अपने मूल से हम क्यों कट गये?

  • 2016-07-28 13:00:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

अपने मूल से हम क्यों कट गये?

व्यक्ति की सोच समाज को प्रभावित करती है। यदि व्यक्ति की सोच स्वार्थी है तो वह दूसरों के जीवन का मूल्य नही समझेगा, और यदि व्यक्ति की सोच में परमार्थ है-स्वार्थ नही है, तो व्यक्ति दूसरों के जीवन का मूल्य भी समझेगा। 'मेरा-मेरा' का खेल मानवता के लिए और प्राणीमात्र के लिए घातक हो सकता है, इसलिए हमारे ऋषियों ने हमें 'यह मेरा नही' ऐसा कहना सिखाया। बात तो यह छोटी सी है परंतु 'राज ये गहरा बात जरा सी'-यह छोटी सी बात इसी ओर संकेत करती है।


मनुष्य के स्वार्थी होने के कारण ही आज पशु कट रहे हैं, ईंधन समाप्त हो रहा है, जंगल कट रहे हैं, फसलें समाप्त हो रही हैं, रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग से भूमि बंजर हो रही है और उपजाऊ शक्ति से हीन होती जा रही है, साथ ही जंगल उजडऩे से वर्षा कम हो रही है, और वर्षा कम होने से भूगर्भ के जल का स्तर नीचा होता जा रहा है।

हमारे ऋषियों ने जल संरक्षण के लिए और पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ी सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था बनाई थी। वे पानी का तनिक भी दुरूपयोग नही करते थे

, जल को देवता समझकर उसमें थूकते तक भी नही थे। इसलिए पानी निर्मल और पवित्र रहता था, जो हर व्यक्ति, पशु व पक्षी के लिए पीने के काम आता था। परंतु आज के तथाकथित सभ्य मानव ने पानी और पानी के स्रोतों के साथ इतना अत्याचार किया है कि सर्वत्र भूगर्भीय जल और पेयजल प्रदूषित हो गया है। साथ ही पर्यावरण संतुलन भी बिगड़ रहा है
, जिससे लोगों को बहुत सी घातक बीमारियों का शिकार बनना पड़ रहा है और असामयिक मृत्यु का भी सामना करना पड़ रहा है। यह है-भारत का वर्तमान। नितांत पीड़ादायक और विनाश का सूचक वर्तमान। अब प्रश्न केवल यही है कि जिस देश का वर्तमान ऐसा हो उसका भविष्य कैसा होगा? वर्तमान में उपस्थित परिस्थितियों को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारा भविष्य कितना अंधकारमय हो चुका है।

हम निश्चित रूप से विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। हमारी गाय माता पर अस्तित्व का संकट उत्पन्न होना, गंगा के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगने के समान है। क्योंकि गाय की रक्षा से पर्यावरण का और पर्यावरण की रक्षा से गंगा का गहरा संबंध है। हमारे देश के लोगों ने गाय और गंगा पूजनीय इसीलिए माना था कि ये दोनों प्राणीमात्र के कल्याण के लिए निरंतर और सतत प्रयत्नशील रहती हैं। गाय और गंगा के प्रति पवित्र भावना रखने के लिए गीता जैसा पवित्र ग्रंथ हमारे पास है-जो हमें हर उस जड़ और चेतन देवता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए प्रेरित करता है जो हमारे जीवन को गतिमान रखने में किसी भी प्रकार से सहायक है। गाय और गंगा के साथ जब गीता आकर जुड़ जाती है तो हमारी बुद्घि पवित्र हो जाती है और बुद्घि की पवित्रता का नाम ही गायत्री है। इसीलिए गीता
, गंगा, गायत्री और गाय इन सबका भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान है।

यदि गाय और गंगा को इस देश में प्राण संकट उत्पन्न होता है तो उससे भी पूर्व यहां गीता को प्राण संकट से जूझना पड़ जाएगा। क्योंकि गीता भारतीय मनीषा की बौद्घिक संपदा का

, संस्कृति का और वैदिक धर्म का प्रणेता और प्रचेता धर्म ग्रंथ है। यदि गाय और गंगा के प्राण संकट में हैं तो हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि हमने गीता से आत्मिक भोजन लेकर धर्म के आलोक में काम करना बंद कर दिया है। हमारी मनीषा में घुन लग गया है। इस मानसिक रूप से घुन लगे भारतीय समाज को कौन समझाये कि हमारे यहां तो वेद में स्पष्ट
उल्लेख है कि-

'आरे तो गोहनमुत पुरूषघ्नम्।'

अर्थात गाय और पुरूष की हत्या करने वाला तुझसे दूर रहे। इसी प्रकार अथर्ववेद में यहां तक कहा गया है कि-''यदि तू हमारी गौ, घोड़े और पुरूष को मारेगा तो तुझे हम शीशे की गोली से बींध देंगे, जिससे तू हमारे वीरों को नष्ट करने वाला न हो।'' अथर्ववेद में ही गाय को 'अघन्या

' कहा है। जिसका अर्थ है-'कभी न मारने योग्य।'

देखिये यजुर्वेद में भी आया है कि-'तू मनुष्यादि प्राणी के लिए इस असंख्य सुखों के साधन, कभी न मारने योग्य, गौ को मत मार।' इसी प्रकार के गोवंश-वध निषेध और पशु-वध निषेध से भी पग-पग पर वेद हमें सचेत और सावधान करते हैं। हमने वेद के उस सचेत और सावधान करने की आज्ञा को ही अपने लिए आदेश और उपदेश माना। जब तक हम वेदाज्ञा के अनुकूल कार्य करते रहे और अपने जीवन जगत का व्यवहार और व्यापार चलाते रहे तब तक किसी भी प्रकार के सामाजिक या राजनीति द्वंद्वाभासों से हमें गुजरना नही पड़ा। पर जैसे ही हम पर

'गंगा-जमुनी संस्कृति' का छद्म धर्मनिरपेक्षी भूत सवार हुआ तो हमने गीता, गंगा, गाय और गायत्री का भी साम्प्रदायिकरण कर दिया। फलस्वरूप हमारी वर्तमान दुर्दशा हमारे लिए अभिशाप बनकर हमारे सामने आ उपस्थित हुई है।

आज हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों से विमुख हो गये हैं,

क्योंकि हमारी वर्तमान शिक्षा वेद विरूद्घ हो गयी और हमारे धर्म और संस्कृति के विरूद्घ हो गयी। परिणाम स्वरूप भारत अपने शिक्षितों से वह लाभ अर्जित नही कर पा रहा है जैसी कि उनसे अपेक्षा थी। इस परिस्थिति की भयानकता के कारण और निवारण पर हमें आज विचार करना ही होगा।

शिक्षा किसी भी देश की आत्मा के संस्कारों को उसके बच्चों में आरोपित करने का एक उचित माध्यम होती है। यही कारण है कि शिक्षा से किसी भी देश के राष्ट्रीय संस्कारों का अथवा राष्ट्रीय मूल्यों का निर्माण और विकास होता है। किसी भी देश की शिक्षा का उसकी अपनी भाषा में प्रचार-प्रसार होना इसलिए आवश्यक है कि अपनी भाषा ही अपने पूर्वजों के संस्कारों की प्रचारक और प्रसारक हो सकती है। हमारे देश में वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने गंगा

, गीता, गाय और गायत्री से इसलिए दूरी बना ली है कि इस शिक्षा ने परदेशी भाषा अंग्रेजी को अपने प्रचार-प्रसार का माध्यम मान लिया। उचित यह होता कि हम अपनी बात अपनी भाषा में अपने बच्चों तक पहुंचाते। अंग्रेजी या उर्दू से किसी को घृणा करने की आवश्यकता नही है-घृणा की बात यह है कि इस देश में विदेशी भाषाओं के प्रचार-प्रसार और उनके शिक्षा का माध्यम बन जाने से हमारी अपनी भाषा और अपने संस्कारों पर कुठाराघात हो गया है, और हम अपने मूल से कट कर रह गये हैं।