विश्वगुरू के रूप में भारत-22

  • 2017-09-08 03:30:16.0
  • राकेश कुमार आर्य

विश्वगुरू के रूप में भारत-22

चमड़े को मृत पशुओं के शरीरों से उतारकर उसका जूते-जूतियां या अन्य वस्तुओं के बनाने में प्रयोग करने की कला भी विश्व में भारतीयों ने ही प्रचलित की। इसी प्रकार गौ-भैंस को दूहने की कला और उनके दूध से विभिन्न प्रकार के पेय या भोज्य-पदार्थ बनाना, दही, घी बनाना या निकालना आदि भी एक कला है। इस कला में भी भारतीय लोग प्राचीनकाल से ही पारंगत रहे हैं। अपनी इस कला के संवद्र्घन के लिए प्राचीन भारतवासी गौ पालन में विशेष रूचि रखते थे। उन्होंने गौ को अपनी अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना लिया था। यही कारण है कि गौ संवद्र्घन को लेकर भारत का प्रत्येक नागरिक उस समय सचेष्ट और सक्रिय रहता था। गोवध को देश में पूर्णत: पाप माना जाता था।
कपड़ा सीना, जल में तैरने की कला, घर के बर्तनों को मांजने की कला, वस्त्रों को धोने की कला, हजामत (क्षुरकर्म) बनाने की कला, तेल निकालने की कला, हल चलाना और उससे खेती करने की कला, पेड़ों पर चढऩे की कला, दूसरे व्यक्ति के मन की बात जानकर उसके अनुसार उसकी सेवा करने की कला, बांस ताड़ आदि के पात्र से टोकरी, डांपी आदि बनाने की कला, जल से खेती की सिंचाई करने की कला, (खेतों में क्यारियां बनाना, गूल बनाना, ऊंचाई पर पानी को ले जाने के लिए मेंड बनाना इत्यादि) जहां दलदल हो वहां से पानी को निकालने की कला, लोहे के हथियार बनाने की कला, जिन पशुओं से सवारी लेनी हो उनकी पीठ के लिए जीन या काठी (पल्याण) बनाने की कला, शिशु पालन की कला, बच्चों को खिलाने के लिए खिलौने बनाने की कला, अपराधियों को उनके अपराध के अनुसार दण्ड देने की कला, अलग-अलग देशों की लिपि को सुंदरता से लिखने की कला, पान को सूखने से बचाने की कला, भारत में ये 62 कलाएं प्रमुख मानी गयी हैं।
इनसे अलग आदान और प्रतिदान को भी इन कलाओं का प्राण मानकर स्वीकृति दी गयी है। किसी कार्य को फुर्ती से करना आदान है और उसी कार्य को देरी तक करते रहना प्रतिदान कहलाता है। किसी भी कार्य को इन दोनों में से किसी एक का सहारा लेकर ही पूर्ण किया जा सकता है। इसीलिए आदान और प्रतिदान को सभी कलाओं का प्राण कहा जाता है।
भारत के ऋषियों ने जिस गंभीर चिंतन के उपरांत उपरोक्त 64 कलाओं की खोज की उससे उनकी उच्च जीवन-शैली का पता चलता है। इनके अवलोकन से यह तथ्य भी स्पष्ट हो जाता है कि भारत में 'हिन्दुत्व' नाम की जीवन प्रणाली के विकास में इन चौसठ कलाओं का विशेष योगदान रहा है। आज ये चौसठ कलाएं न्यूनाधिक सारे विश्व ने अपनाने का प्रयास किया है। जिससे यह तथ्य भी स्पष्ट हो जाता है कि यदि विश्व भारत की कलाओं को अपना रहा है तो मानो वह भारत के हिंदुत्व को ही अपना रहा है। इस स्थिति पर हम सबको गर्व होना चाहिए। क्योंकि ऐसा करके विश्व ने भारत के हिंदुत्व को भी विश्वगुरू की मान्यता दे दी है। हिन्दुत्व की यह सारी जीवनशैली पूर्णत: वैज्ञानिक और तार्किक है। प्रत्येक कला के पीछे विज्ञान का बल है और मनुष्य की उत्कृष्टतम मेधा शक्ति का प्रदर्शन झलकता है। इस अवस्था तक पहुंचना हर किसी के वश की बात नहीं है। बड़ी-बड़ी सभ्यताएं और विश्व की महान संस्कृति कही जाने वाली कई संस्कृतियां मिट गयीं-इसका कारण एक यह भी रहा होगा कि उनके पास जीवन जीने की उत्कृष्टतम जीवनशैली का निश्चय ही अभाव रहा होगा।
भारतीय शिक्षा प्रणाली और विश्व
शिक्षा मनुष्य को मनुष्य बनाने की एक प्रक्रिया का नाम है। दूसरे शब्दों में कहें तो मनुष्य में मनुष्यता लाने का अर्थात उसे निज धर्म से ओतप्रोत करने का माध्यम शिक्षा है। मनुष्य मनुष्य तभी बनेगा-जब उसमें भद्रता समाविष्ट होगी, श्रेष्ठता अर्थात आर्यत्व का समावेश होगा। यह भद्रता व्यक्ति में सुशिक्षा और सुसंस्कारों से ही आती है। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा संस्कारप्रद होनी चाहिए। ऋग्वेद (2/21/8) में परमपिता परमेश्वर से श्रेष्ठ धन की प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि-''तू मुझे उत्साह अर्थात सत्कर्म का ज्ञान दे, सौभाग्य प्रदान कर, श्रेष्ठ साधनों से धन कमाने की प्रेरणा दे, मेरे शरीर को अक्षत रखो अर्थात मैं जीवनभर शरीर से स्वस्थ रहूं क्योंकि यह शरीर धर्म का साधन है, मेरी वाणी में मिठास दो और मेरे अच्छे दिन बीतें ऐसी प्रेरणा मुझे करते रहें।''
एक शिक्षित और सुसंस्कारित व्यक्ति ईश्वर से ऐसी ही प्रार्थना करता है। भारत ने मानव को कर्मशील बने रहने की प्रेरणा दी है। निकम्मा व्यक्ति कभी भी धर्मशील नहीं हो सकता है। वह दूसरों का धन हरने की योजनाएं बनाता है, और उसका सारा चिंतन परधन को हरने में ही लगा रहता है। उसका निकम्मापन संसार को अपराधशाला बना देता है। क्योंकि उसकी देखा देखी अन्य लोग भी उसी रास्ते का अनुकरण करने लगते हैं, जिस पर वह चल रहा होता है। संसार में ऐसा निकम्मापन न फैले इसके लिए वेद व्यक्ति को कर्मशील बने रहकर धन कमाने की प्रेरणा देता है।
वेद की शिक्षा है कि संसार में उन्नति की प्राप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य को कुछ मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। इन मर्यादाओं का उल्लेख ऋग्वेद (10/05/6) में आया है। वहां सात मर्यादाओं को जीवनाचरण में उतार कर मानव जीवन को सफल करने की शिक्षा दी गयी हे। वेद की सात मर्यादाएं हैं-
(1) अहिंसा-इसका अभिप्राय है कि मनुष्य अपने मन, वचन और कर्म से किसी को भी किसी प्रकार की पीड़ा न पहुंचाये।
(2) सत्य-मनुष्य को सदा ही यथाशक्ति सत्य का ज्ञान प्राप्त कर जीवन में उसे आचरण में लाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
(3) अस्तेय-मनुष्य जब मनुष्यता से गिरता है-तो वह दूसरों का धन हरने का प्रयास करता है। वेद मनुष्य को इस पतितावस्था से ऊपर उठाकर देव बनने की प्रेरणा देता है और कहता है कि तू अस्तेय अर्थात पराये धन को बिना स्वामी की आज्ञा के न लेने वाला बन।
(4) शौच :-मनुष्य को सदा ही शुचिता का ध्यान रखना चाहिए। शुचिता अर्थात पवित्रता शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अर्थात व्यवहार शुद्घि होती है। इनसे व्यक्ति को सदा ही पवित्र रहने का प्रयास करते रहना चाहिए।
(5) ब्रह्मचर्य-मनुष्य को अपनी जीवनी शक्ति अर्थात वीर्य की रक्षा के लिए भी सक्रिय रहना चाहिए, और वेदाध्ययन आदि करके व्यभिचार त्याग और वीर्य रक्षा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
(6) स्वाध्याय:- स्वाध्याय का अभिप्राय आत्माध्ययन है। अपने आप से अपनी बात करना और कहना। इस वात्र्तालाप में अपनी दुर्बलताएं व दुष्टताएं खोजना और फिर उन्हें प्रयत्नपूर्वक दूर करने के लिए कार्य करना।
(7) ईश्वर प्राणिधान-ईश्वर प्राणिधान का अभिप्राय है कि सारे दिन जो कुछ भी किया जाए उसे ईश्वर को साक्षी मानकर किया जाए और अंत में सोने से पूर्व उसे ईश्वर के समर्पित कर दो। उससे कह दो कि मैं जो कुछ भी हूं-तेरे कारण हूं। मेरे पास अपना कुछ नहीं, जो कुछ है-वह आपका है और जो है ही आपका उस पर मेरा अधिकार नहीं।
इन सात मर्यादाओं का पालन करने से मनुष्य का जीवन और आचरण सोने से कुंदन बनता जाता है। उसके जीवन की पवित्रता औरों के लिए अनुकरणीय हो जाती है। भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली ऐसी ही मर्यादाओं को मनुष्य के जीवनाचरण में रचा-बसा देने का प्रयास करती थी। जिससे मनुष्य आर्य बने और यह संसार उसके लिए स्वर्ग बन जाए। जो लोग शिक्षा ज्ञान के ज्योतिर्मय रथ पर आरूढ़ हो जाते हैं-वे कर्मकुशल विद्वान पाप रहित मनुष्य संसार के कल्याण के लिए प्रकाशमय प्रभु के आनंद धाम में रहने के अभ्यासी हो जाते हैं, अर्थात संसार में रहकर भी उनका चित्त ईश्वर के श्री चरणों में लगा रहता है। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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