राष्ट्र भाषा बनने का हिन्दी का जन्मजात अधिकार

  • 2016-12-27 09:30:56.0
  • राकेश कुमार आर्य

राष्ट्र भाषा बनने का हिन्दी का जन्मजात अधिकार

26 दिसंबर 1900 को आर्य प्रतिनिधि सभा ने संस्कृत को लेकर और डी.ए.वी. कॉलेज के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए जिस नियमावली का सृजन किया था उसका एक नियम यह भी था कि संस्कृत के अध्ययन का प्रारंभ करना देशभक्ति का कार्य है। भारत की शिक्षा पद्घति सच्चे अर्थों में तभी राष्ट्रीय हो सकती है जब यहां के शिक्षणालयों में संस्कृत का अध्ययन हो। ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में जिस शिक्षा प्रणाली को प्रचलित किया गया है वह भारतीयों की देशभक्ति का विनाश कर रही है और मानसिक दास बना रही है, आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा की एक ऐसी योजना तैयार की जाए जो सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय हो। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि विदेशी भाषा तथा नये ज्ञान-विज्ञान को ग्रहण न किया जाए। हमें अंग्रेजी, आधुनिक विज्ञान, पाश्चात्य दर्शन, अर्थशास्त्र और राजनीति आदि का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। क्या यूरोपीयन लोग अन्य देशीय भाषाओं और प्राच्य साहित्य आदि को नहीं पढ़ते? पर क्या किसी यूरोपियन देश ने अपनी शिक्षा को विदेशी बनाया है? इसी प्रकार हमें भी विदेशी ज्ञान-विज्ञान को पढ़ते हुए भी अपनी राष्ट्रीयता की रक्षा करनी चाहिए। गुरूकुल की स्थापना का यह भी एक प्रमुख कारण था। उसमें अंग्रेजी पाश्चात्य दर्शन आदि के पठन-पाठन के लिए समुचित व्यवस्था की गयी थी, पर प्रमुखता वेदशास्त्रों तथा संस्कृत साहित्य की रखी गयी थी। आंग्ल भाषा प्रधान शिक्षा भारतीयों की मानसिक दासता का कारण बनी रहेगी। विदेशी भाषा द्वारा शिक्षित होकर भारतीयों में मौलिकता का विकास हो सकना संभव ही नहीं है।


आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का यह प्रस्ताव चाहे पुस्तकों में बंद होकर रह गया हो-पर यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना सन 1900 में था। पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा के इस प्रस्ताव को हमें इसलिए भी महत्वपूर्ण मानना चाहिए कि 1947 में भाषा और मजहब के नाम पर हुए देश के बंटवारे को पंजाब ने बड़ी गहराई से अनुभव किया था और इसका एक बड़ा भाग कटकर पाकिस्तान में चला गया था। इतना ही नहीं जो पंजाब हमें आज दिखाई देता है वह भी सन 1900 वाला पंजाब नहीं है और ना ही 1947 वाला पंजाब है। इसमें भी आज के दिल्ली प्रदेश, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश को मिलाया जाए तो 1947 वाला (कटा हुआ) पंजाब हमें मिल जाएगा। पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा सन 1900 में यही तो कह रही थी कि भारत की शिक्षा पद्घति सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय तभी हो सकती है जब यहां के शिक्षणालयों में संस्कृत का अध्ययन हो। पर हमने पंजाब में विदेशी भाषा का प्रचलन जारी रखा और पंजाबी व हिंदी के नाम पर इस प्रदेश को बांटकर रख दिया। पंजाबी हमारे लिए सम्माननीय भाषा हो सकती है परंतु राजनीति ने उसके नाम पर आंदोलन करके उसे साम्प्रदायिक भाषा बना दिया और गुरूओं की पवित्र भूमि का बंटवारा भी साम्प्रदायिक आधार पर कर दिया। यह देशविरोधी कार्य था। यदि पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा की भावनाओं का सम्मान किया जाता और देश के स्वतंत्र होने के उपरांत देश में अपनी राष्ट्रभाषा का विकास होता तो पंजाब का और देश के अन्य प्रांतों का भाषा के नाम पर बंटवारा ना होता।

हम अपने विद्यामंदिरों में ब्रह्मचर्य की शिक्षा को लागू करें। सैक्स की शिक्षा हिन्दी की या संस्कृत की भावनाओं के अनुरूप नहीं है। हिंदी वीर्यनाश को बढ़ावा ना देकर अपनी जननी संस्कृत की भांति वीर्य वृद्घि को बढ़ावा देती है और वीर्य संपन्न युवा ही किसी देश की वास्तविक पूंजी हुआ करते हैं। इस प्रकार हिंदी देश की वास्तविक पूंजी को सहेजने की भाषा है जो युवा वर्ग को उनकी जीवनीशक्ति का सदुपयोग करना सिखाती है और समाज के विलासितापूर्ण एवं कामुक वातावरण को शुद्घ पवित्र बनाने पर बल देती है। हिंदी की मूलभावना संस्कृत के अनुरूप ही है कि देश में शिक्षणालय नगरों से दूर प्रकृति की गोद में स्थापित किये जाएं। जिनमें विद्यार्थियों को अपने जीवन निर्माण की शिक्षा दी जाए। यह सत्य है कि जीवन निर्माण के लिए ब्रह्मचर्य की शिक्षा आवश्यक है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि आज एक ऐसा वर्ग देश के इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के साथ-साथ फिल्म जगत पर हावी हो गया है, जो भारत की युवा पीढ़ी को खुले सैक्स की शिक्षा देकर उसे नष्ट कर रहा है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाकर और उसकी भावना के अनुरूप भारत की शिक्षा प्रणाली को लागू करके हम अपनी युवा पीढ़ी के वर्तमान और भविष्य की रक्षा कर सकते हैं।
हिंदी हमारे बच्चों को संस्कार देने वाली भाषा है। यह संस्कारों का संसार बसाने वाली भाषा है और हर शिक्षार्थी को यह बताने वाली भाषा है कि तेरे गुरूजी तेरे पिता तुल्य हैं। इतना ही नहीं यह हर एक गुरू को भी यह समझाने वाली भाषा है कि प्रत्येक शिक्षार्थी तेरा शिष्य बाद में है-पुत्र पहले है। इसलिए हिंदी प्रत्येक शिक्षार्थी को गुरू में पिता और गुरू को प्रत्येक शिष्य में एक पुत्र देखने की अनोखी शिक्षा देती है। वह स्थापित करती है कि गुरू का गुरूकुल गुरू का वह गर्भ है जिसमें से वह कितने ही नवयुवकों को द्विज बनाकर अर्थात दूसरा जन्म देकर बाहर भेजता है। ऐसे पवित्र संस्कारों को देने वाली हिंदी को इस देश की राष्ट्रभाषा बनने का जन्मजात अधिकार है।

हमारा विचार है कि राष्ट्रभाषा बनने का अधिकार उसी भाषा को दिया जाना अपेक्षित होता है जो उस देश की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने के प्रति संकल्पित हो और इसे अपना पवित्र उद्देश्य मानती हो। साथ ही जो अपने देश के नागरिकों में परस्पर की बंधुता को बढ़ावा देने वाली हो और जो उनमें जातीय, साम्प्रदायिक या किसी प्रकार के क्षेत्रीय या भाषाई संकीर्ण विचार को बढऩे से रोकने में सक्षम हो, जो लोगों को मानवतावादी बनाये और उन्हें हर प्रकार से समृद्घ और संपन्न देखने के लिए प्रयासरत हो और न केवल प्रयासरत हो अपितु अपनी इस योजना को मूत्र्तरूप देने के लिए जिसके पास पूरी की पूरी एक कार्य योजना भी हो। यह प्रसन्नता की बात है कि हिंदी अपने आप में इन सभी गुणों को समाहित किये हुए है। जब वह अपना एकाधिकार भारत की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित वेदों और वैदिक संस्कृति पर स्थापित करती है तो वह स्पष्ट कर देती है कि इसके प्रति मेरी निष्ठा केवल इसलिए है कि मैं भारत को अखण्ड और एक देखना चाहती हूं और अपनी वैदिक संस्कृति को इस देश की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का एक मात्र उपाय मानती हूं। हिन्दी रामायण को भी सम्मान देती है हिंदी महाभारत को और गीता को भी सम्मान देती है और देश की सारी भाषाओं को राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति समर्पित होने का पाठ पढ़ाकर उनकी मार्गदर्शिका भी बन जाती है-बड़ी बहन बन जाती है। उसे कोई आपत्ति नहीं होती-जब उससे कोई कन्नड़ में या मलयालय में या किसी अन्य क्षेत्रीय या प्रांतीय भाषा में बात करता है। यहां तक कि अंग्रेजी में बात करने वाले से भी कोई आपत्ति नहीं। उसकी सहिष्णुता कभी भी असहिष्णुता में परिवर्तित नहीं होती। इतनी सहृदयी भाषा को हम जितना शीघ्र राष्ट्रभाषा बना दें उतना ही शुभ और उत्तम रहेगा।
हिंदी भारत की शिक्षा पद्घति का भारतीयकरण चाहती है और यह कोई अपराध नहीं। हर देश अपनी शिक्षा का स्वदेशीकरण करता है यदि उनके लिए ऐसा करना कोई अपराध नहीं है तो हमारे लिए ही ऐसा क्यों हो? अब हिंदी की इस इच्छा को राष्ट्रद्रोह मानने वाले राष्ट्रद्रोहियों का भण्डाफोड़ होना ही चाहिए कि अंतत: हिंदी के पवित्र उद्देश्य को राष्ट्रद्रोह मानने या मनवाने की उनकी प्रवृत्ति के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या है? हिंदी सबके लिए नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की समर्थक है, क्योंकि संसार में आकर भोजन, वस्त्र, और आवास की समस्या से जूझना मनुष्य का उद्देश्य नहीं है, अपितु ज्ञानार्जन कर भोजन वस्त्र और आवास की समस्या का समाधान खोजना मानव जीवन का उद्देश्य है। हिन्दी 'जूझने' से हटाकर 'खोजने' की ओर बढ़ती है। तभी तो यह हमारी राष्ट्रीय पहचान है और भारत का स्वाभिमान है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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