उजड़ता भारत, भाग-3

  • 2016-11-23 03:30:03.0
  • राकेश कुमार आर्य

उजड़ता भारत, भाग-3

पिछली पीढ़ी के अशिक्षित भी कितने मानवीय थे? कितने सहृदयी और परोपकारी थे कि अनुचित साधन से की जाने वाली कमाई को पाप समझते थे। जबकि आज का शिक्षित व्यक्ति केवल पैसा कमाना चाहता है- साधन चाहे जैसा भी हो। पहले वाले की मानवीयता, सहृदयता और परोपकारिता भारत की संस्कृति की अंतश्चेतना का वह मूल्यवान मोती है जिसने उस व्यक्ति को अशिक्षित होते हुए भी मानव बनाये रखा, जबकि दूसरे व्यक्ति का इन मूल्यों की ओर किंचित भी चिंतित न होना पश्चिम की उपभोक्तावादी और भौतिकवादी अपसंस्कृति की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।

आज जब पढ़े लिखे लोगों पर पश्चिम का उपभोक्तावाद हावी और प्रभावी होता जा रहा है और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का निरंतर क्षरण और लोप होता जा रहा है तो दुख के साथ कहना पड़ता है कि 'भारत उजड़ रहा है?' भारत के मूल्य और भारत की संस्कृति पुराने लोगों के साथ समाप्त होती जा रही है।

मैंने हृदय से अपने उस परिचित के पिताश्री को अपनी श्रद्घांजलि अर्पित की। आज के शिक्षितों से वह हमारे अशिक्षित पूर्वज निश्चित रूप से भले थे, उच्च थे और महान थे। अपनी संस्कृति के प्रति पूर्णत: आस्थावान इन लोगों के वियोग पर पीड़ा होती है-मन कहता है-क्यों छूटते जा रहे हैं हमसे ये लोग? इनके मूल्य, इनका युग, इनके विचार, इनकी मान्यताएं, इनकी आस्थाएं, इनके सिद्घांत और इनके उच्चादर्श हमसे कहां विलीन हो रहे हैं?
मैक्समूलर के शब्दों में कहें तो हमारे पूर्वजों के ये अनन्यतम् सदभाव थे। इन्हीं अनन्यतम सदभावों के कारण ही हम विश्व में समादृत रहे। आज ये सदभाव उजड़ रहे हैं तो हम और हमारा भारत भी उजड़ रहा है।

मनीषा को घुन लगा
युगों-युगों से भारत में एक विचार हमारे पूर्वजों के मन मस्तिष्क में संस्कार बनकर बैठ गया था कि पशुओं की रक्षा करनी है और जीवों पर दया करनी है। वेद का पावन आदेश भी है कि-''पशूनपाहि''-अर्थात पशुओं की रक्षा करो। और 'मा हिन्सी तन्वा:' अर्थात शरीर से हिंसा मत करना।

हमारे महान मनीषियों ने वेद का ये संदेश जन-जन तक पहुंचाया तो भारतीयों के मन मस्तिष्क पर एक संस्कार के रूप में अंकित हो गया। फलस्वरूप इस देश में पशुधन का संरक्षण, संवर्धन, पालन और पोषण होता रहा। यज्ञों के नाम पर पशुबलि देने का नीचतापूर्ण कार्य करने का काल भी यद्यपि भारत में आया किंतु महर्षि दयानंद सरीखे महान लोगों के सत्प्रयासों से वेद का पशुधनसंवर्धन और संरक्षण का धर्म पुन: प्रतिष्ठित हो गया।

अत: स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक ही नही 20-25 वर्षों पश्चात तक भी भारत में लोग पशुधनसंवद्र्घन और संरक्षण को अपना पुनीत कार्य मानते थे। इसलिए किसी भी कसाई को कोई पालतू पशु गाय, भैंस आदि देना घोर पाप माना जाता था, किंतु आज भारत की कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार के राज्य में कथित शिक्षित वर्ग गाय, भैंस आदि पशुओं को कसाइयों के हाथ बेचकर उसे बूचड़खानों में कटवा रहा है।

अनपढ़ों का विवेक
कितने अच्छे थे वे अनपढ़ लोग जो अपने धर्म को भली प्रकार समझते थे कि 'पशुधनसंवद्र्घन' ही हमारा धर्म है। चाहे उन्हें पशु हत्या से पर्यावरण संतुलन बिगडऩे की जानकारी न हो, किंतु उन्हें अपना धर्म ज्ञात था और यह उनका धर्म ही था जो पर्यावरण संतुलन को भी बनाये हुए था और उनसे पशुओं की रक्षा भी करवा रहा था। आज पर्यावरण संतुलन क्यों, कब और कैसे बिगड़ सकता है? ये जानकारी भी है, व्यक्ति शिक्षित भी हो गया, किंंतु अपना धर्म भूल गया है। इसलिए गायों के इस देश में न केवल अन्य पशुओं का निर्ममता से वध हो रहा है अपितु गोवंश को भी अपने अस्तित्व का भय उत्पन्न हो गया है।
आज सचमुच दुखी मन से यही आवाज बार-बार भीतर से आती है कि कहां गये वे लोग जो अशिक्षित होकर भी भारतीय मनीषा के रखवाले थे? यहां की बौद्घिक संपदा के वास्तविक और सच्चे उत्तराधिकारी थे।

दुग्ध उत्पादन का अंाकड़ा
एक आंकलन के अनुसार भारत में जो दुग्ध उत्पादन वर्तमान में हो रहा है उसके आधार पर प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए जो दुग्ध की मात्रा आती है वह मात्र 125 ग्राम दूध की है। अर्थात यदि आपने दो चाय दिन में पी लीं तो समझ लें कि आपने अपने हिस्से का दूध पी लिया। दूध की यह प्रति व्यक्ति मात्रा वह है कि पानी मिलाने के पश्चात नापा जाता है। यदि शुद्घ दूध की मात्रा निकाली जाए तो वह तो और भी कम होगी।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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