तिलक, तराजू और तलवार का सामंजस्य, भाग-2

  • 2016-09-17 04:00:59.0
  • राकेश कुमार आर्य

तिलक, तराजू और तलवार का सामंजस्य, भाग-2

स्वस्ति पन्थामनुचरेम् सूय्र्याचन्द्रमसाविव।
पुनर्ददताअघ्नता जानता संगमेमहि।।
वेद का यह मंत्र दो बातें स्पष्ट कर रहा है-प्रथमत: हमारी मर्यादा और सीमा रेखा का रेखांकन करते हुए कह रहा है कि तुम्हारे द्वारा अपने-अपने पथ के लिए सूर्य और चंद्रमा का अनुकरण किया जाए। जैसे सूर्य अपनी पथ-परिक्रमा में रहता है और चंद्रमा अपनी पथ परिक्रमा में रहता है।

कभी दोनों आपस में भिड़ते नही, झगड़ते नही, लड़ते नही और टकराते नही, ऐसे ही तुम्हें आपस में रहना है, भिडऩा नही है, झगडऩा नही है, लडऩा नही है और परस्पर टकराना नही है। आह! कितनी आदर्श व्यवस्था है-सूर्य चंद्रमा को प्रकाश दे रहा है, भक्त सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा की कांति समझकर सोमपान कर रहा है, सारा श्रेय चंद्रमा को दे रहा है और इस पर बड़ा भाई सूर्य प्रसन्न हो रहा है।

सत्संगति का रहस्य
मंत्र के अगले पड़ाव में बात आयी कि तुम्हारी संगति कैसे लोगों से हो? तो वेद ने कहा-'पुर्नददताअघ्नता जानता.....'अर्थात जो दानी हो, अहिंसक हो और ज्ञानी हों, उन लोगों से हमारी संगति हो, उठ-बैठ हो, मेलमिलाप हो और मित्रता हो। ये कौन हैं, दानी, ज्ञानी और अहिंसक लोग? वेद के इस गूढ़ रहस्य को समझने के पूर्व हमें एक अन्य बात पर विचार करना होगा कि समाज के हर युग में तीन शत्रु रहे हैं। अज्ञान, अन्याय और अभाव। अज्ञान को ज्ञानी दूर करता है, अन्याय को बली दूर करता है और अभाव को धनी और समृद्घ व्यक्ति दूर करता है।

हमारे और केवल हमारे ऋषियों का ये चिंतन रहा है कि अज्ञान से लडऩे वाले व्यक्ति को 'ब्राह्मण' कहा जाएगा, अन्याय से लडऩे वाले व्यक्ति को 'क्षत्रिय' कहा जाएगा। इसी प्रकार अभाव से लडऩे वाले को 'वैश्य' कहा जाएगा। समाज के तीन शत्रु और उनके लिए ही योद्घा सामाजिक व्यवस्था का कितना उत्कृष्ट उदाहरण है? हमारे ऋषियों ने पश्चिम के विचारों की भांति ये नही कहा कि-व्यक्ति की प्रमुख आवश्यकताएं तीन हैं-''भोजन, वस्त्र और आवास इन चीजों को हमारे ऋषियों के द्वारा सामाजिक चिंतकों द्वारा तीसरे स्थान पर 'अभाव' नामक शत्रु के साथ जोडक़र देखा गया। इनसे पहले व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं में उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने और अन्याय के स्थान पर न्याय स्थापित करने को प्राथमिकता दी।

वेद का रहस्य
अब वेद के रहस्य पर विचार करें। उसने ज्ञानी, अहिंसक और दानी लोगों से हमारी संगति का उपदेश, आदेश, संदेश और निर्देश किया है, तो उसका आशय ज्ञानी-ब्राह्मण, अहिंसक क्षत्रिय=अहिंसक समाज की स्थापना, इसे क्षत्रिय अपने दण्ड बल से ही कर सकता है।

यदि दण्ड बल ढीला पड़ गया तो समाज में हिंसक लोगों का बोलबाला हो जाएगा, जैसा आज हो रहा है। इसीलिए कहा भी गया है-'शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे तव शास्त्र चर्चा प्रवर्तते।' अर्थात शस्त्र से राष्ट्र की रक्षा होती है और तभी शास्त्रचर्चा होना संभव है। इस प्रकार शास्त्र की रक्षा शस्त्र से होती है। अहिंसक प्रेम और शांति के उपासक समाज की स्थापना के लिए शास्त्र की बाद में पहले शस्त्र की आवश्यकता है। जिसे क्षत्रिय ही कर सकता है। इसलिए वेद का आशय (अहिंसक लोगों से) क्षत्रियों से है। अत: हमारी संगति इन्हीं क्षत्रियों से हो। इसके पश्चात हमारा वैश्य वर्ग ऐसा हो जो दानी हो। समाज और राष्ट्र पर आयी आपत्ति के समय अपने धन के द्वार सबके लिए खोल दे। उसका धन सबका धन हो। ऐसे आदर्श उदारमना वैश्यों से हमारी संगति हो, मित्रता हो, उठ-बैठ हो।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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