अनेकता में एकता-2

  • 2016-10-11 03:45:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

अनेकता में एकता-2

किंतु व्यवहार में कावेरी जल विवाद, यमुना-सतलुज लिंक नहर पर पंजाब और हरियाणा के आपसी विवाद जब देखे जाते हैं तो ज्ञात होता है कि राष्ट्रीय मुख्यधारा तो आज भी कहीं अवरूद्घ है। वास्तव में ये नदी-जल विवाद नही है, अपितु ये राष्ट्रीय मुख्यधारा में बहने वाले और उससे बाहर रहने वाले लोगों के मध्य विवाद है। जिनको विविधता में एकता की ढाल ही यहां अपना संरक्षण देकर बचाती है।
यदि अनेकताओं को, विविधताओं को एवं छद्म विभिन्नताओं को मिटाने का संकल्प लेकर हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व यह कहता कि 'एकता में अनेकता बाधक है और उसे मिटाया ही जाएगा' तो आज राष्ट्र का स्वरूप ही कुछ भिन्न होता हुआ दिखलाई पड़ता। हम मजहब के नाम पर राष्ट्र का विभाजन देख चुके हैं। किंतु फिर भी हमें भारत को विभिन्न मजहबों का देश कहने में तनिक भी लज्जा नही आती। पहले तो मजहब के नागों को दूध पिलाते हैं, और फिर राष्ट्र की एकता और अखण्डता को खतरा होना बताते हैं।

हमारी इस मनोदशा से स्पष्ट है कि हम आज तक ये नही समझ पाये कि मजहब के नागों को हमारी किस सोच से दूध मिल रहा है और राष्ट्र को किन लोगों से कैसा खतरा है? हममें इतना साहस नही कि हम ये घोषणा कर सकें कि जब सभी मजहब सच्चे हैं और उनका एक ही लक्ष्य है श्रेष्ठ मानव और मानव समाज की संरचना करना, तो मजहबों के उन बिंदुओं को खोज लिया जाए जो मानव को मानव से दूर करते हैं। तत्पश्चात ऐसी घातक मान्यताओं के बिंदुओं को निकाल बाहर किया जाए।

भारत में ऐसा नही हो सकता। क्योंकि यहां मानव को दानव बनाने वाली सभी विकृतियों को यथावत रखकर उनके मध्य ही श्रेष्ठ मानव और मानव समाज की संरचना की मूर्खतापूर्ण संकल्पना की गयी है। सचमुच हम मानसिक रूप से कितने दिवालिये हो गये हैं? यह सोच इसी स्थिति को परिलक्षित करती है। हमारी सोच है कि हम दानव बनने और विखंडित होने की सारी सामग्री को अपने चहुं ओर एकत्र किये रखेंगे, किंतु फिर भी संसार में एक श्रेष्ठ राष्ट्र के रूप में उभरकर दिखाएंगे। हमारी सोच बन गयी कि हम झाडिय़ों को काटेंगे नही, उन्हें समाप्त करते हुए भी मार्ग नही बनाएंगे, अपितु उनमें कूदकर उन्हें पार करने का कार्य करके दिखाएंगे।

जबकि इस राष्ट्र के आदर्श 'महामति चाणक्य' का मानना था कि झाडिय़ों को समाप्त ही नही करना है अपितु उनकी जड़ों को खोद खोदकर उनमें मट्ठा और चूना डाल देना है जिससे पुन: किसी भी स्थिति में उनको पनपने का अवसर न मिले। किसी भी समस्या से निपटने का यही वैज्ञानिक और तार्किक उपाय है। हमारे आदर्श पुरूष चाणक्य ने झाडिय़ों से समझौता नही ंकिया, इसलिए वह झाडिय़ों को समूल नष्ट करने और अपना राजपथ बनाने में सफल रहे। जबकि हमने झाडिय़ों से समझौता कर लिया और उनके बीच कूद गये। लगभग छह दशकों से यह राष्ट्र इन झाडिय़ों के मध्य अटका, भटका, लटका और पटका पड़ा है। लहूलुहान है किंतु किसी को इसकी इस अवस्था की सुधि नही है।

राष्ट्र के नायक तोते बन गये हैं, जिन्होंने एक ही राष्ट्रीय वाक्य रट लिया है कि भारत में 'अनेकता में एकता' है। इसकी संस्कृति विभिन्न संस्कृतियों के मेल से बनी है। इसके इस स्वरूप को हम बिगडऩे या बिखरने नही देंगे। महामति चाणक्य के उत्तराधिकारियों की इस दशा को देखकर इन पर दया आती है। ये सचमुच अज्ञान और राष्ट्रधर्म से हीन पतितावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, जो दया के पात्र हैं, बेचारे हैं। स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृति और स्वदेश की बातें करना इन्हें राष्ट्र के विखण्डन को बढ़ावा देने वाली बातें जान पड़ती हैं। इसलिए इनसे राष्ट्र के भले की अपेक्षा करना भी मूर्खता है। राष्ट्र के शासकों से अपेक्षा की जाती है कि राष्ट्र में विभिन्न संप्रदायों के मध्य न केवल शांति बनाकर रखेंगे अपितु इन संप्रदायों को धीरे-धीरे समाप्त करने के लिए भी सचेष्ट रहेंगे। राष्ट्र में समरूपता और समानता स्थापित करने के लिए एक भाषा, एक भूषा एक धर्म (मानवता) स्थापित करने हेतु सक्रिय रहेंगे। ये स्वीकार करेंगे कि हमारी, दिशा, हमारी ढाल, हमारी वाणी, हमारे कार्य, हमारा चिंतन, हमारा व्यवहार, हमारी मान्यताएं, हमारी धारणाएं, सभी राष्ट्र के केन्द्र बिंदु से उद्भूत होंगी और उसी में विलीन हो जाएंगी। यही होगा आदर्श राज्य। यही होगा लोकोपकारी राज्य और यहन्ी होगा वास्तविक राम राज्य। जब तक अनेकता में एकता का नीरस राग अलापने वाले तोते इस राष्ट्र का नेतृत्व करते रहेंगे तब तक यह सपना मात्र सपना ही बना रहेगा। राष्ट्रहित में नवयुवक सामने आएं और समझें राष्ट्र के आवाह्न को, राष्ट्र की आत्मा की पुकार को और समय की ललकारभरी हुंकार को। आज राष्ट्र तुम्हें पुकार रहा है, उसका मौन तुम्हें ललकार रहा है-
उठो आलस्य छोड़ निद्रा त्यागो, बजाओ यहां क्रांति का बिगुल।
जिसे स्वतंत्रता तुम्हें बताया उससे यह राष्ट्र हुआ है व्याकुल।।
राष्ट्र की आत्मा आज रोती है, इसे भेडिय़ों ने ही तो नोंचा है।
करना है स्वरूप परिवर्तित इसका, अब हमने ये ही सोचा है।।
अत: समग्र शांति के लिए नवयुवक कह दें-
यही हमारा प्रण है, यही हमारा व्रत है। यही हमारा संकल्प है। वाणी इसी में रत है। क्रांति का चल पड़ा रथ है। आगे दीख रहा पथ है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

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