तिलक, तराजू और तलवार का सामंजस्य

  • 2016-09-16 04:00:57.0
  • राकेश कुमार आर्य

तिलक, तराजू और तलवार का सामंजस्य

भारतीय समाज में वर्तमान काल में जाति-व्यवस्था पहले से भी अधिक उग्र हो गयी है। इसे राजनीतिक लोगों ने अधिक हवा दी है। जिस व्यवस्था के अभिशाप को स्वतंत्रयोपरांत समाप्त कर दिया जाना चाहिए था उसे आरक्षण के नाम पर, जातीय वोटों के नाम पर और दलितों-शोषितों, अगड़ों-पिछड़ों के नाम पर हमने जीवित किये रखा, यह दुर्भाग्य का विषय है।

वोट के सौदागरों ने वोट प्राप्ति के लिए जाति व्यवस्था और तद्जनित भारतीय समाज में बने दलित, शोषित, अगड़े-पिछड़े के वर्गीय द्वंद्व का भरपूर लाभ उठाने का प्रयास किया गया है। इसके लिए किसी ने मनु को कोसना आरंभ कर दिया है तो किसी ने मनु प्रतिपादित जातीय व्यवस्था को वर्ग संघर्ष की जनक बताकर उसे 'ब्राह्मणवादी व्यवस्था' तक कहना आरंभ कर दिया है।

ऐसा कहने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि इससे वे भारतीय समाज का भला नही कर रहे हैं, अपितु इस सोच के कारण भारत में जातीय विद्वेष और भी अधिक बढ़ रहा है। नेताओं ने अपना वोट बैंक स्थायी करने के लिए जनता को और मतदाता ने अपना काम निकालने के लिए अपने सजातीय नेताओं को खेमों में विभाजित कर लिया है।

चुनावी वैतरणी पार करने के लिए हर चुनावी मौसम में यह नेता बरसाती मेंढक की भांति टर्राते हैं और जनता में जातीय विद्वेष का जहर फैला जाते हैं। एक प्रदेश की मुख्यमंत्री रही एक दलित की बेटी ने विद्वेष फैलाने की सारी सीमाएं ही तोड़ दीं-जब कह दिया कि 'तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार' ऐसा कहने वाले लोग यह नही जानते कि ऐसे भावनात्मक शब्दों से भावनाएं कितनी भडक़ती हैं। साथ ही इन भडक़ी हुई भावनाओं का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

वास्तव में तो ऐसा वही सोचेगा जिसे राष्ट्र की और समाज की चिंता नही होगी। जिनका चिंतन ही विकृत हो गया हो उनके लिए शुभचिंतन बेमानी वाली बात है। इसीलिए तो कहा गया है कि-
चिंतन जिसका निम्न हो उसका निम्न नसीब।
दुनिया का समझो उसे सबसे बड़ा गरीब।।

चिंतन का दीवाला निकल गया तो विकृत चिंतन ने समाज में आग लगा दी। भावनाएं भडक़ा दीं और नारा उछाल दिया-'तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार' ऐसा नारा लगाने वाले नही समझ पाये कि तिलक, तराजू और तलवार का रहस्य क्या है? इसके रहस्य को समझकर इसे जनता को समझाने की अपेक्षा हमें अपने राजनीतिज्ञों से थी, किंतु जहां जनहित पर स्वहित हावी हो वहां ऐसी अपेक्षा नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान अथवा राजस्थान के रेगिस्तान में शीतल जल ढूंढऩे की मृगमरीचिका के समान है।

यह राजनीतिज्ञ नाम का प्राणी वह है जो संविधान के अनुसार ईश्वर के नाम पर इसी बात की शपथ लेता है कि मुझे जनता की अपेक्षाओं पर ही खरा नही उतरना है। इसलिए इसने भारतीय समाज की कुछ अप्रिय परंपराओं और रीति रिवाजों की व्यवस्था का परिष्कार करने के स्थान पर उनका तिरस्कार करना प्रारंभ कर दिया। अप्रिय व अनर्थकारी व्यवस्था के स्थान पर नई और सुस्पष्ट व्यवस्था हमें हमारे राजनीतिज्ञों के द्वारा नही दी गयी।

तिलक, तराजू और तलवार को कोसा तो गया किंतु कोई ऐसी आदर्श सामाजिक व्यवस्था की संकल्पना प्रस्तुत नही की गयी, जो भारतीय समाज की भीतरी व्यवस्था को और भी अच्छे ढंग से सही दिशा और दशा देने में सक्षम होती। यह स्थिति व्यवस्थापकों के मानसिक दीवालियेपन को प्रकट करती है। ये लोग कितने बड़े आदर्शवादी, सिद्घांतवादी, दार्शनिक, बुद्घिजीवी और विचारक हैं? परिस्थितियां इसका स्वयं वर्णन करती हैं।

अब जरा विचार करें कि तिलक, तराजू और तलवार का आपसी रिश्ता क्या है? इनके पीछे ऋषियों और प्राचीन काल के व्यवस्थापकों का दार्शनिक दृष्टिकोण क्या है? मंतव्य क्या है? और उनकी संकल्पना क्या है? इसके लिए हमें वेद के इस मंत्र को समझना पड़ेगा।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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