कश्मीर और नारी अस्मिता पर हम 'एक' हैं

  • 2016-07-28 03:30:45.0
  • राकेश कुमार आर्य

कश्मीर और नारी अस्मिता पर हम एक हैं

इस समय पाकिस्तान और चीन का गठबंधन भारत के लिए खतरनाक स्थिति-परिस्थितियां बनाता जा रहा है। इसमें कोई दो मत नही कि चीन को भारत की ओर से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कड़ी टक्कर मिली है। जिससे चीन भन्ना गया है। लगभग ऐसी ही स्थिति इस समय अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की बनी हुई है, उसे चीन के अतिरिक्त अन्य कोई देश भारत के विरूद्घ मुंह लगाने को तैयार नही है। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में जब किसी देश की ऐसी स्थिति बन जाती है जैसी आज चीन और पाकिस्तान की भारत ने बना दी है

, तो उस समय ऐसा देश चोट खाये हुए सांप की भांति विष से भरकर फुंफकारता हुआ घूमता है। उसे अपने शिकार की खोज रहती है और हर घात प्रतिघात को करते हुए वह अपने विरोधी को परास्त करने की युक्तियां खोजता है। चीन इस समय भारत को लेकर चिंतित है, वह एक 'दुर्बल' भारत की कल्पना से या भ्रांति से निकल नही पा रहा है और वर्तमान के सच को वह स्वीकार नही कर पा रहा है। उसे यह अच्छा नही लग रहा है कि भारत को अंतर्राष्ट्रीय जगत में भरपूर सम्मान और अच्छे साथी मिलें।

यह निर्विवाद रूप से सच है कि भारत का इस समय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान बढ़ा है और हमें कई मामलों में अच्छे साथी भी मिले हैं। यहां तक कि मुस्लिम देशों में भी भारत की बात को गंभीरता से लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जिसे एक सार्थक स्थिति ही कहा जाएगा। यह स्थिति भारत के लिए चाहे सुखद हो पर चीन और पाकिस्तान के लिए तो दुखद ही है। जिससे हमारे इन दोनों पड़ोसी देशों का खाना पचना बंद हो गया है।

इस सबके उपरांत भी भारत के नेतृत्व को अपने हित में सब कुछ अनुकूल समझकर किसी भी प्रकार के प्रमाद में फंसने की आवश्यकता नही है, और ना ही अपनी पीठ अपने आप थपथपाने की भूल करनी है। ऐसी परिस्थितियों में भारत को बहुत ही सधी हुई भूमिका का निर्वाह करने की आवश्यकता है। उसे अपनी आंखें खोलनी होंगी

, चौकन्ना रहना होगा। शत्रु हमारे ही पैरों के नीचे से धरती फोडक़र भी निकलकर हमारे सामने खड़ा हो सकता है, आगे से वार भी कर सकता है और पीठ पीछे से भी छुरा घोंप सकता है। किसी भी प्रकार का प्रमाद या आत्मप्रशंसा की स्थिति हमारे लिए घोर कष्टों का कारण बन सकती है। नेतृत्व का चौकन्ना और सावधान रहना ही आवश्यक नही है, अपितु देश के जनमानस का और राजनीतिक दलों का चौकन्ना और सावधान रहना भी आवश्यक है।

देश की सुरक्षा को लेकर एक रहना हमारी सांस्कृतिक वैभवपूर्ण पंरपरा है। देश के सभी राजनीतिक दल और सामाजिक संगठनों को एकजुटता दिखाते हुए शत्रु की चालों को समझना होगा। यह बहुत ही महत्वपूर्ण घटनाक्रम है कि हमारे विरूद्घ पाकिस्तान और चीन इस समय

'एक' होते जा रहे हैं। पाकिस्तान के भारत के प्रति दृष्टिकोण को चीन समझता है और भारत पाकिस्तान के दौत्य संबंधों को चीन भली प्रकार समझता है। इन दोनों पड़ोसी क्षेत्रों को यह कभी भी स्वीकार नही होगा कि भारत उभरती हुई एक विश्व व्यवस्था बन जाए
, साथ ही इन दोनों देशों की संयुक्त शक्ति को भी ललकारने की स्थिति में आ जाए। ऐसे 'समर्थ भारत' को ये देश कमजोर बनाये रखना चाहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में चीन और पाकिस्तान अपनी पुरानी मित्रता को दोहरा सकते हैं।

पुरानी दोस्ती का अभिप्राय है कि जैसे 1962 के युद्घ के पश्चात पाकिस्तान ने अक्साई चिह्न अर्थात अक्षय चिह्न

को चीन को दे दिया था। तब से लेकर चीन और पाकिस्तान दोनों मिलकर कश्मीर के लिए एक सुर में एक आवाज निकालते हैं। अब कुछ लोगों को ऐसी चिंता होने लगी है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर को चीन को दे सकता है। उसकी सोच ऐसी हो सकती है कि 'बिल्ली खाये नही बिखेर तो दे ही।' तब ऐसी परिस्थितियों में बहुत कुछ संभव है कि कश्मीर को लेकर भारत, पाकिस्तान और चीन तीनों देश भिड़ जाएंगे। समझ नही आता कि उस समय कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले उन आतंकी संगठनों का क्या होगा जो कश्मीर की आजादी के नाम पर ही जीवित हैं और जिन्हें कश्मीर की आजादी के नाम से ही खुराक मिलती है
?

भारत के राजनीतिक दलों ने कश्मीर को लेकर एक सुर निकालने का संदेश दिया है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव सहित अन्य विपक्षी दल भी देश की सुरक्षा के विषय में सरकार के साथ खड़े दिख रहे हैं। जिसे देश के हित में एक शुभ संकेत ही माना जाना चाहिए।

इस समय देश की राजनीति में 'मायावती-दयाशंकर' का लाइव टैलीकास्ट हो रहा है। जो कि हमारी राजनीति का एक विद्रपित दृश्य है। हमारे लिए अभी तक यह स्पष्ट नही हो पाया है कि नारी की अस्मिता केवल नारी की अस्मिता है, वह दलित, शोषित, उपेक्षित, अगड़ी-पिछड़ी नारी में तोडक़र नही देखी जा सकती। जो लोग नारी की अस्मिता को इस प्रकार तोडक़र देखने का प्रयास कर रहे हैं उनकी संकीर्णता भारतीय राजनीति को भी संकीर्ण बना रही है। क्या ही अच्छा हो कि भारत की राजनीति इस संकीर्णता से भी बाहर निकले और समाज को तोडऩे वाली शक्तियों की खेमेबंदी को यथाशीघ्र तोडऩे का साहस करके दिखाये। हमारे भीतर के अंतर्विरोध हमारे बाहरी शत्रुओं को हमारे विरूद्घ भोजन पानी देते हैं और हमारी शक्ति को क्षीण करते हैं।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने दयाशंकर सिंह की बेटी के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया है वे शब्द बसपा के इस नेता की पाशविक सोच को बताते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि

'असहिष्णुता' के नाम पर अपनी उपाधियां लौटाने वाली 'हल्ला ब्रिगेड' इस समय मौन साधे पड़ी है। जबकि असहिष्णुता अब इतनी बेशर्म हो चुकी है कि वह एक अबोध बालिका के दामन पर भी हाथ रखने का साहस कर चुकी है। सचमुच ऐसे हाथों को काटने का समय आ गया है। भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी को अब अपने '56 इंची सीने' को दिखाना ही होगा। कश्मीर में जो कुछ हो रहा है या कश्मीर को लेकर पाकिस्तान और चीन की क्या खिचड़ी पक रही है उधर तो ध्यान देना ही होगा साथ ही भारत के भीतर भी
'नाग' कहां तक पहुंच गये हैं, उन्हें यह भी देखना होगा। दयाशंकरसिंह गलत थे और उन्हें लेकर यदि भाजपा ने त्वरित निर्णय लेते हुए उन्हें पार्टी तक से निष्कासित किया तो भाजपा को नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसों के खिलाफ भी वैसी ही त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए। इसमें प्रदेश की सपा सरकार को भी अपेक्षित सहयोग करना चाहिए। नारी की अस्मिता को लेकर कोई राजनीति नही होनी चाहिए। इस बिंदु पर भी हम वैसे ही एकता का परिचय दें जैसे नेताजी मुलायमसिंह यादव ने देश की सुरक्षा को लेकर अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है।