, इस प्रश्न पर बिन्दुवार विचार करते हैं :-
''हमें हिंदी बोलने में लज्जा अनुभव होती है''
दूरदर्शन या आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाली चर्चाओं में भाग लेने वाले 'तथाकथित' विद्वान या किसी विषय के विशेषज्ञ या फिर किसी सभा या विचार गोष्ठी में भाग लेने वाले महानुभाव अक्सर अंग्रेजी में चर्चा करना पसंद करते हैं, और बड़े सहजभाव से कह जाते हैं कि 'मेरी हिंदी खराब है।' उनके ऐसा कहने पर श्रोताओं में कोई प्रतिक्रिया नही होती, अर्थात उनकी 'मौन सहमति' उस वक्ता को मिल जाती है जो यह कहता है कि उसकी हिंदी खराब है। मानो श्रोता उससे कह देते हैं कि यदि ऐसा है तो आप अंग्रेजी में बोल सकते हैं। अब यदि ऐसे वक्ता को कोई श्रोता साहस करके टोक दे कि आपकी-'चाहे हिंदी खराब ही है' पर आप हिंदी में ही बोलें, और उस पर अन्य सभी श्रोतागण अपनी सहमति दें तो 'मेरी हिंदी खराब है' की लोगों की राष्ट्रघाती प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकता है। 'मेरी हिंदी खराब है' इसे हम अपने लिए शान की बात समझते हैं और ऐसा कहने वालों को बोलने देते हैं। हमारी इस प्रवृत्ति से हिंदी 'भाषाओं के विश्वयुद्घ' में पिछड़ गयी। इस प्रकार की राष्ट्रघाती सोच से बाहर निकलने के लिए हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। जैसे :-
(1) प्रत्येक सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक संगठन अपने लोगों के लिए या वक्ताओं के लिए और कार्यकर्ताओं के लिए हिन्दी सीखना और हिन्दी में बोलना अनिवार्य करे।
(2) देश की सरकार देश की अन्य भाषाओं का सम्मान करते हुए प्रत्येक सरकारी कर्मचारी के लिए और विशेषत: अधिकारियों के लिए हिंदी सीखने और बोलने के लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण देने और इसके लिए प्रोत्साहित करने के लिए विशेष उपाय खोजे।
(3) 'मेरी हिंदी खराब है' बोलने वालों को हतोत्साहित करने के लिए प्रत्येक सभा के मंच पर पीछे की ओर, और मंच के एकदम सामने, जिधर को वक्ता मुंह करके बैठे होते हैं-उधर ऐसे बैनरों का प्रयोग किया जाए जिन पर 'हिंदी का अपमान-राष्ट्र का अपमान' आदि जैसे नारे लिखे हों, जिन्हें पढक़र वक्ता को ये सोचना पड़े कि उसे हिन्दी में ही बोलना है।
(4) जो लोग 'मेरी हिन्दी खराब है'- कहते हैं, उनके प्रति और उनके माता-पिता के प्रति समाज में एक ऐसा भाव उत्पन्न किया जाए कि ये लोग हिंदी विरोधी होकर राष्ट्र विरोधी भी हैं। क्योंकि इनके भीतर अंग्रेजी भक्ति के कारण भारतीय धर्म, संस्कृति और इतिहास के प्रति कोई लगाव नहीं है। ऐसा भाव समाज के लोगों में ऐसे लोगों के प्रति आना चाहिए। जबकि हम इसके विपरीत आचरण करते हैं और सोचते भी हैं। हम अंग्रेजी भक्त को ही सर्वाधिक सभ्य और सुसंस्कृत मानते हैं।

हिन्दी एक आक्रामक भाषा नहीं है
हिन्दी ने अपनी पहचान बनाने में स्वयं ने भी असावधानी और प्रमाद का प्रदर्शन किया है। वैसे इसकी ऐसी असावधानी और प्रमाद इसका कोई अपराध नहीं है, परंतु 'सदगुण विकृति' (एक ऐसा सदगुण जो हमारे लिए घातक सिद्घ हुआ) अवश्य है। जिन लोगों ने अपनी भाषा को आक्रामकों की भाषा बनाया, वे भाषाओं के विश्वयुद्घ में अग्रणी हो गयीं। अंग्रेज और उन जैसी कई अन्य जातियां या संप्रदायों के लोगों ने अपनी-अपनी भाषाओं को विश्व में एक आक्रामक भाषा का स्वरूप दिया और वे भाषाएं आज विश्व में अपनी पहचान एक अग्रणी भाषा के रूप में बना गयीं। भारत ने कभी दूसरे देशों पर आक्रमण नहीं किया, फलस्वरूप इसकी भाषा भी अपनी पहचान विश्व में एक अग्रणी भाषा के रूप में नही बना पायी। हम भारतीय लोग बड़ी सहजता से दूसरों के लिए अपना स्थान छोड़ देते हैं और उसके सामाजिक मूल्यों को उदारतावश अपनाने लगते हैं। किसी के लिए स्थान छोडऩा अच्छी बात है, सम्मान सबका होना चाहिए पर अपने सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों को बिसराकर अपने सम्मान की कीमत पर ऐसा नहीं होना चाहिए। दूसरों को अपना लें, पर अपने आपको न भूलें। दूसरों को अपनाने और स्वयं को भूल जाने की इस आत्मघाती प्रवृत्ति ने हमारी संस्कृति को और भाषा को खिचड़ी बनाकर रख दिया। अब इस खिचड़ी में हमें यह ढूंढऩा पड़ता है कि इसमें हमारे अपने चावल कितने हैं? हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी विदेशी भाषा का प्रसार देश की एकता और अखण्डता के लिए उतना ही घातक होता है, जितना कोई संप्रदाय या मजहब होता है। इस देश के बंटवारों को कराने में सम्प्रदाय की भांति ही भाषा का भी बड़ा भारी योगदान रहा है। हमने हिंदी को अपनी बात को धड़ल्ले से विश्व के सामने कहने और परोसने में संकोच किया है, जिससे यह भाषा आक्रामक भाषा नहीं बन पायी। हम स्वयं ही हिंदी में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बोलने में संकोच करते रहे और हमने देखा कि हमारी हिंदी विश्व मंच पर मच रही प्रतियोगिता में पिछड़ गयी।

हम हिंदी का वैज्ञानिक स्वरूप छिपाते रहे
दूसरों को सम्मान देने की हमारी सदगुण विकृति ने हमारे भीतर यह प्रवृत्ति भी विकसित की कि हम अपनी अच्छाइयों के बखान से भी स्वयं को बचाने लगे। इसलिए 'तू भी अच्छा मैं भी अच्छा' की तर्ज पर 'गंगा-जमुनी संस्कृति' की काल्पनिक बातें भारत में गढ़ ली गयीं। इन काल्पनिक बातों का या मान्यताओं का हिंदी भी शिकार हुई। हमने हिंदी के वैज्ञानिक स्वरूप को वर्णित करना छोड़ दिया। ऐसा केवल इसलिए किया गया कि कहीं दूसरी भाषाएं बुरा न मान जाएं। यह हमारी मूर्खता रही, क्योंकि वैज्ञानिक सत्यों और तथ्यों को केवल इसलिए छिपा लेना कि कहीं दूसरे बुरा न मान जायें-उचित नही कहा जा सकता। इस प्रकार की अतार्किक धारणाओं से विज्ञान का अनुसंधानात्मक कार्य भी प्रभावित होता है। ईसाइयत जब तक अपनी मजहबी मान्यताओं की जड़ता से नही निकली, तब तक वह विज्ञान की खोजों और आविष्कारों से वंचित रही। पर जैसे ही उसने अपने आपको मजहबी जड़ता से मुक्त करने का क्रांतिकारी निर्णय लिया तो उसके यहां वैज्ञानिक खोजों और अनुसंधानों की झड़ी लग गयी। भाषा के संबंध में भी हमें किसी प्रकार के पूर्वाग्रहों या जड़तावादी दृष्टिकोण से या 'तू भी अच्छा-मैं भी अच्छा, कुल मिलाकर सब अच्छे' की 'सदगुण विकृति' से मुक्त करना चाहिए। इसके स्थान पर 'जिसमें जितना अच्छा उतना स्वीकार और जितना गलत उतना अस्वीकार,' कर 'एक अच्छे' की खोज में लगना चाहिए। वैज्ञानिक सत्य यही है।
हमारी सरकारों को चाहिए कि वे हिंदी को वैज्ञानिक भाषा के रूप में स्थापित करने केे लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर की विचार गोष्ठियों का आयोजन करायें। अपनी भाषा की अच्छी बातों को और उसके वैज्ञानिक स्वरूप में विश्व बिरादरी के सामने लाना और उसको इसी रूप में मान्यता दिलाना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। जिन देशों ने अपनी भाषाओं का इस रूप में सम्मान किया है उनकी भाषाएं आज विश्व की समृद्घ और सम्मानित भाषाएं मानी जाती हैं।
हम हिन्दुस्थान वाले हिंदू हैं और हमारी भाषा हिंदी है, इसे कहने में हमें कोई संकोच नही होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हिंदी को लेकर हम सक्रिय हों और प्रत्येक प्रकार के संकोच से ऊपर उठें। तभी हिंदी भाषाई विश्वयुद्घ में विजयी हो सकेगी।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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