उजड़ता भारत, भाग-4

  • 2016-11-25 03:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

उजड़ता भारत, भाग-4

बनावटी दूध
परिणामस्वरूप सिंथेटिक दूध बनाने वालों की चांदी कट रही है। 8-9 (2003 में) रूपये प्रति किलो की दर से यह दूध तैयार हो जाता है जो बाजार में 15 से 30 रूपया प्रति किलो बिकता है। उधर सिंथेटिक दूध पी-पीकर भारत का यौवन बूढ़ा होता जा रहा है। वर्तमान चौपट हो रहा है और भविष्य पर भयावह प्रश्नचिन्ह लग रहा है। जबकि इधर पशुधन की कटाई, उनका वध और हत्या निरंतर जारी है, न तो सरकार को इसे रोकने की चिंता है और न सामाजिक संगठनों को देश की और उसके भविष्य की चिंता है। सचमुच भारत की मनीषा को घुन लग गया है जो कि अब उजड़ते भारत को देखकर भी मूक बनी बैठी है।

आज हमारे यहां गाय को कसाई के साथ बेचने वाला व्यक्ति खुद कसाई को दोष देता है कि मैं तो निष्पाप हूं, पापी है तो यह व्यक्ति है जो इस निर्दोष पशु पर अपनी निर्मम छुरी चलाएगा। जबकि कसाई कहता है कि मैं भी निष्पाप हूं, पापी है तो वह जिसने इस निर्दोष पशु को कटने के लिए मेरे हाथों बेचा।
इसी प्रकार गो-मांस खाने वाला बेचने वाले पर और काटने वाले पर और गोमांस पकाने वाला या गौ के चर्म से बने जूते आदि पहनने वाला भी बेचने वाले या काटने वाले पर ही दोषारोपण करते हुए मिल जाएंगे। ऐसे दोषारोपण की प्रवृत्ति उत्पन्न होने का एकमेव कारण है हमारी धर्मनिरपेक्षता। हम धर्महीन हो गये हैं, अपना धर्म भूल गये हैं। जबकि सन 1857 ई. में हमें अपना धर्म स्मरण था जब गाय की चर्बी लगे कारतूसों के कारण अंग्रेजों को हमारे भारी विद्रोह का सामना करना पड़ता था।
हमें स्वतंत्रता मिली थी तो उसके मूल में गाय की चर्बी से बने इन कारतूसों के कारण हुए प्रथम स्वातंत्रय समर का यह इतिहास भी बोल रहा था। किंंंतु स्वतंत्रता के उपरांत हमने गाय को स्वयं ही मारना और खाना प्रारंभ कर दिया। क्योंकि स्वतंत्रता मिलते ही हम 'धर्मनिरपेक्ष' हो गये।

गाय की महिमा
-गाय हमारे लिए कितना उपयोगी पशु है? आज हम पैसे के लालच में सभी कुछ भुला बैठे हैं, देखिये-
-गाय के सूखे गोबर पर एक चम्मच गाय का घी डालकर धुंआ करने से 9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का पर्यावरण शुद्घ होता है।
-गाय के गोबर से लिपे मकान पर रेडियोधर्मिता का कोई प्रभाव नही पड़ता।
-गाय के घी से यज्ञ करने पर एक तोला घी से दो टन ऑक्सीजन बनता है।
-मात्र एक गाय के गोबर से प्रतिवर्ष 450 लीटर बायो गैस मिलता है जिसके उपयोग से 6 करोड़ 80 लाख टन लकड़ी बचेगी। जिससे 15 करोड़ वृक्ष कटने से बचेंगे और पर्यावरण का संरक्षण होगा। गैस के आयात के कारण होने वाले करोड़ों रूपये बचेंगे।
-चिकित्सकों के शोध प्रबंध बता रहे हैं कि गाय का दूध कालेस्ट्रॉल नही बनाता है जिससे हृदयाघात का खतरा नही रहता।
दुर्भाग्य से आज भारत में 4000 (2003 में) से भी अधिक कत्लखाने चल रहे हैं, जिनकी संख्या स्वतंत्रता के पूर्व मात्र 300 थी। अब जबकि गाय को गाय माता के रूप में पूजने का समय आया तो हमने उसे कटने और बे-मौत मरने के लिए विवश कर दिया क्योंकि हम शिक्षित हो गये हैं।
उधर हमारे वे अशिक्षित पूर्वज थे जिन्होंने विदेशी शासकों के समय में रहते हुए भी पशुधन और गोधन का संरक्षण और संवर्धन किया था। आप अनुमान लगायें कि फिर महान कौन हम शिक्षित या वे अशिक्षित हमारे पूर्वज?

मानवभक्षी शिक्षा
भला ऐसी शिक्षा भी किस काम की जो व्यक्ति की मानवता को ही समाप्त करा दे? वे शिक्षित किस काम के जो शिक्षा का अर्थ तक न जानते हों। जो आंकड़े हैं वे न केवल इन शिक्षितों की पोल खोलते हैं अपितु इतने भयानक हैं कि रोंगटे खड़े कर देते हैं जैसे-
-संसद में दिये गये सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग तीस हजार गोवंश प्रतिदिन कट रहा है।
-भारत में गायों की लगभग आधा दर्जन नस्लें पूरी तरह समाप्त हो चुकी है जबकि कई समाप्ति के कगार पर है।
-पाकिस्तान, बांग्लादेश में तस्करी से प्रतिदिन 20 हजार गोवंश जाता है। बकरीद पर तो यह पांच लाख से ऊपर की संख्या में पहुंचता है।
-यदि गोवंश समाप्ति की स्थिति और गति यही रही तो आगामी दशकों में भारत से गोवंश पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा।
इस दर्दनाक और भयानक स्थिति को हम 'भारत' का उजडऩा और 'इंडिया' का बसना मानते हैं। वास्तव में हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात जितनी गिरावट हर क्षेत्र में अनुभव की जा रही है उतनी अंग्रेजों के समय में भी नहीं की गयी थी। आज पशु कट रहे हैं ईंधन समाप्त हो रहा है, जंगल कट रहे हैं, फसलें समाप्त हो रही हैं, रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग से भूमि बंजर हो रही है और उपजाऊ शक्ति से हीन होती जा रही है, साथ ही जंगल उजडऩे से वर्षा कम और वर्षा कम से भूगर्भ के जल का स्तर नीचा होता जा रहा है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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