महामहिम राज्यपाल रामनाईक जी से

  • 2016-10-28 10:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

महामहिम राज्यपाल रामनाईक जी से

महोदय,
उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित राजभवन में आप जैसा सुसंस्कृत और शालीन व्यक्तित्व यदि बैठा है तो यह घर इस प्रदेश का सौभाग्य है। आप एक सक्रिय राजनेता होने के कारण सक्रिय राज्यपाल भी हैं। आप विषम परिस्थितियों में भी अपनी सरकार से संतुलन बनाकर चलने में सफल रहे हैं। ऐसे में आपसे कुछ विशेष अपेक्षाएं हैं, जिन्हें पूर्ण कराने में आपकी विशेष भूमिका हो सकती है। यथा-
इस प्रदेश का यह सौभाग्य है कि यहां श्रीराम जी की अयोध्या और श्रीकृष्ण जी की मथुरा नगरी विद्यमान हैं, साथ ही महाभारत -कालीन हस्तिनापुर भी यहीं पर है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि अंग्रेजों और उनसे पूर्व मुगलों या तुर्कों ने इन ऐतिहासिक स्थलों की जिस प्रकार उपेक्षा की वह आज तक जारी है। जबकि स्वतंत्र भारत में ऐसा नहीं होना चाहिए था। वास्तव में इन ऐतिहासिक स्थलों की जिस प्रकार उपेक्षा की गयी है, उससे यहां इतिहास दम तोड़ रहा है और हम असहाय बने बैठे उसे देख रहे हैं-केवल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर। यद्यपि अपने ऐतिहासिक स्थलों की उचित देखभाल और संरक्षण करना हमारा संवैधानिक दायित्व है, पर फिर भी हम ऐसा करते जान नहीं पड़ रहे।

ऐसे में श्रीराम जी की अयोध्या के लिए ऐसे विद्वानों की एक समिति गठित जानी चाहिए जो उनके विषय में न केवल अयोध्या के बारे में अपितु वनवास के काल में उनके चित्रकूट में रहने के साथ-साथ श्रीलंका के लिए प्रस्थान करने के सभी स्थलों को चिन्हित किया जाए और उनका विकास इस प्रकार किया जाए कि पर्यटकों का उधर जाने का आकर्षण बढ़े। इससे भारत की 'सामासिक संस्कृति' के विकास की संभावनाएं प्रबल होंगी और देश के युवाओं को अपने महापुरूषों के विषय में जानने व समझने का अवसर मिलेगा।

श्रीराम के पश्चात श्रीकृष्ण भारत के चरितनायक महापुरूष हैं। उन्हें लेकर लोगों में आज भी बड़ी श्रद्घाभावना है। उनकी मथुरा भी श्रीराम की अयोध्या की भांति अत्यंत उपेक्षित है। मथुरा में श्रीकृष्ण की सुदर्शन चक्रधारी और गीता का उपदेश देते हुए वहां की मुख्य सडक़ पर एक विशाल मूर्ति स्थापित की जाए और उनके यौधेय स्वरूप को प्रकट करने वाले कार्यों की एक ऐसी मनोरम झांकी वहां विशाल पार्क बनाकर तैयार की जाए, जिसे देखकर लोगों को भारत के इस महामानव को जानने व समझने का अवसर मिले। उनकी गौभक्ति को इस प्रकार दिखाया जाए कि वर्तमान में अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही गौमाता की उपयोगिता को लोग समझें और इसकी रक्षा करने का संकल्प वास्तव में ले सकें।

प्रदेश में पूर्व में रही बसपा की सरकार ने महाभारतकालीन ऐतिहासिक स्थलों के जीर्णोद्घार के लिए कुछ कार्य करना आरंभ किया था। परंतु वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद से सब कुछ भुला दिया गया। यद्यपि प्रदेश की वर्तमान सरकार श्रीकृष्ण के यदुकुल वालों की है परंतु धर्मनिरपेक्षता का भूत जिस पर भी चढ़ जाता है वही उचित कार्य करने से बचने लगता है। आपसे अपेक्षा है कि आप अपनी सरकार को हस्तिनापुर सहित उन सभी ऐतिहासिक स्थलों का जीर्णोद्घार करायें जिनकी यादें महाभारत से जुड़ी हैं। इन स्थलों पर पर्यटन स्थल विकसित किये जाएं। जैसे विराट नगरी से दूत बनकर चले कृष्णजी ने युद्घ रोकने का अंतिम प्रयास जब किया तो वह 'वृकप्रस्थ' (बागपत) में आकर रूके थे। बागपत में यह स्थल श्रीकृष्णजी की यादों को लोगों के सामने प्रस्तुत करने की मुद्रा में विकसित किया जाए।

महाभारत के समय श्रीकृष्णजी ने हस्तिनापुर की राज्यसभा में जाकर जिन पांच गांवों को दुर्योधन से मांगा था, उनके नाम थे-वृकप्रस्थ, (बागपत) इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) जयंत (जानसठ) वारणाव्रत (वरनावा) और पांचवां कोई एकअन्य गांव कौरवों को अपनी इच्छा से देने को कहा था। इन्हीं के साथ उस समय का मयराष्ट्र आज का मेरठ है, इन सभी नगरियों के पुराने नाम इन्हें दिये जाएं और इनके पुराने वैभव को लौटाने वाले इतिहास को यहां सजीवता प्रदान की जाए। श्रीकृष्ण जी जब हस्तिनापुर की सभा से विराट नगरी के लिए लौटे थे तो उन्हें विदा करने के लिए भीष्म पितामह दूर तक साथ चले थे और साथ ही कर्ण अपने रथ पर आरूढ़ होकर उनके आगे-आगे चल रहे थे। यदि आज वह इतिहास ऐसी ही चित्रावली के साथ कहीं फिर से जीवित किया जाए तो लोगों को बहुत ही लाभ पहुंचाएगा।

1947 में जन्मा पाकिस्तान अपना झूठा इतिहास तैयार कर सकता है, परंतु भारत अपने सच्चे इतिहास को भी मार रहा है। 'उगता भारत ट्रस्ट' और 'उगता भारत समाचार पत्र परिवार' का हर सदस्य आपसे सानुरोध प्रार्थना करता है कि अपने इतिहास को लोगों के हृदय में उतारने के लिए तथा प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उपरोक्त बिंदुओं पर गंभीरता से कार्य करने के लिए प्रदेश सरकार को निर्देशित करें। पत्र परिवार आपका कृतज्ञ होगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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