तीन तलाक और नारी की मर्यादा

  • 2016-12-13 09:30:53.0
  • राकेश कुमार आर्य

तीन तलाक और नारी की मर्यादा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक केस में अपना आदेश सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि तीन तलाक की व्यवस्था कुरान शरीफ और इस्लाम की मूल भावना के विरूद्घ है। इस आदेश के बाद से कुछ लोगों की बेचैनी बढ़ी है। ये लोग निश्चय ही इस्लाम के शुभचिंतक नहीं हैं। ये वही लोग हैं जो इस्लाम के नाम पर अपनी दुकानदारी बनाये रखना चाहते हैं और किसी भी मूल्य पर इस्लाम को जड़ताबंदी बनाये रखकर उसे निरंतर प्रवाहमान और जगत के नियमों के अनुसार ढल जाने वाली जीवन प्रणाली बनने से रोकने का हरसंभव प्रयत्न करते हैं।


संसार की कोई भी व्यवस्था यदि किसी एक वर्ग को अधिकार विहीन कर दूसरे को अधिकारों से सुभूषित करती है तो वह एक वर्ग को दूसरे वर्ग पर अत्याचार करने का प्रमाण पत्र दे देती है। इससे समाज में अधिकारों के लिए संघर्ष की भावना बलवती होती है और समाज में शोषण, अत्याचार, अनाचार, पापाचार और दमन का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। जहां तक नारी और पुरूष का संबंध है तो इनको ईश्वर ने ही बराबर का बनाकर भेजा है। दोनों के भीतर जीवात्मा है, सोचने-समझने और आगे बढऩे की क्षमताएं हैं। यदि नारी को अबला कहा जाता है अथवा कोमल माना जाता है तो यह भी उसके लिए प्रकृति का एक वरदान है, यदि नारी स्वभाव से कोमल नहीं होगी तो उसकी ममता प्रभावित हो जाएगी और यदि ममता विहीन नारी हो गयी तो संसार का यह सारा तामझाम ही आगे बढऩा बंद हो जाएगा। इसलिए नारी की कोमलता को उसकी दुर्बलता न माना जाए। यह नारी ही होती है-जो शेरनी बनकर शेर पुत्रों को जन्म देती है। संसार के जितने भर भी राष्ट्ररक्षक, धर्म रक्षक और समाज सुधारक लोग हुए हैं-उन सबके पीछे नारी ही खड़ी है।

पुरूष वर्ग ने अपनी चौधराहट को स्थापित करने के लिए नारी पर अत्याचार किये हैं। जिससे इस संसार का वातावरण तनावयुक्त हो गया है। परिवार जैसी पवित्र संस्था का क्षरण हुआ है और पारिवारिक एवं सामाजिक मूल्यों में गिरावट आयी है। इस्लाम की गलत व्याख्या करते हुए कुछ लोगों ने 'तीन तलाक' की अनर्थकारी और दमनकारी सामाजिक परंपरा को निहित स्वार्थ में प्रयोग करते रहने को अपना धार्मिक मौलिक अधिकार घोषित कराने की हरसंभव चेष्टा की है। उनकी यह प्रवृत्ति देशघाती है। माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय के आने के पश्चात कुछ लोगों ने संविधान के उस अनुच्छेद को उद्घृत कर अपनी चौधराहट बनाये रखने का प्रयास करते हुए इस आदेश को असंवैधानिक ठहराने का प्रयास किया है जो हमें अपने पंथ के पालन करने की स्वतंत्रता देता है।

माना कि संविधान हमें ऐसी स्वतंत्रता देता है, पर हमारा संविधान अपनी प्रस्तावना में ही स्पष्ट करता है कि प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय देना उसका उद्देश्य है। सारा संविधान इसी उद्देश्य की पूत्र्ति के लिए अपनी विभिन्न धाराओं की व्यवस्था करता जान पड़ता है। अब इस्लाम में नारी के विषय में ऐसा कैसे हो सकता है कि उसे हमारा संविधान उसके मौलिक अधिकारों से ही वंचित कर दे? इस्लाम के कुछ व्याख्याकारों की दृष्टि में नारी में आत्मा (रूह) नहीं हो सकती, पर हमारा संविधान नारी को भी उसी ईश्वर या खुदा की एक अनमोल कृति मानता है जिसने पुरूष या अन्य जीवधारियों को बनाया है, इसलिए नारी भारत में उन्हीं अधिकारों की पात्र है जो पुरूष वर्ग को मिले है क्योंकि वह भी देश की एक सम्मानित नागरिक है। ऐसे में देश के संविधान ने उसके साथ भी समानता का व्यवहार करने का वचन उसे दिया है। यदि इस वचन को मा. उच्च न्यायालय ने देश के लोगों को याद दिलाया है और उसके आलोक में इस्लाम में हो रही नारी की दुर्गति को लेकर अपना निर्णय दिया है तो इसे उचित ही माना जाना चाहिए। यह एक शुभ संकेत है कि इस्लाम के प्रगतिशील और और न्यायप्रिय लोगों ने मा. उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया है।
कुछ लोगों ने माननीय न्यायालय के इस आदेश को इस्लाम के निजी मामलों में हस्तक्षेप माना है। हमारा मानना है कि ऐसे लोगों का यह तर्क भी उचित नहीं है। क्योंकि इस समय देश का शासन किसी साम्प्रदायिक कानून के आधार पर न चलकर 'सम्प्रदाय निरपेक्ष' संविधान के अनुसार चलता है। संविधान के संप्रदाय निरपेक्ष होने का अर्थ ही यह है कि वह किसी पंथीय विधि को वरीयता या प्रमुखता न देकर अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए वही करेगा जो हर नागरिक के कल्याण के लिए उचित होगा। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज में भी सामाजिक कुरीतियां रही हैं, और आज भी हैं-जिन्हें संविधान उचित नहीं मानता है। यदि देश के प्रगतिशील लोग हिंदू समाज की उन कुरीतियों का उपचार होने देते हैं तो इस्लाम की किसी कुरीति का उपचार भी होना चाहिए। हम हजार वर्ष पुरानी किसी सड़ी गली परंपरा को 21वीं शताब्दी में लागू नहीं रख सकते। जमाना आगे बढ़ रहा है और बढ़ता ही जा रहा है, तो नारी को भी किसी जड़ से बांधना उचित नहीं होगा।

इस्लाम की वही व्याख्या सामने आनी चाहिए-जिसकी ओर न्यायालय ने संकेत किया है कि इस्लाम में तलाक दुर्लभ परिस्थितियों में ही संभव है। तीन तलाक की अमानवीय व्यवस्था को इस्लाम और कुरान शरीफ दोनों ही नकारते हैं। यह अत्यंत निर्लज्जता का विषय है कि एक 'शौहर' अपनी पत्नी को नशे की स्थिति में या अचानक आये गुस्से की स्थिति में भी तलाक, तलाक, तलाक कह दे तो एक मासूम जिंदगी उसी समय बर्बाद हो जाती है। ऐसा भी देखा गया है कि तीन तलाक कह कर पति को प्रायश्चित होता है और वह अपनी पत्नी को अपने साथ रखना चाहता है, तो उस समय उसकी पत्नी को 'हलाला' से गुजरने के लिए 'कठमुल्ले' बाध्य करते हैं। इससे पता चलता है कि नारी को ये लोग विषयभोग की वस्तु मानने से आगे कुछ नहीं मानते। इस सारी अन्यायपूर्ण व्यवस्था को अब बदलने का समय आ गया है। नारी के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस्लाम के बुद्घिजीवी आगे आयें और एक व्यवस्था को लागू करायें जिससे नारी का सम्मान हो सके। याद रखें कि नारी एक पत्नी होने से पूर्व एक पुत्री भी है, नारी के साथ अत्याचार करने से पूर्व तनिक यह देख लिया जाए कि यह व्यवहार यदि मेरी पुत्री के साथ होता है तो कैसा लगेगा? नारी सशक्तिकरण की जहां तक बात है तो हम बार-बार कहते आये हैं कि इसका अर्थ नारी को उच्छं्रखल कर देना नहीं है। उसे भी मर्यादाओं का और सभ्याचार का पालन करना ही चाहिए। 'मैं जो चाहूं सो करूं' का अभिप्राय आजादी नहीं है, यह तो अराजकता की निशानी है और इस सोच ने देश में बहुत उपद्रव मचवाया है। नारी भी सोचे कि उसकी स्वतंत्रता का अर्थ कौन सी मर्यादा की ओर संकेत करता है?

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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