धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-पांच

  • 2016-11-15 11:15:35.0
  • राकेश कुमार आर्य

धर्म और राजनीति का परस्पर संबंध, भाग-पांच

जब व्यक्ति और समाज के हितों में संघर्ष हो तो राज्य और समाज के व्यवस्थापकों का यह कत्र्तव्य है कि किसी कुल के हितों की रक्षा के लिए वे एक व्यक्ति के हित को छोड़ दें।
जब किसी कुल और ग्राम के हितों में संघर्ष हो तो ग्राम के हित के लिए कुल के हित को त्याग देना चाहिए। जब किसी ग्राम और जनपद के हितों में परस्पर संघर्ष की स्थिति आये तो जनपदीय हितों के समक्ष ग्राम के हितों को त्याग दें। परंतु यदि मनुष्य की अंतरात्मा के साथ संघर्ष हो तो सारी पृथ्वी को भी त्याग देना उचित है।
अपने राजनीतिज्ञों का आचरण ऐसा हो-यही हो उनकी राजनीति का आधार और यही हो उनका लोक व्यवहार, यही हो उनका राजधर्म और यही हो उनके जीवन का सर्वोच्च कर्म।

तब क्या होगा?
यदि हमारे राजनेताओं ने अपनी आचार संहिता का आधार उक्त नीति श्लोक को बना लिया तो क्या होगा? तब होगा-
चनिहित स्वार्थों की राजनीति करने वालों के लिए 'कश्मीर' प्रासंगिक और प्राथमिक हो जाएगा।
चनेताजी सुभाष चंद्र बोस की 'तोजो का कुत्ता' और चीन द्वारा हमले के समय चीनी फौजों को 'लाल सलाम' कहने वाले साम्यवादियों के लिए इस बात से पर्दा उठ जाएगा कि राष्ट्र क्या है और राष्ट्रधर्म क्या है?
-यमुना सतलुज संपर्क नहर और कृष्णा-कावेरी जैसे नदी जल विवाद चुटकियों में समाप्त होते हुए दिखलाई देंगे।
-भाषाई झगड़े, साम्प्रदायिक लफड़े और जातिवाद के पचड़े ऐसे झड़ जाएंगे जैसे मानो ये कभी थे ही नहीं।
-क्षेत्रवाद का विस्तार 'राष्ट्र' तक दिखने लगेगा। चिंतन की परिधि का केन्द्र राष्ट्र बन जाएगा।
-मानवतावाद सबसे बड़ा धर्म होगा और धर्म का सारा रहस्य धर्महीनों के अंत:करण में उद्घाटित हो चुका होगा। सारे के सारे राजनेता बोधत्व को प्राप्त हो गये होंगे। क्योंकि तब 'सर्वजन हिताय' और 'सर्वजन सुखाय' ही उनकी नीति का अंग होगा।

यही तो धर्म है और जब यही धर्म है तो इसे राजनीति से अलग रखने की मांग की अनौचित्यता और अतार्किकता स्वयं ही समझ में आ जाती है। अत: स्पष्ट है कि 'राजनीति और धर्म का अन्योन्याश्रितता का संबंध है' यदि उन्हें एक दूसरे से अलग रखने, देखने और समझने का प्रयास किया गया तो यह राष्ट्र के लिए अनर्थ को निमंत्रण देना होगा।
हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 1995 में 'हिन्दुत्व' को परिभाषित किया गया था, जिसके द्वारा माननीय न्यायालय ने 'हिन्दुत्व' को एक संप्रदाय न मानकर उसे एक जीवन प्रणाली स्वीकार किया था। वास्तव में ही 'हिन्दुत्व' एक जीवन प्रणाली है, जिसका धर्म विश्व में सर्वोच्च मानवीय मूल्यों को लेकर आगे बढ़ता है। क्या ही अच्छा हो कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय धर्म को भी परिभाषित कर दे और धर्म एवं मजहब के बीच अंतर करते हुए स्पष्ट कर दे कि धर्म वे मानवीय मूल्य हैं जो हमें एक दूसरे के साथ जोड़ते हैं और साथ रहने, साथ चलने और साथ मरने तक की व्यवस्था करते हैं। जबकि संप्रदाय या मजहब हमें धर्म के विपरीत एक से अनेक बनाता है, हमें तोड़ता है और हमारे बीच अनेकता की ऐसी खाई पैदा करता है जिसे भरा नही जा सकता।

एक षडय़ंत्र के अंतर्गत दुर्भाग्य से आज इसी अनर्थ को हमने बुला रखा है। इस स्थिति से हमें छुटकारा पाना ही होगा।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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