धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-एक

  • 2016-11-04 05:15:39.0
  • राकेश कुमार आर्य

धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-एक

भारत की संस्कृति के समन्वयवाद को हमने सांझावाद में परिवर्तित कर दिया तो एक समस्या खड़ी हो जाएगी। तब इस संस्कृति पर कई गंभीर आरोप लगेंगे। उदाहरण के लिए इस्लाम का मूलतत्ववाद इस संस्कृति का सांझा मूल्य कदापि नहीं हो सकता, जो दुनिया को दारूल-हरब और दारूल-इस्लाम में बांटकर देखता है, इसी प्रकार ईसाई मिशनरियों का किसी भी देश में जाकर उस देश का जनसांख्यिकीय आंकड़ा (धर्मपरिवर्तन के बल पर) गड़बड़ाना भारतीय संस्कृति का कभी भी आदर्श नही हो सकता। संस्कृति का निर्माण संस्कारों से होता है, जो किसी भी राष्ट्र और उस राष्ट्र के निवासियों के सामान्य सूक्ष्म गुण होते हैं। इस्लाम और ईसाइयत के सूक्ष्म गुण जिधर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं वे भारत की संस्कृति पर कलंक तो हो सकते हैं, परंतु कभी भी उसका अंग नहीं हो सकते।


यदि हमने इन विपरीत गुणों को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बनाने का प्रयास कभी किया तो मानना पड़ेगा कि उसी दिन इस राष्ट्र के मूल्यों की हम हत्या करने के 'पापी' बन जाएंगे। हमारा आदर्श वेद का यह वाक्य रहा है 'मनुर्भव जनया दैव्यंजन्म्' अर्थात मनुष्य बनो और दिव्य संतति उत्पन्न करो-जबकि कुरान ने संसार वालों को मुसलमान और बाईबिल ने ईसाई बनाने की शिक्षा दी है।
संस्कृति का अर्थ-'संस्कारोतीति य: संस्कृति'-अर्थात जो हमें संस्कारवान बनाये, हमारा नया संस्करण निकाले, हमें गुणवान बनाये-ेवही 'संस्कृति' है। यह केवल वैदिक हिंदू संस्कृति है जो मनुष्य को मनुष्य बनने की शिक्षा देती है। सांझावाद का ढिंढोरा पीटने वाले हिंदू संस्कृति की इस उत्कृष्टता का इस्लाम और ईसाइयत की उक्त कल्पना के साथ कैसे सामजंस्य बैठाएंगे? यह बात समझ से बाहर है। जो तथ्य कभी किसी संस्कृति का आधार ही नहीं रहा, उसे उस पर बलात् थोपना एक अपराध है। अत: भारत की वैदिक संस्कृति हिंदू संस्कृति है, जो अपने आप में सारे संसार के अंदर अनुपम है, अद्वितीय है, और अवर्णनीय है। इसमें सांझावाद के गुण ढूंढऩा निकृष्ट बुद्घि के लोगों का काम है। आइए हम गायें-
संस्कृति शौर्य और साहस जिसका अद्वितीय है।
ज्ञान विज्ञान जिसका विश्व में अवर्णनीय है।।
तप त्याग साधना भी जिसकी अकथनीय है।
मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है, मेरा...।।

ऐसी पुण्यभूमि भारत माता की 'पुण्य संस्कृति' को हमारा सादर प्रणाम। हमारे देश में वर्तमान राजनीति की उठा-पटक का आधार दो शब्द बने हुए हैं-एक तो 'धर्मनिरपेक्षता' और दूसरा 'धर्मसापेक्षता' ये धर्मसापेक्षता का शब्द उन लोगों ने अपनी राजनीति को बनाये रखकर चमकाने का हथियार बना रखा है-जो स्वयं को सैक्युलर कहते हैं। इनका मानना है कि राजनीति को धर्म और धर्म से राजनीति को सर्वथा दूर रहना चाहिए।

धर्मसापेक्षता को मानने वाले लोगों की मान्यता है कि धर्म को राजनीति से पृथक करना सर्वथा असम्भव है। इसलिए इस मान्यता के लोग धर्म और राजनीति के परस्पर सामजंस्य से ही लोक का कल्याण करना चाहते हैं। 'सैक्युलर' लोग इन्हें भारत में साम्प्रदायिक शक्तियां अथवा 'कम्युनल फोर्सेज' कहकर पुकारते हैं। यहां हमारे लिए विवेच्य विषय भी दो शब्दों की व्याख्या में ही समाहित हैं। प्रथम 'धर्म' और दूसरा 'राजनीति।' यदि इन दोनों का अर्थ स्पष्ट हो जाए तो भारत में सैक्युलर लोग अच्छे हैं या कथित साम्प्रदायिक लोग अच्छे हैं? इस रहस्य पर से पर्दा स्वयं ही उठ जाएगा। अत: हमें विचार करना होगा कि-
धर्म क्या है :- आहार, निद्रा, भय और संतानोत्पत्ति हेतु मैथुन की क्रिया सभी जीवधारियों में समान रूप से मिलती है, किंतु हमारे नीतिशास्त्रकारों की मान्यता है कि धर्म ही एक ऐसी वस्तु है जो मानव में विशेष रूप से मिलती है। क्योंकि धर्म ही वह वस्तु है जिसके लिए हमारे दर्शनकार ने कहा है कि-
'यतोअभ्युदय: निश्रेयससिद्घि: स धर्म:।'

अर्थात जिससे अभ्युदय की प्राप्ति और नि:श्रेयस की सिद्घि हो वही धर्म है। यह अभ्युदय की प्राप्ति हमारी इहलौकिक उन्नति है तो नि:श्रेयस की सिद्घि का नाम पारमार्थिक-पारलौकिक उन्नति है। स्पष्ट है कि जिसके साधने से अथवा धारने से लोक और परलोक दोनों सधें वही 'धर्म' है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)