हिन्दी विद्वानों के गुणगान पर हमें लज्जा आती है

  • 2016-12-18 05:30:32.0
  • राकेश कुमार आर्य

हिन्दी विद्वानों के गुणगान पर हमें लज्जा आती है

अंग्रेजों ने भारत में अपनी भाषा को लागू क्या किया उन्होंने अपने विद्वानों को महिमामंडित भी करना आरंभ कर दिया और जो भारतीय उनके विद्वानों को महान मानते थे उन्हें ही उन लोगों ने पढ़ा लिखा मानने की घोषणा करनी आरंभ की। इससे भारतवासियों का अपने ही महान भाषाविद पूर्वजों के प्रति अनादर का भाव विकसित होने लगा। उसी का भाव यह आया कि भारत में व्याकरण के महान आचार्य पाणिनि और उनकी पद्घति का धीरे-धीरे लोप होने लगा। यदि कोई व्यक्ति फिर भी पाणिनि को कहीं स्मरण करता था तो उसे रूढि़वादी और परंपरावादी कहकर चिढ़ाया जाता रहा। इससे हमें अपने ही लोगों को स्मरण करने में या उनका गुणगान करने में लज्जा की अनुभूति होने लगी। अब आचार्य पाणिनि को ही लें, इनके विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है कि-''पाणिनि और पतंजलि के समक्ष हजारों वर्षों से पूर्णता प्राप्त अमरभाषा के नियम निर्धारित करने का प्रश्न था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पाणिनि पद्घति की मुख्य प्रवृत्तियां निम्नांकित हैं-

(1) वैदिक एवं लौकिक दोनों धाराओं की संस्कृत भाषा का नियम निर्धारण करना
(2) सूत्रात्मक एवं वैज्ञानिक अष्टाध्यायी की रचना करना, जिसका विस्तार कात्यायन और महाभाष्यकार पतंजलि ने किया है और उसे प्रामाणिकता प्रदान की है।
(3) भर्तृहरि जैसे भाषा वैज्ञानिक ने उसे भाषादर्शन का आधार प्रदान किया।
(4) शब्दब्रह्म एवं स्फोटवाद की अवधारणा एवं बौद्घ पदार्थ के सिद्घांत की मान्यता।
(5) दूसरी ओर व्यवहार आधारित व्याकरण की संरचना करना और 'वैयाकरणा: लोकशरणा:' सिद्घांत की अनुपालना।
(6) शब्द की दार्शनिक व्याख्या एवं वाणी की चार अवस्थाओं का वर्णन।
(7) व्याकरण के मुख्य एवं गौण प्रयोजनों की विस्तृत व्याख्या।
(8) वाक्य की भाषा की मूल इकाई के रूप में स्वीकृति एवं वर्ण पद आदि की काल्पनिक अवधारणा।
(9) शब्द एवं अर्थ की एकरूपता की मान्यता।
(10) वर्णों का वैज्ञानिक वर्गीकरण, संधि सिद्घांत एवं मात्रा आदि का वर्णन।
(11) पदों का चार या दो वर्गों में वर्गीकरण आदि। हमारे लिए अपेक्षित था कि हम अपनी हिंदी भाषा की उन्नति एवं विकास के लिए महर्षि पाणिनि को सम्मान देते और उपरोक्त तत्वों को अपनाते। इससे हिंदी की वैज्ञानिकता को चार चांद लगते।

हिंदी में ध्वनि, वर्ण और अक्षर
हिंदी ने बड़ी गभीरता से ध्वनि, वर्ण और अक्षर में अंतर स्थापित किया है। ऐसी वैज्ञानिकता विश्व की अन्य भाषाओं में देखने को नहीं मिलती। विश्व की अन्य भाषाओं ने भाषा की संरचना में ध्वनि या शब्द के महत्व को उतनी गंभीरता से नहीं लिया है, जितना भारत में हिंदी भाषा ने लिया है। मानवीय ध्वनि या शब्द के माध्यम से भाषा की संरचना होती है। भाषा शास्त्रियों का मानना है कि शब्द या वाक के दो भेद हैं-आंतरिक और बाह्य। शब्द ध्वनि को वैखरी वाणी माना गया है। इसके द्वारा अर्थ को अभिव्यक्ति मिलती है और वह श्रोता तक पहुंचकर सम्प्रेषण केा स्पष्ट करता है। ध्वनि के उच्चारण से अर्थ का बोध होता है, वह ध्वनि कहलाता है, किंतु उसे मानवीय ध्वनि ही होना चाहिए। ध्वनि को लिखित रूप देने के लिए जिस प्रतीक का उपयोग किया जाता है-वह वर्ण कहलाता है। प्राचीन व्याख्या के विपरीत आज अक्षर का तात्पर्य वह ध्वनि समूह या वर्णसमूह है जिसका एक साथ उच्चारण होता है।

अक्षर का अभिप्राय ब्रहम और ब्रह्म विद्या से भी है। ब्रह्म विद्या का कभी क्षरण नहीं होता और वह आत्म कल्याण के लिए मनुष्य को सदा लगाये रखती है। इसी प्रकार अक्षरज्ञान (अर्थात ब्रह्मज्ञान) भी मनुष्य को आत्मकल्याण की ओर ले चलता है। हमारे गांव देहात में आज भी कुछ लोग अक्षरज्ञान को 'आखर ज्ञान' कहते हैं, इसलिए वे आखर सीखने को परमाश्वयक मानते हैं। प्राचीनकाल में अक्षरज्ञान का बड़ा महत्व था। अक्षरज्ञान का अभिप्राय तब ब्रह्मज्ञान से था। आखरज्ञान की परंपरा उसी प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। उस अक्षरज्ञान की वैज्ञानिकता की ओर विश्व की किसी भी भाषा का ध्यान कभी नहीं गया, ना ही उस अक्षर की प्राप्ति विश्व की किसी भाषा का कभी कोई उद्देश्य रहा है। भाषाओं के विश्व युद्घ में हिंदी के पिछडऩे का एक कारण यह भी है कि हमने हिंदी के अक्षरज्ञान के अंतिम उद्देश्य ब्रहम और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति की ओर विश्व के लोगों को बढऩे के लिए प्रेरित नहीं किया। हमने अपने ब्रह्मविज्ञान को अंग्रेजी जैसी भाषाओं के भौतिक विज्ञान की अपेक्षा कुछ हेय समझा। जिससे हमारी भाषा को विश्व भाषाओं की प्रतियोगिता में अपनी प्रामाणिकता सिद्घ करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
हिंदी के प्रति हमारी उपेक्षा वृत्ति के कारण डा. केलाग ने यह कह दिया कि हिंदी पर उर्दू का पर्याप्त प्रभाव है। इसका कारण आरंभ में मुसलमानों के अनेक अभियान होना तथा उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्र में उनके अधिकार का होना माना गया है। डा. केलाग के अनुसार उर्दू हिंदी से भिन्न दिखाई देती है, किंतु वास्तविक स्थिति यह है कि उर्दू भी हिंदी की एक विशेष शैली मात्र है। हिंदी की अन्य बोलियों से उर्दू केवल इस बात में भिन्न है कि इसमें संस्कृत प्राकृत के तत्सम तद्भव शब्दों और मुहावरों के स्थान में बडी मात्रा में अरबी फारसी के शब्द तथ वाक्य खण्ड प्रयुक्त होते हैं।
इस पर हमारा मानना है कि हिंदी को उर्दू के समानार्थक लाना हिंदी को कम करके जांचना होगा, क्योंकि उर्दू ने हिंदी के शब्द अपनाये हैं। इसका कारण यही है कि हिंदी की भांति उर्दू एक समृद्घ भाषा नहीं है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व भी नहीं है।

हिंदी के विषय में संबंध में डा. केलाग का मत है कि आज जो देश हिंदुस्तान कहलाता है उसमें ईसवी सन से बहुत पहले संस्कृत भाषी आर्यजन प्रविष्ट हुए थे। भारत के मूल निवासी आर्यों के अभियान के कारण अपने निवास स्थान छोड़ गये। उनमें से कुछ उत्तर भारत के पर्वतों या जंगलों में चले गये। इस स्थिति में शताब्दियों तक संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत भाषाएं भी चलती रहीं।
आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का भी मानना है कि हिंदी एक स्वतंत्र भाषा है और किसी भी भाषा के मूल शब्द उसके मूल धन होते हैं। वे हैं-क्रियापद, अव्यय, विभक्तियां और सर्वनाम। ये चार मुख्य स्तंभ हैं जिन पर किसी भी भाषा का स्वतंत्र अस्तित्व टिका रहता है। ये शब्द कभी बदलते नहीं। कभी भी किसी दूसरी भाषा से इन्हें कोई भाषा नहीं लेती। 'करता है' के स्थान पर करोति हिंदी में नहीं चलेगा। इसी तरह 'जब तुम आये' की जगह 'यदा तुम आये' भी प्रयोग में नहीं होगा। इसी प्रकार 'राम का पुत्र आया' के स्थान पर 'रामस्य: पुत्र: आया' का प्रयोग हिंदी में नहीं होगा। तात्पर्य यह है कि पूर्वोक्त चार बिंदुओं पर हिंदी के स्वतंत्र प्रयोग होते हैं और इसी कारण हिंदी एक स्वतंत्र भाषा है। हमें भाषाओं के विश्व युद्घ में हिंदी को विजयी बनाने के लिए इसके स्वतंत्र अस्तित्व को खोजने की ही आवश्यकता है। इस स्वतंत्र अस्तित्व को हिंदी का वैज्ञानिक स्वरूप ठोस आधार प्रदान करता है, जिसे अपनाकर यह भाषा विश्व में अपना प्रथम स्थान बना सकती है। वर्तमान में चाहे इसकी जो दशा हो, परंतु यदि इसे सही दिशा मिल जाए तो इसका भविष्य उज्ज्वल अवश्य है।