विश्वगुरू के रूप में भारत-8

  • 2017-08-16 15:00:39.0
  • राकेश कुमार आर्य

विश्वगुरू के रूप में भारत-8

भारत के आर्य लोगों का संदेश था कि हर व्यक्ति को स्वराज्य के सुराज्य का रसास्वादन लेने का पूर्ण अधिकार है। वेद कहता है कि-
'सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्टï्रे दधातूत्तमे'(अथर्व 12/1 /8) इसका भावार्थ है कि हमारी मातृभूमि उत्तम राष्टï्र में कांति और शक्ति धारण करे, अर्थात हम लोग कांति और शक्ति धारण करने वाले हों, जिससे यह पृथ्वी उत्तम लोगों से युक्त हो। प्रत्येक व्यक्ति को कांति और शक्ति तभी मिल सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति को लोकतंत्र की खुली हवाएं मिलती हों और उन्हें अपने व्यक्तित्व के विकास के सभी अवसर उपलब्ध होते हों।
वेद ने कहीं पर भी किसी क्षेत्र विशेष के लोगों के लिए अपना उपदेश नहीं दिया है, अपितु उसने सारे भूमंडल के लोगों को अपना मानकर अपनी बात कही है। वेद के इसी दृष्टिïकोण के कारण यह वसुधा वेद रूपी संविधान से करोडों वर्ष तक शासित होती रही। उस अवस्था को धर्म का अर्थात नैतिकता का शासन कहा जाता है। यह वह काल था जब सब लोग स्वभावत: एक दूसरे का सम्मान करते थे और किसी के भी अधिकारों का हनन न करके उनका सम्मान किया करते थे। पश्चिमी जगत के लोगों ने और आधुनिक राजनीति शास्त्रियों ने धर्म के शासन को 'पाप' माना है। (यह अलग बात है कि उनके अपने यहां शासन संप्रदाय के आधार पर चलता है) आज तक वे लोग धर्म के शासन का रहस्य पता नहीं कर सके। उन्हें धर्म की परिभाषा याद नहीं है, परंतु वह अपने संप्रदाय के प्रति पूर्णत: निष्ठावान हैं। उनका अनुसंधान का क्रम वातानुकूलित भवनों और भौतिक सुखों की चाहत में भटक चुका है। वे अपनी काल्पनिक मान्यताओं में जीते हैं और यह सोचने के लिए तैयार नहीं हैं कि धर्म का शासन क्या होता है?
पश्चिमी विचारक कभी-कभी इतना अवश्य कहते हैं कि एक अवस्था ऐसी आ जाएगी जब राज्य नहीं होगा और ना ही राज्य के कानून होंगे। ऐसा वह इसलिए कहते हैं कि कई लोग राज्य और कानून को व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक मानते हैं। उनके इस कथन का दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि वे यह बताने में असफल रहे हैं कि राज्यविहीन और कानूनविहीन यह स्थिति आएगी कैसे? हमारा मानना है कि यह स्थिति आ तो सकती है-पर तभी आ सकती है-जब भारत को और भारत की नैतिक धर्म व्यवस्था को समझा जाए। भारत की नैतिक धर्म व्यवस्था व्यक्ति व्यक्ति को एक ही जाति का मानने से परस्पर भाई-भाई मानती है। इसलिए वह हर व्यक्ति को एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने की प्रेरणा देती है। वह संकीर्णताओं की सभी दीवारों को गिराना चाहती है। संसार से अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश करना चाहती है और इस अज्ञान में व्यक्ति के अहंकार को या दूसरों को कष्टï पहुंचाने की उसकी प्रवृत्ति को सबसे बड़ा रोड़ा मानती है।
वास्तव में विश्व की राजनीतिक व्यवस्थाएं अपने स्वार्थ के लिए अपना अस्तित्व बचाये रखना चाहती हैं, उनका उद्देश्य है कि मानव मानव परस्पर लड़ते रहें तो हमारा स्वार्थ पूरा होता रहे। जबकि भारत की राजनीतिक व्यवस्था धर्म के नैतिक नियमों में ढालकर मनुष्य को मनुष्य से जोडक़र चलना चाहती है। वेद (ऋ 5/66/9) ने स्वराज्य की साधना को पूर्ण करने के लिए विद्वानों के सहयोग की बात कही है, विद्वानों के सहयोग के बिना स्वराज्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। वेद के इसी संदेश को भारत के लोगों ने अपनी राजनीति का आधार बनाया और राज्य संचालन में विद्वान राजा और विद्वान ब्राह्मïण का साथ होना अनिवार्य घोषित किया। उन्होंने यह समझा कि राजा को विद्वान होना चाहिए जबकि आज की राजनीति राजा का विद्वान होना अनिवार्य नहीं मानती। आज का राजा कम पढ़ा-लिखा भी चल सकता है। बस एक ही शर्त है कि वह जनता से मत प्राप्त करके किसी सीट से चुनकर आ जाए।
आज के किसी प्रधानमंत्री के द्वारा राजधर्म का पालन कई बार इसीलिए नहीं हो पाता कि वह सुशिक्षित, सुसंस्कृत और चरित्रवान नहीं होता। वेद उसके सुशिक्षित, सुसंस्कृत व चरित्रवान होने की अपेक्षा करता है। वेद जहां स्वराज्य की प्राप्ति में विद्वानों का सहयोग अनिवार्य मानता है-वहीं यह भी कहता है कि स्वराज्य की रक्षा बहुत से लोग मिलकर कर सकते हैं। कहने का अभिप्राय है कि सभी लोगों का दृष्टिïकोण स्वराज्य के प्रति श्रद्घाभाव वाला होना चाहिए, तभी स्वराज्य की रक्षा हो सकती है। जब स्वराज्य से सबको ममता होगी तो सभी उसके लिए प्रयत्न करेंगे। यह स्वराज्य वेद के शब्दों में विशाल होना चाहिए। क्षुद्र स्वराज्य सबका भला नहीं कर पाएगा। विशाल स्वराज्य का अभिप्राय है कि धरती के सभी लोगों को अपना भाई मानो और उसके प्रति मानवता के अपने धर्म के माध्यम से उससे जुड़ो। स्पष्टï है कि हमारा ऐसा भाव तभी आ सकता है जब हम धरती के प्रत्येक मानव की एक ही जाति मानेंगे और एक जाति शासक बनाकर धरती पर आयी है और दूसरे लोग शासित बनकर आये हैं-ऐसी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठेंगे।
विश्वगुरू भारत का यह भाव ही विश्व को शांति दे सकता है और स्थायित्व दे सकता है और उन्नति के अवसर प्रदान कर सभी मनुष्यों को स्वराज्य का वास्तविक सुख प्रदान कर सकता है। शेष संसार अभी सीख रहा है। हमें लगता है कि वह अभी और सीखेगा। इसका कारण यह है कि वहां वादों का और विचारधाराओं का संघर्ष है। वे किसी 'वाद' पर चर्चा तो करते हैं पर उसे संसार के लिए अनुपयोगी सिद्घ होने के उपरांत भी अपनाये रखने की प्रवृत्ति बनाये रखते हैं। जिससे उनमें संघर्ष बना रहता है। जैसे कम्युनिस्ट विचारधारा संसार के लिए अनुपयोगी सिद्घ हो चुकी है, पर चीन जैसा विशाल देश उसे अभी भी अपनाये हुए है और न केवल अपनाये हुए है अपितु उसे संसार पर बलात् थोपने की भी सोचता है। उसका यह प्रयास उसे साम्राज्यवादी बनाता है और बहुत संभव है कि वह अपनी इसी अज्ञानता के कारण तीसरे विश्वयुद्घ का नायक ही बन जाए। कुल मिलाकर यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
विश्वगुरू भारत की मान्यता रही है कि एक विचारधारा या वाद को तभी अपनाओ जब वह मानवता के हितार्थ उपयोगी सिद्घ हो चुका हो या जिससे हर जन को लाभ मिलना सुनिश्चित हो। भारत के इस भाव ने उसे मानवता का हितचिंतक बनाया और यही कारण रहा कि उसकी प्रत्येकमान्यता से मानवता लाभान्वित हुई। मि. कोलमैन का कथन है कि-''भारत के साधुसंतों एवं कवियों ने नैतिक नियमों की शिक्षा दी और इतने सुंदर कवित्व का प्रदर्शन किया-जिसकी श्रेष्ठता स्वीकार करने में विश्व के किसी भी देश, प्राचीन अथवा अर्वाचीन को लेशमात्र भी झिझक ना हो।''
भारत के प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने मार्च, अप्रैल 1813 में ब्रिटिश पार्लियामेंट के दोनों सदनों के समक्ष हिंदुओं के विषय में कुछ साक्ष्य दिये थे। जिनका सार इस प्रकार था कि-''हिंदू सौम्य, सुशील, परोपकारी हंै। उनका कोई उपकार करता है तो उसके लिए वे कृतज्ञता ज्ञापित करने को सदा तत्पर रहते हैं। इसके विपरीत यदि कोई उनके प्रति बुराई करता है, तो वे उससे बदला लेने के विषय में बहुत कम सोचते हैं। इस भूमंडल पर विद्यमान अन्य जातियों की अपेक्षा हिंदू लोग कहीं अधिक स्वामी भक्त, प्रेम एवं सौहार्दपूर्ण तथा न्याय के सिद्घांतों व आदर्शों का पालन करने वाले हैं।''
वारेन हेस्टिंग्स ने भारत के लोगों के विषय में जो कुछ अब से 200 वर्ष पूर्व कहा था-वह आज भी उतना ही सत्य है, जितना उस समय था। इसका कारण यही है कि भारत के मूल्य सनातन हंै उसका धर्म सनातन है, वह कभी भी पुराना नहीं हो सकता। इसलिए उसके टूटने-फूटने या गलने-सडऩे की कोई संभावना नहीं हो सकती। ऐसे में यदि भारत संपूर्ण भूमंडल के लोगों की एक जाति (मानव) और एक धर्म (मानवता) मानता है तो इसे विश्व का एक सनातन मूल्य मानकर विश्व के समाजशास्त्रियों और राजनीतिशास्त्रियों को वैश्विक मंचों पर स्वीकार करना चाहिए, जिससे कि विश्व से राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश हो सके। भारत को अपना मत सही ढंग से विश्व मंचों पर रखने की आवश्यकता है।
आयुर्वेद और विश्व स्वास्थ्य
भारत ने आयुर्वेद की खोज की और उससे संपूर्ण मानवता को स्वस्थ रखने में सफलता प्राप्त की। आज के विश्व में लोग चिकित्सा और शिक्षा को नि:शुल्क देने की बातें करते हैं और हर देश की सरकार नि:शुल्क चिकित्सा व शिक्षा देने का वचन देती है। पर व्यावहारिक सत्य यही है कि आज के विश्व में चिकित्सा और शिक्षा ही सबसे अधिक महंगी हैं। भारत में अधिकतर लोग इसलिए मृत्यु का ग्रास बनते जा रहे हैं कि वे समय पर अपनी चिकित्सा कराने में असफल रह जाते हैं। यही स्थिति शिक्षा की है। सरकारें नि:शुल्क शिक्षा देने की बातें करती हैं, पर सच यह है कि नि:शुल्क शिक्षा का लाभ लोगों को मिल नहीं पा रहा है।
भारत में शिक्षा को शुल्क लेकर पढ़ाना अपराध माना जाता था। शुल्क लेकर शिक्षा देने वाले अध्यापक को आचार्य जैसे सम्मान पूर्ण संबोधन से संबोधित ना करके 'उपाध्याय' कहा जाता था। 'उपाध्याय जी' के संबोधन से ही स्पष्टï हो जाता था कि यह व्यक्ति शिक्षा बेचता है। नि:शुल्क शिक्षा देने से एक देश में चरित्रबल को सुधारने में सहायता मिलती थी, दूसरे सब विद्यार्थी एक साथ पढ़ते थे अर्थात राजा और रंक एक साथ विद्या पाते थे-इससे सामाजिक समानता का भाव विकसित होता था, तीसरे शिक्षा में कोई घोटाला या भ्रष्टïाचार न होने के कारण बच्चों पर यह संस्कार पड़ता था कि वह भी अपनी विद्या का उपयोग जनसेवा के लिए करेंगे।
गुरूकुल से शिक्षा प्राप्त कर बाहर निकले विद्यार्थी जब जनसेवा का दायित्व संभालते थे तो उनमें से चिकित्सा के क्षेत्र में जाने वाले विद्यार्थी रोगियों से सहानुभूतिपूर्वक बात करते हुए और उनके सेवक बनकर उनका रोग निवारण करते थे। अपनी औषधियों का मूल्य लेकर अपनी आजीविका केे लिए कुछ थोड़ा बहुत जो भी लेते थे उसे भी रोगियों की इच्छा पर ही छोड़ देते थे। अधिकांश वैद्य लोग अपनी आजीविका का साधन अलग से रखते थे। इसलिए चिकित्सा को वह सेवा का अवसर मानकर ही प्रयोग करते थे। रोगी को जब स्वास्थ्य लाभ हो जाता था तो उस समय उसे वैद्य लोग कहा करते थे कि अब आप स्वस्थ हो गये हो-तो अपनी सामथ्र्यानुसार इतना अनाज पशु पक्षियों को दान कर देना, या इतना आटा चींटियों को खिला देना या किसी निर्धन व्यक्ति की बेटी का विवाह करा देना आदि। इस प्रकार वैद्य लोग अपनी सेवा का प्रतिफल भी परमार्थ में ही व्यय करा देते थे। इससे सारे प्राणियों का कल्याण होता था।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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