धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-चार

  • 2016-11-12 03:30:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-चार

नीति का गलत अर्थ किया गया
हमारे यहां पर श्रीकृष्ण जी को नीतिवान महापुरूष माना गया है। भारत से द्वेष रखने वाले लेखकों ने 'श्रीकृष्ण जी की नीति' को छल, कपट और उल्टे-सीधे दांवपेंच फेंककर अपने स्वार्थ पूत्र्ति को साधने वाली नीति का पर्याय माना है। इस महापुरूष को निहित स्वार्थी, कामी, व्यभिचारी और लंपट लोगों ने स्त्रियों के साथ नचाया है और उन्हें वेद पालक और वेद रक्षक के स्थान पर एक 'नचकैया' अधिक सिद्घ किया है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था।

इस महामानव की नीति का सार केवल एक ही था-धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश। अपनी इस नीति के साफल्य के लिए उन्होंने मोक्ष के आनंद को भी एक ओर रखना स्वीकार कर लिया और उद्घोष कर दिया कि धर्म की संस्थापनार्थ तो मैं बार-बार जनम लेना अच्छा समझूंगा। क्योंकि धर्म की संस्थापना करना, लोक में व्यवस्था स्थापित करना ही तो उनका जीवन ध्येय था, उनका धर्म भी कदापि यही था। अत: श्रीकृष्ण जी की नीति धर्म का ही पर्याय थी, अन्य कुछ नहीं।

दूसरा उदाहरण हमारे यहां 'चाणक्य की नीति' में उल्लिखित राजनीति के चार सोपान-साम, दाम, दण्ड और भेद को लिया जाता है। इस महापुरूष की इस राज्यव्यवस्था के चार सोपानों में से हम देखते हैं किसामान्यतया लोग भेद पर अधिक ध्यान देते हैं।
आजकल राजनीति बन गयी है भेद नीति, और इस भेद के पीछे पड़े रहने के कारण ईष्र्या, छल, कपट और चालाकी आदि की सारी गंदगी राजनीति में आ गयी है। साम की बात नहीं रही, दाम की बात नही रही, दण्ड की बात नहीं रही। बात रह गयी केवल भेद की।

अब जब राजनीति का पर्याय भेद ही मान लिया गया हो तो फिर मतभेद और मनभेद तो उत्पन्न होंगे ही। इस ओर हमने तनिक भी विचार नही किया कि हमारी राजनीति की गाड़ी आखिर पटरी से नीचे उतरी हुई क्यों घूम रही है? बात स्पष्ट है कि हमने अनीति को ही नीति और राजधर्म के विपरीत आचरण के अधर्म को ही धर्म मान लिया। इसलिए हमारी लुटिया डूब गयी, और समाज की कुटिया टूट गयी।

राजधर्म क्या है?
छल, कपट, झूठे अहम और झूठे बहम में गिरी, घिरी और घुसी व धंसी पड़ी राजनीति के पचड़ों, लफड़ों और झगड़ों को देखकर एक स्वाभाविक सा-प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर 'राजधर्म' क्या है? कौन सी वह व्यवस्था है जो हमारे राजनीतिज्ञों के लिए आचार संहिता बन सकती है? हमारे ये राजनीतिज्ञ आचार संहिता की बात करते हैं। बातंह तो करते हैं किंतु आचार संहिता बनाते नही हैं।
अपने भत्ते, वेतन सुविधा और पेंशन बढ़ाने की बात आए तो घंटे भर में संसद में सारी कार्यवाही पूर्ण हो जाती है। यदि जनहित का कोई प्रश्न या कोई समस्या अथवा विधेयक संसद में आ जाए तो न बहस करते हैं उस पर और न उसे पास होने देते हैं। क्योंकि ये हैं धर्महीन धर्मनिरपेक्ष, जिन्हें जनता के प्रति अपने धर्म का ही बोध नहीं है। इसलिए आचार संहिता बनाने का राग तो अलापते हैं किंतु इसे बनाते नहीं हैं। यदि इन्हें आचार संहिता की अधिक ही आवश्यकता अनुभव हो रही है तो उसे बना लें, इन्हें रोका किसने है? किंतु यदि नहीं बना सकते हैं तो सुन लें। हमारे नीतिकारों ने इनकी आचार संहिता के बारे में क्या कहा है-
त्यजेदेकम् कुलस्यार्थे ग्रामस्वार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे स्वात्ममार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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