कौन सुनेगा पाकिस्तानी हिन्दुओं की पीड़ा?

  • 2016-12-29 04:00:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

कौन सुनेगा पाकिस्तानी हिन्दुओं की पीड़ा?

पिछले सत्तर वर्ष से पाकिस्तान में रह गये हिंदुओं ने अत्याचार के नाम पर क्या-क्या नही सहा है? कर्ज के बदले अपनी लड़कियों का अपहरण कराया है, गुलामों की तरह वहां के बहुसंख्यकों के यहां रहकर काम किया है, काम करते-करते अपने सम्मान को अपनी आंखों के सामने नीलाम होते देखा है, इन सभी अत्याचारों को सहकर भी पाकिस्तानी हिंदुओं के सामने चुप रहने के सिवाय कोई चारा नही है। भारत में पाकिस्तानी हिन्दुओं की पीड़ा को उठाना भी धर्मनिरपेक्ष लेखकों के लिए 'पाप' माना जाता है। इसलिए इन लोगों की पीड़ा को शब्द नहीं मिल पाते और शब्द नहीं मिलते तो उन्हें हवा नहीं लगती, और हवा नहीं लगती तो वे किसी तक पहुंच ही नहीं पाते। सारी मीडिया को धर्मनिरपेक्षता का पाला मार गया है इसलिए पाकिस्तान में रह गये करोड़ों हिंदुओं को हमने धर्मांतरण की ऐसी यातनात्मक एवं क्रूरतापूर्ण प्रक्रिया में पड़ जाने दिया जो किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं कही जा सकती। सारे मानवाधिकारवादी इस दर्द से आखें बंद करके आगे बढ़ते हैं, उनके लिए इसी प्रकार बचकर आगे बढ़ जाना आधुनिकता है, देशभक्ति है और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा भी वह इसी प्रकार की अपनी प्रवृत्ति से होते देखने के अभ्यस्त हो गये हैं।


अब जो समाचार पाकिस्तान से मिल रहे हैं उनके अनुसार पिछले 15 -20 वर्षों में हज़ारों हिन्दू लड़कियों का अपहरण करके उनका धर्मपरिवर्तन कराकर मुसलमानों से निकाह कराया गया है। हिन्दू लड़कियां मनीषा से महाविश, भारती से आयशा, लता से हफ़सा, आशा से हलीमा व अंजलि से सलीमा आदि बनायी जाती आ रही है। रिंकल कुमारी की तो मीडिया में भी बहुत चर्चा रही फिर भी कोई सुनवाई न होने के उसको फरयाल बीबी बनना पड़ा था। हिन्दू लड़कियों की खरीद-बिक्री तो मुस्लिम समाज का पुराना क्रूर धंधा है। अनेक पीडि़त हिन्दू लड़कियां आत्महत्या कर लेती हैं। परंतु हिन्दू समाज वहां के मुस्लिमों के डर से कोई शिकायत भी नहीं कर पाते। अधिकतर पीडि़त हिन्दू दलित व गरीब होने के कारण अपनी बेटियों को ढूंढ भी नहीं पाते। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के अनुसार 2010 में यह भी पता चला था कि लगभग 25 हिन्दू लड़कियां प्रति माह पाकिस्तान में धर्मांधों का शिकार हो रही हंै। उस समय पाकिस्तानी मीडिया ने भी हिन्दू लड़कियों पर सिंध व बलूचिस्तान में हो रहे ऐसे अत्याचारों को स्वीकार किया था। जबकि आज की स्थिति और अधिक भयावह हो चुकी है।
यह तो सर्वविदित ही है कि 1947 में विभाजन के बाद वर्तमान पाकिस्तान में 15 से 20 प्रतिशत हिन्दू शेष थे जो अब घट कर लगभग डेढ प्रतिशत रह गये हैं। इस वर्ष के वैश्विक दासता सूचकांक के अनुसार 20 लाख से अधिक पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दू व अन्य गुलाम की तरह रहते हैं। धार्मिक वैमनस्य के कारण ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ था फिर भी वहां गैर मुस्लिमों पर खुल कर अत्याचार होते हैं। हिंदुओं का बलात धर्मपरिवर्तन किया जाता है विरोध करने पर प्राय: कत्ल कर दिया जाता है। हिंदुओं की संपत्ति पर जबरन कब्ज़ा करना व उन्हें वहां से खदेड़ देने की भी घटनाओं के समाचार मिलते रहे हैं। कभी-कभी अपनी पहचान छुपाने के लिये मुस्लिम नाम का सहारा भी हिंदुओं को लेना पड़ता है। गरीब हिंदुओं को नौकरी के लिए मुसलमान भी बनना पड़ता है। अनेक लोगों को खेत व भट्टे पर मजदूरी के लिए रखे जाने के अतिरिक्त घरेलू नौकर भी बनाया जाता है।

कुछ वर्ष पूर्व (दिसम्बर 2011) प्राचीन चंडी देवी मंदिर, डासना (ग़ाजिय़ाबाद ) में आये लगभग 27 पाकिस्तानी हिन्दू परिवारों से मेरी व्यक्तिगत चर्चा हुई थी। उनका दुखड़ा सुनकर मानवता भी शर्मसार हो जाती है। वे अपनी लड़कियों को घर से बाहर ही नहीं निकलने देते क्योंकि वहां के मुसलमान हिन्दू लडकियों को छोड़ते ही नहीं। हिन्दू बच्चों को स्कूलों में अलग बैठा कर इस्लाम की शिक्षा दी जाती है।इन बच्चों के लिये पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं होता।इसलिए अधिकांश बच्चे स्कूल नहीं जाते। वहां गरीब हिन्दू मज़दूरों को जंजीरों से बांध कर रखते हैं और मज़दूरी पर जाते समय जंजीरें खोल दी जाती हैं और सायं वापसी होने पर पुन: बाँध दी जाती हंै। इनको मारना-पीटना व भूखा-प्यासा रखना आम बात है। लंबे समय तक मजदूरी भी नहीं देते।
इसके अतिरिक्त एक सर्वे से पता चला कि लगभग 95 प्रतिशत मंदिरों व गुरुद्वारों को मदरसे व दरगाहों में परिवर्तित कर दिया गया है, कहीं कहीं गोदाम, दुकान, स्कूल व सरकारी कार्यालय भी बनाये गये। कुछ मंदिरों में पुजारियों को अन्य टोपी न होने के कारण मुस्लिम टोपी ही पहननी पड़ती है। पूजा-अर्चना धीमी आवाज में बंद दरवाजों में की जाती है। अगर हिन्दू ईद मनाएंगे तभी होली-दिवाली मनाने की सुविधा है। मुस्लिम घृणा यहां तक हावी है कि शव दहन के समय मुसलमान ईंट-पत्थर मार कर जलती चिता को बुझा देते हैं और अधजले शव को नाले में फेंक देते हैं। इतनी अधिक धार्मिक घृणा क्यों ? इसके पीछे है पाकिस्तान की पाठ्य-पुस्तकों में बालकों को आरम्भ से ही कट्टर इस्लाम पढाये जाने के अतिरिक्त यह भी बताया जाता है कि हिन्दू बुरी कौम है व भारत एक क़ाफिऱ देश है। जिसका दुष्परिणाम है कि हिन्दू बच्चों को क़ाफिऱ कुत्ता कह कर पुकारा जाता है। यह और भी दु:खद है कि एक अमरीकी संगठन के सर्वे के अनुसार हर चार पाकिस्तानियों में से तीन भारत के विषय में नकारात्मक विचार रखते है। अत: भारत सरकार को व मानवाधिकारवादियों को पाकिस्तान, बांग्ला देश,कश्मीर आदि में हो रहे हिंदुओं पर वीभत्स अत्याचारों के विरुद्ध वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक पहल करनी चाहिए। पाकिस्तान के इन हिंदुओं को भी मनुष्य समझकर इस सारे अधिकार प्रदान किये जाएं जो कि समस्त संसार में मानव मात्र को प्राप्त हैं। इसके लिए समय चूकना इन लोगों के साथ और भी अधिक अत्याचार करने के समान होगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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