संविधान सभा में सरदार पटेल का वह अविस्मरणीय भाषण

  • 2018-01-26 07:00:41.0
  • राकेश कुमार आर्य

संविधान सभा में सरदार पटेल का वह अविस्मरणीय भाषण

सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय स्वातंत्र्य समर के एक दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। उनकी स्पष्टवादिता और कड़े निर्णय लेने में दिखायी जाने वाली निडरता आज तक लोगों को रोमांचित कर देती है। बात उस समय की है जब देश की संविधान सभा में संयुक्त निर्वाचन पद्घति पर बहस चल रही थी। तब श्री नजीरूद्दीन अहमद जैसे कई मुस्लिम लीगी सदस्यों का मत था कि यदि देश में स्थानों के आरक्षण वाली संयुक्त निर्वाचन पद्घति को अपनाया जाता है तो आरक्षित स्थान से खड़े होने वाले प्रत्याशियों के जीतने के लिए अनिवार्य होना चाहिए कि वे अपने समुदाय के कम से कम 30 प्रतिशत मत प्राप्त करें।

संविधान सभा में यह बहस 28 सितंबर 1947 को चल रही थी। तब तक इस प्रकार के मुस्लिम लीगी पृथकतावादी विचारों के कारण देश को जन-धन की बहुत हानि हो चुकी थी। सरदार पटेल मुस्लिम तुष्टिकरण के कुपरिणामों से आहत हुए बैठे थे। यद्यपि उसी समय गांधीजी देश छोडक़र पाकिस्तान जाने की धमकी दे रहे थे। गांधीजी देश पर पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपया देने का दबाव बना रहे थे। यदि सरकार नहीं मानती तो वह पाकिस्तान जाने को भी तैयार बैठे थे। इन सब दबावों को सरदार पटेल का '56 इंची सीना' बड़े सहजभाव से सहन कर रहा था। उन्होंने जैसे ही मुस्लिम लीग के सदस्यों की उपरोक्त बेतुकी मांग को सुना तो वह तुरंत खड़े हो गये। उनके खड़े होते ही संविधान सभा में सन्नाटा छा गया। (जो लोग संविधान को केवल किसी एक व्यक्ति के मस्तिष्क की देन मानते हैं, उन्हें ध्यान देना चाहिए कि इस संविधान के निर्माण में कितने लोगों का मस्तिष्क खपा है और कितना बौद्घिक परिश्रम उन्हें कराना पड़ा है? यदि उनके प्रस्ताव ना आते तो क्या होता? यह बात सरदार पटेल के उस दिन के भाषण से स्पष्ट हो जाती है।) तब सरदार पटेल ने कहा था-''भारत का नया राष्ट्र किसी भी प्रकार की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सहन नहीं करेगा। यदि फिर वही मार्ग अपनाया जाता है, जिसके कारण (पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की पुरानी बीमारी की ओर संकेत है) देश का विभाजन हुआ तो जो लोग पुन: विभाजन करना चाहते हैं और फूट के बीज बोना चाहते हैं उनके लिए यहां कोई स्थान नहीं होगा, कोई कोना नहीं होगा।....किन्तु मैं अब देखता हूं कि उन्हीं युक्तियों को फिर अपनाया जा रहा है, जो उस समय अपनायी गयी थीं जब देश में पृथक निर्वाचन मण्डलों की पद्घति लागू की गयी थी। मुस्लिम लीग के वक्ताओं की वाणी में प्रचुर मिठास होने पर भी अपनाये गये उपाय में विष की भरपूर मात्रा है।
सबसे बाद के वक्ता (श्री नजीरूद्दीन अहमद) ने कहा है कि ''यदि हम छोटे भाई का संशोधन स्वीकार नहीं करेंगे तो हम उसके प्यार को गंवा देंगे।''
अध्यक्ष महोदय मैं उस (छोटे भाई) का प्यार गंवा देने को तैयार हूं। अन्यथा बड़े भाई की मृत्यु हो सकती है। आपको अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए। स्वयं को बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल ढालना चाहिए। वह बहाना बनाने से काम नहीं चलेगा कि-''हमारा तो आपसे घना प्यार है।'' हमने आपका प्यार देख लिया है (जो लोग यह मानते हैं कि देश का स्वतंत्रता संग्राम हिंदू मुस्लिम दोनों ने मिलकर लड़ा था-वे पटेल साहब के इन शब्दों पर ध्यान दें, उनका आशय है कि जितना सहयोग तुमने दिया उसका कई गुना दर्द तुम दे चुके हो और स्वतंत्रता मांगते-मांगते अलग देश ले चुके हो) अब इसकी चर्चा छोडिय़े। आइए , हम वास्तविकताओं का सामना करें। प्रश्न यह है कि आप वास्तव में हमसे सहयोग करना चाहते हैं या तोड़ फोड़ की चालें चलना चाहते हैं। मैं आपसे हृदय परिवर्तन का अनुरोध करता हूं। कोरी बातों से काम नहीं चलेगा, उससे कोई लाभ नहीं होगा। आप अपनी प्रवृत्ति पर फिर से विचार करें। यदि आप सोचते हैं कि उससे आपको लाभ होगा तो आप भूल कर रहे हैं-मेरा आपसे अनुरोध है कि बीती को बिसार दें, आगे की सुध लें। आपको मनचाही वस्तु (पाकिस्तान) मिल गयी है। और स्मरण रखिये आप ही लोग पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं (जो लोग आरएसएस या हिंदू महासभा को देश विभाजन के लिए उत्तरदायी मानते हैं वे ध्यान दें कि सरदार पटेल किसे देश विभाजन के लिए दोषी बता रहे हैं) पाकिस्तान के वासी नहीं। आप लोग आन्दोलन के अगुआ थे। अब आप क्या चाहते हैं? हम नही चाहते कि देश का पुन: विभाजन हो।''
देश का यह दुर्भाग्य रहा कि सरदार पटेल की स्पष्टवादिता को और उनके मुस्लिम तुष्टिकरण के प्रति कड़े दृष्टिकोण को कांग्रेस ने अपने लिए आदर्श नहीं माना। सरदार पटेल के कारण स्वतंत्र देश के संविधान में यह व्यवस्था नहीं की जा सकी कि अब कभी भी देश में पृथक निर्वाचन क्षेत्र स्थापित नहीं किये जाएंगे। इसका कारण यही था कि सरदार पटेल की इस बात को संविधानसभा ने सर्वसम्मति से माना कि अब हम इस देश का विभाजन नहीं चाहते। हमारे संविधान की यह मूल भावना है कि किसी भी स्थिति में देश का पुन: विभाजन ना हो। इसके लिए देश के नेताओं की ऐसी नीतियां होनी चाहिए थीं जिनसे किसी का तुष्टिकरण ना होता और ना ही किसी को संविधान की मूलभावना के विपरीत जाकर देश में पृथक निर्वाचन क्षेत्र स्थापित करने की छूट होती। पर देश में ऐसी परिस्थितियां सृजित की जाने लगीं कि यदि पृथक निर्वाचन क्षेत्र हमें सीधे -सीधे नहीं दिये जाते हैं तो हम जनसांख्यिकीय आंकड़ा गड़-बड़ाकर इसे ले लेंगे। यह प्रवृत्ति संविधान विरोधी है। पर नेताओं की दब्बूनीति के कारण इस प्रवृत्ति को संविधान का संरक्षण मिल गया लगता है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का दलवाई को दिया गया यह बयान हमारी आंखें खोल सकता है कि-''यदि आज नहीं तो 50 वर्ष में यदि 50 वर्ष में नहीं तो 100 वर्षों में यह देश अंत में इस्लामी बाढ़ में डूब जाएगा।'' दलवाई का कहना है कि इस प्रकार के बयानों को इक्के-दुक्के लोगों के विचार कहकर उपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। मैं जिन लोगों से मिला हूं उनमें से दस में से नौ लोगों का चिन्तन यही था। श्रीमती ताराअली बेग का यह कथन निरर्थक नही है कि भारत में मुस्लिमों के परिवार में बच्चों की अधिक संख्या ही हमारी समस्या है। यह परिवार नियोजन इस विचार से नहीं करते हैं कि उनकी संख्या एक दिन हिंदुओं से अधिक हो जाए।
यह प्रवृत्ति देशघाती है। हमें किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिक मान्यता को राष्ट्रीयता के ऊपर आंकने की प्रवृत्ति से बाहर निकलकर देखना होगा। देश के नेतृत्व ने जिस प्रकार इस प्रकार की प्रवृत्तियों की अनदेखी की है-वह अनुभव अच्छा नहीं रहा है।
आज देश जनसंख्या विस्फोट के मुहाने पर है हमें उस दिशा में सोचना ही चाहिए। पढ़े-लिखे और राष्ट्रहित में सोचने वाले मुस्लिम लडक़े लड़कियां इस दिशा में सोच भी रहे हैं, परन्तु उनकी संख्या अभी बहुत कम है। अधिक संख्या ऐसी है जो कठमुल्लों की गिरफ्त में आसानी से आ जाती है। ये कठमुल्ले अपने लोगों की मजहबी भावनाओं को उबारकर उन्हें किसी एक संसदीय सीट या विधानसभाई सीट पर अपने प्रत्याशी को विजयी बनाने के लिए एक क्षेत्र विशेष में बसाते हैं और फिर वहां देश के विकास और उत्थान या विश्वगुरू के रूप में भारत को स्थापित करने की सोच से अलग जाकर अपने उस प्रत्याशी के लिए वोट डाले जाते हैं जो देश की मूल विचारधारा के विरूद्घ जाकर विधानमण्डलों में अपनी बात रख सके। हम इसे जनादेश मानकर स्वीकार कर लेते हैं। लगता है कि जनादेश को भी हमें परिभाषित करना होगा। निश्चित रूप से जनादेश वही होना चाहिए जो 'सबका साथ सबका विकास' की भावना से प्रेरित होकर दिया जाता है। जिसमें 'मेरा और मेरे मजहबी भाईयों का विकास और बाकी का विनाश'- की भावना से प्रेरित हो उसे जनादेश नहीं माना जाना चाहिए। सरदार पटेल की सचमुच आज पुन: आवश्यकता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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