निजी अनुभवों की सांझ-1

  • 2017-04-24 03:30:55.0
  • राकेश कुमार आर्य

निजी अनुभवों की सांझ-1

दादरी रेलवे स्टेशन पर मैं अपने आदरणीय और श्रद्घेय भ्राता श्री देवेन्द्र सिंह आर्य (वरिष्ठ अधिवक्ता) के साथ फाटक बंद होने के कारण उनकी गाड़ी में बैठा रेलगाड़ी गुजरने की प्रतीक्षा कर रहा था। रेलगाड़ी पर्याप्त विलम्ब करने पर भी नहीं आयी। मैंने ज्येष्ठ भ्राता श्री से इतने पहले फाटक बंद कर देने का कारण पूछा कि-''रेल के आने से इतने समय पूर्व ये लोग फाटक क्यों लगा देते हैं?''
भाई साहब ने कहा-
ये मूँगफली, केले व अन्य चीजें बेचने वाले दुकानदार अपना माल तभी तो बेच सकते हैं जब शहर से दूर यहां पर्याप्त गाडिय़ां और सवारी खड़ी हों। सवारी होंगी तो कुछ न कुछ खरीदेंगी भी। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ये फाटक बंद करने वाले कर्मचारी इन लोगों से जल्दी फाटक बंद करने का और इनका माल इस प्रकार बिकवाने का कमीशन लेते हैं। मैंने इस बात की अपने स्तर पर जानकारी ली तो आश्चर्य हुआ कि भ्राताश्री वास्तव में सत्य ही कह रहे थे। हमारे नेताओं ने ऊपर बैठकर 'कमीशन' खाना प्रारंभ कर दिया तो नीचे तक उसकी जड़ें कैसे फैल गयी हैं? इस रूप को दिखाने के लिए यह उदाहरण पर्याप्त है।
मंत्री से संतरी तक कमीशन की जड़ें गहरी बैठ गयीं हैं। फिर भी नेता हमें आश्वस्त कर रहे हैं कि देश उन्नति कर रहा है।

कमीशन और दुकानदारी
आप बाजार में जा रहे हैं। किसी अच्छी दुकान से कोई अपना सामान लेने की आपको आवश्यकता है। आपको शहर की उस भीड़ में से कोई दुकानदार ऐसा भी मिलेगा जो आपको उस दुकानदार की दुकान बताने को आपके साथ चल देगा, जहां से आपको अपना वह सामान मिल सकता है। आप उस दुकानदार की इस सतयुगी प्रवृत्ति को देखकर गद्गद हो जाएंगे और आप सोचेंगे कि कितना भला व्यक्ति है जो अपना काम छोडक़र मेरी समस्या के निराकरण हेतु मेरे साथ हो लिया है। लेकिन वह भला व्यक्ति आपको उस दुकान पर पहुंचाकर वापस लौटने से पहले आपका परिचय उस दुकानदार से करा देगा कि यह ये अमुक वस्तु चाहते हैं, अच्छी चाहते हैं, उचित पैसे लेकर दे देना अपने ही व्यक्ति हैं, इनका विशेष ध्यान रखना।
ये शब्द सुनकर तो आप और भी प्रसन्न हो जाएंगे कि अब तो ये लाला या दुकानदार सही पैसे लेकर सही वस्तु ही मुझे देगा। लेकिन आपको पता ही नही चल पाया कि आपकी इसी मानसिकता को बनाने के लिए ऊपरिलिखित भाषा बोली गयी थी और इस प्रकार आपके द्वारा वस्तु की खरीददारी से पूर्व वहां आपका सौदा तय हो गया था। रास्ते बताने वाला वह मानव अपने रास्ते चला गया। किंतु जाने से पूर्व अपना 'कमीशन ' पक्का कर गया।
कहिए! है ना कलयुगी मानव चालाक? रास्ता बताता है तो उसका भी कमीशन लेता है और पता भी नहीं चलने देता। इसी प्रकार हमारे नेता राष्ट्र को बेचते रहते हैं और पता भी नहीं चलने देते। उसी सफाई से ऊपर से नीचे तक राष्ट्र के मूल्यों का सौदा किया जा रहा है और किसी को पता तक भी नहीं है। प्रत्येक क्षेत्र में यही सौदेबाजी हमारे राष्ट्रीय चरित्र का अंग बनती जा रही है, जो कि वास्तव में इन नेताओं की ही देन है।

चिकित्सक और कमीशन
चिकित्सक के पास आप जाएं। जिस दुकान से दवाइयां आएंगी वहां चिकित्सक महोदय का कमीशन तय है। इसलिए दवाइयां आपको महंगी लिखी जाएंगी। यह जानते हुए भी कि महंगी दवाइयां शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। फिर भी भारी और महंगी दवाई क्रय करने के लिए आपको बाध्य किया जाएगा। जिससे आप उन्हें क्रय करें और चिकित्सक का कमीशन ठीक बन सके। रक्त परीक्षण, मधुमेह परीक्षण, सीटी स्कैन आदि के लिए आपको एक चिकित्सक महोदय दूसरे चिकित्सक के लिए संस्तुति प्रदान कर देंगे। इस मानवीय दृष्टिकोण के पीछे भी 'कमीशन' का भूत छिपा होता है।
सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक और औषधियां उपलब्ध नहीं होती। चिकित्सक अपना निजी चिकित्सालय चलाते हैं। उन्हें प्राइवेट चिकित्सक की फीस आप दे दें तो आपको उनकी सेवाएं उपलब्ध हो जाएंगी। हमारे इन तथाकथित भूखे मरते चिकित्सकों द्वारा सरकारी अस्पतालों में दवाइयां तब बेच दी जाती हैं। गरीब व्यक्ति काम चलाऊ दवाएं लेकर वहां से चला आता है।

वह गरीब है, असहाय है, इसलिए उसकी विवशता है कि वह उन दवाओं को लेकर अपनी चिकित्सा कराये अन्यथा प्राइवेट चिकित्सकों के निजी अस्पतालों की अट्टालिकाएं आकर्षित तो उसे भी करती हैं कि वह भी उनमें जाए और अपना उपचार कराये। दिल्ली के अपोलो जैसे अस्पताल इस देश में हैं जो देश के समृद्घ और प्रसिद्घ लोगों के उपचार के लिए हैं, लाखों रूपये व्यय करके अपनी चिकित्सा यहां कराना हर किसी व्यक्ति के लिये संभव नहीं है।
कानून के समक्ष सबकी समानता और समतामूलक समाज की संरचना का सपना कितना खोखला है? -इस बात की सच्चाई अपोलो जैसे अस्पतालों को देखकर सहज ही पता चल जाती है। हमारे राजनीतिज्ञों के पास इस विषय में कुछ विचार करने या सोचने का समय ही नहीं है। प्राचीन भारत में राजा और रंक की चिकित्सा एक जैसी होती थी। जबकि आज दोनों की चिकित्सा में भारी अंतर है।

हमारे वैद्यों को जो कि आयुर्वेद से चिकित्सा करते थे, स्वतंत्रता के उपरांत पूर्णत: उपेक्षित कर दिया गया है। ये वे लोग हुआ करते थे जो चिकित्सा क्षेत्र में केवल सेवाभाव के दृष्टिगत अपना पैर रखते थे। आज ये बीते दिनों की बातें हो गयी हैं। सेवा हमारे राष्ट्रीय क्षेत्र से समाप्त हो गयी है। अब समय आ गया है-उसके स्थान पर 'कमीशन' पाने का। इस कमीशन रूपी रोग से देश का हर कर्मचारी ग्रसित हो चुका है। उसे 'कमीशन' लेकर काम करने में ही अच्छा लगता है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)