तिलक, तराजू और तलवार का सामंजस्य, भाग-3

  • 2016-09-20 16:45:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

तिलक, तराजू और तलवार का सामंजस्य, भाग-3

वैश्यों का आदर्श
जो 'शतहस्त समाहर:' अर्थात सैकड़ों हाथों से कमाएं और 'सहस्र हस्तं किर:' हजारों हाथों से बिखेर दे, वह 'वैश्य' है? अब आइये अपने मूल विषय पर। हमारा 'शिक्षक' कैसा हो? सबको ज्ञान बिखेरने वाला, सबको इहलौकिक और पारलौकिक उन्नति का सूत्र और मार्ग बताने वाला।
क्षत्रिय का आदर्श
हमारा क्षत्रिय कैसा हो? तलवार कैसी हो? तलवार का धर्म क्या हो? तलवार ऐसी हो जो प्रत्येक प्रकार के अन्याय, शोषण, दलन और दमन के विरूद्घ पूरी शक्ति के साथ उठे और इन मानवता के शत्रुओं का विनाश करने में पूरी सामथ्र्य लगा दे। अन्याय नाम की वस्तु संसार में देखने तक को न मिले।
वैश्य की तुला
इसी प्रकार हमारी तराजू पूरी तरह खुले दिल की हो, डण्डी मारने वाली न हो। कंजूस न हो, स्विस बैंकों में अपने खाते खोलने वाली न हो, काला धन बनाने वाली न हो, निर्धन का खून चूसकर अपनी तिजौरियां भरने वाली न हो, अपितु सहृदयी हो, उदार हो, सहयोगी हो, सबका उद्घार, कल्याण, परित्राण और उत्थान कराने वाली हो।
तिलक, तराजू और तलवार की मर्यादा
जिस देश का तिलक, जिस देश की तलवार और तराजू अपनी मर्यादा को पहचान लेगी, अपने उद्देश्य और उपयोगिता को पहचान लेगी, उस देश का कल्याण, उत्थान और सार्वत्रिक विकास होना अवश्यम्भावी है।
किंतु जिस देश के कर्णधार अपने मानसिक दीवालियेपन का इस प्रकार ढिंढोरा पीटकर प्रदर्शन कर रहे हों कि 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार' उस देश का भविष्य कैसा होगा? यह सोचकर भी इस नारे पर दया आती है। इसका कुछ विवरण हम पहले भी कर आये हैं। आज आवश्यकता है अपनी आदर्श व्यवस्था को सही रूप में प्रतिष्ठित, प्रतिस्थापित और पुनस्र्थापित कराने की। इस आदर्श व्यवस्था को संसार के अन्य देशों के लिए भी एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी, किंतु हम कुछ और ही कर बैठे।
हमने परिमार्जन नही किया, अपितु अपनी अनमोल निधि को, विरासत को, सड़ी गली और निष्प्रयोज्य भंडार की वस्तु मानकर उसे नीलाम करना आरंभ कर दिया। फलस्वरूप ज्ञान प्राप्त करने को नही अपितु रोटी को मानव की प्राथमिक और मूलभूत आवश्यकता बताने लगे जिसका परिणाम सामने है। आज हमारे पास संस्कारित पीढ़ी का अभाव होता जा रहा है। रोटी के लिए आपाधापी है। ज्ञान से पहले धन ने अपना स्थान बना लिया है। पैसा हमारा लक्ष्य हो गया है। उसके लिए साधन चाहे जो भी प्रयोग किये जाएं, इसकी कोई परवाह नही है।
फलत: दानियों का बोलबाला अब नही रहा है। स्वार्थी और लालची लोगों का बोलबाला और वर्चस्व हो गया है। दलितों, शोषितों की राजनीति करने वाले अपने ही जन्मदिवस पर करोड़ों रूपये पानी की तरह बहा रहे हैं। फिर भी शर्माते नही हैं, अपितु बड़ी शान से कहते हैं कि-हमारा लक्ष्य समतामूलक समाज की संरचना करना है। अब भला इन्हें कौन समझाये कि समतामूलक समाज की संरचना होती क्या है? इन्हें नही पता कि सभी लोग समाज में समान हो ही नही सकते। प्रतिभाएं सभी की अलग-अलग होती हैं। जैसी जिसकी प्रतिभा वैसा उसका मोल वैसा उसका वेतन। और जैसा वेतन वैसा उसका सामाजिक स्तर। पश्चिम के उच्छिष्ट भोजी हमारे विचारक जरा सोचें कि फिर आदर्श सामाजिक स्थिति क्या है? आदर्श सामाजिक स्थिति वही है जिसमें सभी अपने-अपने अधिकारों को दूसरे के लिए छोडऩे को तैयार हों।
जिसको खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ और मूर्ख बनाओ, वोट पाओ की मूर्खतापूर्ण नीतियां नही अपितु 'सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय की लोककल्याणकारी नीति गूंजती हो। जिस राष्ट्र का आदर्श वाक्य हो-भारतीय आदर्श समाज की मान्यता 'वर्धस्व च वर्धय' अर्थात स्वयं तो आगे बढ़ो ही दूसरों को बढ़ाने में स्वयं सहायक भी बनों, वह राष्ट्र सर्वजन हित को ही अपना आदर्श घोषित करता है। यही है भारत के समाजवाद का आदर्श और संकल्प। हमारे साम्यवादी विचारकों में यदि साहस हो तो भारत की इस समाजवादी व्यवस्था का कोई विकल्प प्रस्तुत करके दिखायें। मुझे नही लगता कि जिनकी विचारधारा भी उधार में ली गयी हो, उनके पास कोई आदर्श व्यवस्था उनके मौलिक चिंतन को उजागर, करने वाली होगी भी कि नही।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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