अनेकता में एकता

  • 2016-10-10 03:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

अनेकता में एकता

भारत का इतिहास हमारे उपरोक्त मत की पुष्टि करता है। हम पराधीन इसीलिए हुए कि हमारे भीतर एकता में अनेकता का रोग पैर जमा चुका था। विदेशी हमारे एक भाई को पीटता रहा, मातृभूमि के एक टुकड़े को हड़पता रहा और ऐसा कई बार हुआ कि हम अपने ही भाई की पिटाई और अपनी ही पवित्र मातृभूमि के अपवित्र विभाजन को पत्थर की आंखों से देखते रहे। यद्यपि ऐसे भी अनेकों उदाहरण हैं कि जब हमारे राजाओं ने विदेशी आक्रांताओं के विरूद्घ संघ बनाकर युद्घ किया, किंतु 'जयचंदी परंपरा' के कारण भारत ने तथाकथित पराधीनता के पराभव काल को भी देखा है-यह भी स्वीकार करना पड़ेगा।


हमारी अपनी कुछ दुर्बलताओं के कारण भारत का विशाल विश्व साम्राज्य छिन्न-भिन्न होता गया और मजहब के आधार पर देश का विभाजन भी होता गया। विभाजन, सीमांकन, पिटाई और पराधीनता की इस करूण-कहानी के पीछे का रहस्य क्या था? हमारी एकता का अनेकता में विभाजित और विखंडित हो जाना। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उचित होता कि इतिहास के इस सच को स्वीकार किया जाता। बुराई के मूल पर प्रहार किया जाता। सच को सच के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता। उस पर झूठ का परदा डालकर झूठ को सत्य के रूप में महिमामंडित नही किया जाता, और हमें यह न पढ़ाया जाता कि भारत में अनेकता में एकता है। इसके विपरीत भारत की अनेकताओं को समेटकर एकता के झण्डे तले लाने का राजनीतिक स्तर पर गंभीर प्रयास होना चाहिए था, पर राष्ट्रधर्म से हीन बुद्घिजीवियों ने इतिहास के सच को कूड़ेदान में फेंक दिया और लग गये हमारा मन खिलौनों से बहलाने में। इन्हें नही पता कि :-
जंगे आजादी लड़ी तब अपने सपने और थे।
हाल अपना आज जो है वो कभी सोचा न था।।
एकता में अनेकता को बढ़ावा देने वाली हर मानवीय प्रवृत्ति पर हमारे नेतृत्व ने रोक लगाने की जगह राष्ट्र समाज के उन बिंदुओं और कारणों को बढ़ावा दिया जिनसे राष्ट्र और समाज में विघटनवादी तत्वों का वर्चस्व बना। उदाहरण के लिए धर्म परिवर्तन को यहां खुली छूट दी गयी। जिसने समाज में अनेकता के भाव को जन्म दिया। इस धर्म को मजहब का पर्यायवाची बताया गया और मजहब के लिए बताया गया कि यह तो 'आपस में बैर रखना' सिखाता ही नहीं है।

सभी मजहब सच्चे हैं और सबका एक ही लक्ष्य है-ईश्वर की शरण में जाना, अथवा श्रेष्ठ मानव और मानवीय समाज की संरचना करना। इसी प्रकार भाषाओं की क्षेत्रीय पहचान को बनाये रखने के लिए आवश्यक माना गया है। इस सोच के विषय में हम यह अनुमान नहीं लगा सके कि इसका परिणाम व्यवहार में क्या हुआ? राष्ट्र में एक भयानक बखेड़ा खड़ा हो गया है।
भारत में भाषा और वेशभूषा की विभिन्नताएं भारत के पराभव के उस काल की दैन है जब यहां एक सुदृढ़ केन्द्रीय सत्ता का अभाव हो गया था। छोटे-छोटे राज्य अथवा रियासतें जिनमें 563 तो वर्तमान भारत की ही थीं-इनमें पाकिस्तान और बांगलादेश, बर्मा व श्रीलंका की ऐसी रियासतों को जोड़ें तो इनकी संख्या लगभग एक सहस्र हो जाती थी।

इन स्वतंत्र रियासतों में से कइयों की सोच इतनी संकीर्ण थी कि वे भारत को नहीं अपितु अपनी-अपनी रियासतों को ही राष्ट्र मानती थी। मुसलमानों ने राष्ट्र का पर्यायवाची रियासत ही किया था। सैकड़ों वर्षों की परतंत्रता को भोगते-भोगते और इस रियासत शब्द को अपने विषय में सुनते-सुनते इनके निवासियों की सोच भी ऐसी ही हो गयी थी कि उनका राष्ट्रवादी चिंतन संकीर्ण और दूषित हो गया था।

इंडियन यूनियन नही भारत राष्ट्र
जब भारत इस काल से गुजर रहा था तो उस समय जितनी रियासतें थीं उनकी भाषा वेश भूषा, में अंतर था। अंग्रेजों के उत्तराधिकारी कांग्रेसियों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस अंतर को ज्यों का त्यों स्वीकार किया। भारत को 'इंडियन यूनियन' कहा गया। इस राष्ट्र के विघटन और विखण्डन के लिए उत्तरदायी जिस सोच को हमें मिटा देना चाहिए था, उसे इस देश को 'यूनियन' कहकर हमने संरक्षण, प्रोत्साहन और प्रश्रय प्रदान किया। स्वतंत्रता पूर्व की रियासतों की भाषाएं आज भी बोलियों के रूप में यहां विद्यमान हैं। जिससे स्पष्ट है कि हम भारतीय समाज में आज तक साहित्यिक एकता भी स्थापित नही कर पाये हैं। बोलियों की रेखाएं मिटकर भाषा में विलीन हो जानी चाहिए थीं। तब हम मानते है कि अपना राष्ट्र सचमुच एक राष्ट्र है। जिसकी एक राष्ट्रीय मुख्य धारा प्रवाहित हो रही है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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