निजी अनुभवों की सांझ-6

  • 2017-04-29 09:30:08.0
  • राकेश कुमार आर्य

उत्तराखण्ड के भूकंप के समय और गुजरात के भूकंप के समय मेरे मित्रों ने (जो या तो वहां गये या किसी भी प्रकार से निकटता से जुड़े रहे) मुझे बताया कि नकद धनराशि बहुत कमी के साथ उन लोगों तक पहुंच पाती है जिनके लिए वह भेजी जाती है। उसका अधिकांश भाग तो अधिकारियों के द्वारा ही डकार लिया जाता है। प्रधानमंत्री 'राहत कोष' से जो पैसा ऐसे समय के लिए दिया जाता है उसमें से भी अपना कमीशन मारे बिना ये 'भेडिय़े' नही मानते। पुनर्वास कार्यों को जानबूझकर लंबा खींचते हैं जिससे लंबी योजना से लंबा चौड़ा बजट तैयार हो और फिर लंबा चौड़ा ही कमीशन मिले।

यदि मानवता इसी का नाम है तो फिर दानवता क्या होगी? मानव ही मानव की पीड़ा को यदि सुनना, समझना और देखना छोड़ देगा या उसके प्रति संवेदनाशून्य हो जाएगा, या उसकी आंखें इस पीड़ा के प्रति पत्थर की बन जाएंगी, या उसका हृदय इतना कठोर हो जाएगा कि पीड़ा की चोट से भी पिघलेगा नहीं तो फिर तो इस संसार में जीना ही व्यर्थ है। लेकिन जिस देश में यूरिया का एक दाना भी नही उतरे और विदेशों से 133 करोड़ का यूरिया रूपये के घोटालों को करके भी हमारे नेता तनिक भी न लज्जित हों, उस देश में अधिकारी वर्ग यदि लाशों के ढेर पर से भी चांदी बटोर रहा हो तो उसमें कोई बुराई नहीं है।
ये तो बेचारी राहत को ऊपर से ऊपर ही लपकने और सटकने के लिए ही तो प्रशिक्षित किये जाते हैं। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के समय में लोग अच्छा कार्य भी करते हैं और कई तो अधिकारी भी प्रशंसनीय योगदान देते हैं। किंतु उनकी संख्या नगण्य होती है। हमारे राजनीतिज्ञों ने-
मनुष्य को मनुष्य नही बनने दिया,
मनुष्य को संवेदनशील नहीं बनने दिया। अपितु उसे भावशून्य बनाया।
दानव बनाया।
निर्लज्ज बनाया।
संवेदनशून्य बनाया।
फिर कैसे बनेगा-'मेरा भारत महान?'
मनुष्य को मनुष्य बनाता है-धर्म और इसी धर्म की शिक्षा यहां धर्मनिरपेक्षियों ने निषिद्घ कर दी है। ऐसी परिस्थितियों में यदि हम भयानक दानवी युग की ओर बढ़ रहे हों तो कोई गलती नही होगी।
प्रशिक्षण शिविरों की आवश्यकता
15 अगस्त सन 1947 ई. को जब देश स्वतंत्र हुआ था तो उस दिन हमारे कार्यालयों में वही लोग अर्थात कर्मचारी और अधिकारी कार्य कर रहे थे जो पहले दिन 14 अगस्त सन 1947 ई. को कार्य कर रहे थे।
एक प्रकार से बोतल ही बदली गयी थी बोतल के भीतर की शराब तो वही की वही थी। आप अनुमान लगायें कि जो अधिकारी पहले दिन हमारे तत्कालीन राजनीतिज्ञों को गालियां दिया करते थे- अपने विदेशी आकाओं के सुर में सुर मिलाकर अगले दिन उनकी निष्ठा इन भारतीय राजीतिज्ञों के प्रति कितनी हो सकती थी?
अंग्रेज भारत पर राज करने के लिए भारत के अधिकारियों को ब्रिटेन ले जाकर पहले उन्हें अंग्रेज बनाया करते थे फिर वह यहां आकर ब्रिटिश राज को व्यवस्था दिया करते थे। इससे अलग अंग्रेज हमारे अधिकारियों को अन्य प्रशिक्षण नही दिया करते थे कि आपको किस प्रकार एक मानवीय समाज की संरचना में हमें अपना योगदान प्रदान करना है।
हम शोषण करेंगे और आप उस पर ताली बजाएंगे। आपको उस शोषण में से हमारे साथ मिलकर खाने का भी अधिकार नहीं होगा। हम तब इसी प्रक्रिया के अंग थे। अंग्रेज भारत में मानवीय समाज की संरचना क्यों करता? निश्चित रूप से उसे ऐसा करने की आवश्यकता नहीं थी। किंतु स्वतंत्रता के पश्चात हमारे राजनीतिज्ञों को तो ऐसे मानवीय समाज की संरचना की महती आवश्यकता थी। उन्होंने इस दिशा में क्या कार्य किया?
स्वतंत्र भारत और पराधीन प्रशासन
स्वतंत्रता के पश्चात भी अधिकारी को जब प्रशिक्षण दिया तो केवल उसे अधिकारी बनने के लिए ही प्रशिक्षित किया गया। जनसेवा का पाठ उसे नही पढ़ाया गया राष्ट्रसेवा उसके लिए अनिवार्य है-यह भी उसे नहीं बताया गया। हां! अंग्रेजों से भी एक कदम आगे बढ़ते हुए उसे ये अवश्य बताया गया कि आप स्वयं भी जनता का शोषण करें और उस शोषण में हमारा टुकड़ा हमारे सामने डालें अपना अंश अपने पास रखें। क्या ही अच्छा होता कि हम अपने अधिकारी वर्ग को जनसेवा और राष्ट्रसेवा का पाठ पहले पढ़ाते, उसके भीतर के छिपे हुए मानव को जगाते, उसकी संवेदनाशक्ति को जागृत करते, उसकी उस सुप्त चेतना को मुखरित करते जो उसके सेवाकाल को राष्ट्रसेवा का स्मरणीय काल बनाने में सहायक होती।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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