धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-तीन

  • 2016-11-07 03:30:32.0
  • राकेश कुमार आर्य

धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-तीन

अपनी अंतश्चेतना से प्रेरित व्यक्ति के विपरीत जो व्यक्ति अपना आचरण बनाता है, वह 'धर्महीन' है। जिसे पता नही है कि धर्म क्या है? मेरे लोक व्यवहार में यदि विकृति आती है तो उसका लोक पर क्या विपरीत प्रभाव पड़ेगा, मैं यदि मर्यादाहीन होता हूं तो लोक स्वास्थ्य कितना हानिग्रस्त होगा, जो व्यक्ति स्वार्थसाधना-हित इस कुमार्ग पर बढ़ता चला गया वह कुमार्गी व धर्महीन है। धर्मनिरपेक्ष है, कुछ अर्थों में वह अपने अधिकार भले ही जानता हो किंतु उसे अपने कत्र्तव्यों का किंचित भी पता नही है।


ऐसे लोगों से संसार में शांति व्यवस्था को सदैव भय रहता है। उनके आचरण को सुधारने के लिए राज्य व्यवस्था विधि निर्माण करती रहती है, वे फिर भी सुधर नही पाते हैं क्योंकि वे 'धर्मनिरपेक्ष' हैं। जो धर्म को बेचकर खा चुके होते हैं। एक कहावत है कि-'चोर का कोई धर्म नही होता' उन पर यही कहावत चरितार्थ होती रहती है।
देखिये आज क्या स्थिति बन गयी है-
-चोरों का चोर बाजार गर्म है।
-धर्मनिरपेक्ष बनकर सभी चोर बाजारी कर रहे हैं।
-वैश्य दुकानदारी का धर्म भूलकर धर्मनिरपेक्ष बन गया है।
-सीमा प्रहरी की नाक नीचे तस्करी हो रही है।
-राजनीतिज्ञ घोटालों में लिप्त हैं।
-संसद में राजनीतिज्ञों का स्तर गिरता जा रहा है।
-अध्यापक, अध्यापन धर्म के प्रति निरपेक्ष है।
-प्रत्येक व्यक्ति जहां बैठा है और जिस अपेक्षा से बैठाया गया है, उसके विपरीत आचरण कर रहा है।

क्योंकि सबको एक ही रोग हो गया है कि हम तो सबके सब 'धर्मनिरपेक्ष' हैं। इसलिए सबको अपने कत्र्तव्यों की नही, अपितु अधिकारों की चिंता है। फलस्वरूप लोक बिगड़ गया है, परलोक की ईश्वर जाने। यद्यपि कुछ वंदनीय पुरूष आज भी हैं जो अपने कत्र्तव्य धर्म का निर्वाह कर रहे हैं, और जिनके कारण समाज की नीति व्यवस्था सुचारू रूप से गतिमान है। किंतु इनकी संख्या कम है। बोलबाला तथाकथित धर्मनिरपेक्षियों का अधिक है।

राजनीति क्या है?
अब आते हैं अपने दूसरे विवेच्य शब्द राजनीति पर कि यह वर्तमान राजनीति क्या बला है? इस शब्द में नीति पर विचार करें। यह 'नीति' शब्द हमें न केवल हमारी विवेचना में सहायता करेगा, अपितु आज के लोक की दुर्गति को समझने में कुंजी का काम भी करेगा।
नीति का अर्थ है-'निश्चित व्यवस्था।' यह 'ति' अक्षर हमें व्यवस्था की ओर चलने, ढलने ओर उसी में पलने की प्रेरणा दे रहा है। प्रत्येक स्थिति और परिस्थिति में हम व्यवस्था के पालक हों, चालक हों और नियामक हों।

यह व्यवस्था ऐसे ही नही बन जाती है। इसके लिए हमें कत्र्तव्य पालक, सत्पथ का साधक और लोकोपकार का समर्थक बनना होगा। नैतिकता का प्रचारक और सदाचार का प्रसारक बनना होगा-तब बनेगी व्यवस्था। अब यदि इन सभी बातों से ही व्यवस्था बनेगी तो ये तो सभी धर्म के ही लक्षण हैं। इसलिए धर्म का दूसरा नाम ही व्यवस्था है। जीवन को सर्वांशत: उत्कृष्टता में ढालने की एक जीवन पद्घति का नाम धर्म है जो मानव समाज के लिए व्यवस्था की जनक बन जाती है।

अत: राजनीति में नीति शब्द हमें जिस निश्चित व्यवस्था की ओर चलने की प्रेरणा दे रहा है वह धर्म की ओर चलने की ही प्रेरणा है। अब बात स्पष्ट हो जाती है कि यह राजनीति शब्द लोक प्रचलित रूढिग़त अर्थों और संदर्भों में आकर चाहे कितना ही गलत और विकृत क्यों न हो गया हो, इसका सही अर्थ राजधर्म ही मानना चाहिए। हमारे प्राचीन गं्रथों और शास्त्रों में इसे इसी नाम से भी पुकारा गया है। अत: यह आरोप निराधार और अतार्किक सिद्घ हो जाता है कि धर्म और राजनीति का कोई मेल नही है। ऐसा कहने और मानने वाले मूर्खों को समझना चाहिए कि राजनीति शब्द स्वयं ही धर्म की चादर ओढ़े हुए है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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