धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-दो

  • 2016-11-05 06:30:20.0
  • राकेश कुमार आर्य

धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-दो

'धर्माे धारयते प्रजा'
इसका अभिप्राय है कि जो सारी प्रजा को धारण करता है, वह धर्म है। प्रजा धर्म को धारण नहीं करती अपितु धर्म ही प्रजा को धारण करता है, इसलिए वह धर्म है। वह प्रजा को कैसे धारण करता है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए योगदर्शनकार के यम और नियमों के दो सूत्रों की ओर हमें अपना ध्यान आकृष्ट करना होगा। यहां हम प्रसंगवश मात्र नियमों पर विचार करेंगे।
योगदर्शनकार ने कहा-''शौच संतोष तप: स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधानानि नियमा:'' अर्थात शौच शरीर मन और वाणी की पवित्रता, संतोष-श्रम से धनार्जन करना और निर्धनों के अधिकारों का शोषण न करके उनका संरक्षण करना, ऐसी सतोगुणी प्रवृत्ति के प्रकाश में चित्त की प्रसन्नता का नाम संतोष है।

तप-सुख-दुख, यश-अपयश, मान-अपमान, लाभ-हानि, सर्दी-गरमी आदि के द्वंद्वों के मध्य रहकर भी संतुलित और निद्र्वन्द्व रहना 'तप' कहा जाता है। स्वाध्याय-सदाचार परलोक कल्याण और स्वकल्याण के लिए उत्प्रेरित करने वाले प्राणिमात्र के प्रति हमें अपने कत्र्तव्यों का बोध कराने वाले सदग्रंथों का अध्ययन और आत्मनिरीक्षण की महान प्रवृत्ति को अपने भीतर विकसित करना 'स्वाध्याय' कहलाता है।

ईश्वर प्राणिधान-परमात्मा के अस्तित्व, न्याय और उसकी कर्मफल प्रदाता शक्ति का सदैव स्मरण रखते हुए उसके प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखना 'ईश्वर प्राणिधान' कहलाता है। योगदर्शन की दृष्टि में ये पांच नियम धर्म के नियम हैं। इसी प्रकार मनु महाराज ने मनुस्मृति में धैर्य, क्षमाशीलता, इंद्रियों का दमन, चोरी न करना, बुद्घिमान होना, विद्याशील होना, सत्यवादी होना और अक्रोधी होने जैसे मानवीय गुणों को 'धर्म के लक्षण' माना है।
मानव जीवन के उत्कृष्ट उत्थान में सहायक नैतिक बातों को एक व्यक्ति ने हमारे लिए नियम कहा तो दूसरे ने मात्र लक्षण कहा। नियम और लक्षण मानने से एकबात तो स्पष्ट है कि संभावना अभी शेष है। अर्थात समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए यदि आप किन्हीं अन्य नैतिक बातों को भी इन नियमों और लक्षणों में सम्मिलित करना चाहें तो आप स्वतंत्र हैं। उन्हें भी सम्मिलित किया जा सकता है।

बस! शर्त यह है कि ये नियम 'सर्वजन हिताय' और 'सर्वजन सुखाय' की लोकोपकारी नीति पर आधारित होने चाहिए। इस प्रकार समस्त मानव जाति के उत्थान और कल्याण के वे समस्त लोकोपकारी नियम उपनियम धर्म के अंतर्गत आ जाएंगे जो न केवल मानव मात्र का कल्याण करते हों, अपितु प्राणिमात्र के प्रति भी हमारी संवेदना को झकझोरते हों। इसीलिए धर्म हमारे लिए प्राचीनकाल से ही-
-एक मर्यादा का नाम रहा है।
-एक पवित्र कत्र्तव्य का नाम रहा है।
-मानवयी संवेदना का विषय रहा है।
-मानव की इहलौकिक और पारलौकिक उन्नति का सेतु रहा है।
-अन्तर्जगत की चेतना का नाम रहा है।
-मानव को मानव से जोडऩे वाली वस्तु का नाम रहा है।
-धर्म ही हमें धारण किये रखता है।

धर्मशील कौन है
उपरोक्त गुणों को मानने वाला, उनमें आस्था रखने वाला और धर्म को अपने ऊपर एक नकेल मानकर चलने वाला व्यक्ति 'धर्मशील' है। उसके लिए 'न लिंग धर्मकारणम्' कोई बाहरी चिन्ह धर्म का कारण नहीं है। उसके अंतस की चेतना उसे मर्यादित रहने के लिए सचेत, सावधान और जागरूक किये रखती है कि इधर सन्मार्ग पर चल , उधर कुमार्ग पर मत चल।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.