राष्ट्र भाषा बनने का हिन्दी का जन्मजात अधिकार भाग-दो

  • 2016-12-28 05:15:25.0
  • राकेश कुमार आर्य

राष्ट्र भाषा बनने का हिन्दी का जन्मजात अधिकार भाग-दो

हिन्दी हमें अपने उस गौरवपूर्ण अतीत की झांकी का दिव्य दर्शन कराने की शक्ति-सामथ्र्य रखती है जिसे हम इतिहास में वैदिक-युग के नाम से जानते हैं। महाकवि भवभूति हमारे उस अतीत से हमें जोड़ते हुए बताते हैं कि एक कल्याण के करने पर ही दूसरे कल्याण हमारे पास आते हैं।
वृत्तासुर को मारने के लिए देवताओं ने महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र तैयार कराया था, जिसके लिए महर्षि दधीचि को अकाल मृत्यु का वरण करना पड़ा था। उनका पुत्र पिप्पलाद उस समय बहुत छोटा था, बड़ा होने पर जब उसे पता चला कि उसके पिता को देवताओं के स्वार्थ की बलि चढऩा पड़ा था तो वह देवताओं के संहार के लिए भगवान शिव की तपस्या करने लगा।
पिप्पलाद की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उसे दर्शन दिये और वर मांगने के लिए कहा।
पिप्पलाद बोला-''यदि आप वास्तव में ही मुझसे प्रसन्न हैं तो अपना तीसरा नेत्र खोलकर देवताओं को भस्म कर दें।'' इस पर महादेव ने उससे कहा-''मैं यह कर तो सकता हूं, लेकिन इससे जो विनाश होगा, क्या तुम उसके लिए तैयार हो? क्योंकि तुम्हारे नेत्र सूर्य हैं, तुम्हारे हाथ द्वंद्व हैं और मन चंद्रमा है तथा तुम्हारे अन्य अंग प्रत्यंग भी देवताओं के ही रूप हैं। यदि तुम इन्हीं को ही नष्ट कर दोगे तो तुम्हारा शरीर कैसे रहेगा? दूसरों का बुरा चाहने में स्वयं का भी बुरा होता है। तुम्हारे पिता ने दूसरों के कल्याण के लिए शरीर त्याग दिया, फिर तुम उनके पुत्र होकर दूसरों का बुरा क्यों चाहते हो?
तनिक सोचिए कि दूसरों के कल्याण में ही तुम्हारा कल्याण है।''
पिप्पलाद को कल्याण का अर्थ समझ में आ चुका था।
हिन्दी हिन्दुस्थान की आत्मा है। इसलिए वह वही बोलेगी जो हिंदूस्थान या आर्यावत्र्त के संस्कारों के और दूसरी संस्कृति के अनुकूल होगा। इस देश की संस्कृति 'दाधीच परम्परा' वाली रही है। 'दाधीच परम्परा' देश और मानवता के लिए बलिदान देने की परम्परा है, परकल्याण के लिए अपना सर्वस्व होम करा देने वाली परम्परा है। इस देश से इस प्रकार की बलिदानी परम्परा को मिटाने का कार्य अंग्रेजी ने किया है, क्योंकि इस विदेशी भाषा के शासक लोग इस देश से इसकी 'दाधीच परम्परा' को मिटा देने के लिए सचेष्ट रहे थे। यदि हमारी हिंदी अपने प्रतिष्ठित पद को प्राप्त होती है तो समझिये कि इस देश में पुन: 'पिप्पलाद' को 'कल्याण' का अर्थ समझ आ जाएगा।
हिन्दी अपना कार्य इस देश के अतीत के स्मारकों के पुनरूद्घार के लिए करना चाहेगी। इसके इतिहास का पुनर्लेखन इसका प्रमुख उद्देश्य होगा। हमारे इतिहास में जितनी भर भी संदिग्धताएं हैं उन्हें समूल नष्ट करना हिंदी की प्राथमिकता होगी। हिंदी चाहेगी कि इस देश के रोम-रोम में आत्मगौरव की झंकार हो उठे। सर्वत्र हमारे बलिदानी, आत्मज्ञानी और आत्मस्वाभिमानी पूर्वजों के यश की जय-जयकार हो उठे। हमारे अतीत हमारे वर्तमान के सामने प्रकट हो और वर्तमान अपने अतीत की आरती उतारने लगे। सर्वत्र राष्ट्रवाद भी हुंकार हो, एक ही ललकार हो, एक ही टँकार हो, और भारतमाता की जय हो। सारा राष्ट्र एक मंदिर बन जाए और मां भारती उस मंदिर की दिव्य प्रतिमा बन जाए जिसके समक्ष सारा देश नतमस्तक हुआ खड़ा हो। सबके मन में एक ही भाव हो-एक ही चाव हो मैं भारतीय हूं, मैं हिंदू हूं और मां भारती का वंदन करने में मेरा रोम-रोम पुलकित हो रहा है। ऐसी पावन और ऊर्जामयी झांकी केवल हिंदी ही इस देश में प्रस्तुत कर सकती है।
हिन्दी इस देश की मिट्टी का नाम है। इसकी हवाओं में बसी सुगंधि का नाम हिंदी है। इसके कण-कण से निकलने वाले एक सुंदर मनोरम संगीत का नाम हिंदी है। जो इस मिट्टी को केवल मिट्टी मानता है-वह स्वयं मिट्टी है और जो इस देश की हवाओं में बसी सुगंधि को पहचान नही पाता है वह स्वयं संवेदना शून्य है। इसी प्रकार इस देश के कण-कण से निकलने वाले संगीत का जो आनंद नही ले पाता वह स्वयं गूंगा और बहरा है और यह सर्वमान्य सत्य है कि जिस देश के नागरिक मिट्टी बन जाते हैं-संवेदनाशून्य हो जाते हैं या गूंगे बहरे बन जाया करते हैं-वह देश अधिक देर तक जीवित नही रह पाता है। भाषा की भिन्नताएं और उनके प्रति हमारे पूर्वाग्रह हमें संवेदनाशून्य मिट्टी का ढेला बन रहे हैं, और गूंगा-बहरा बनाकर हमें संसार से काट रहे हैं। इस दिशा में हमें धकेलने में अंग्रेजी ने विशेष कार्य किया है। वह हमें हमारी जड़ों से काट देना चाहती है-जबकि हिन्दी हमें हमारे अतीत से जोडक़र 'आत्मदीपोभव:' का उपदेश देकर आगे लेकर चलना चाहती है। अंधकार से प्रकाश की ओर बढऩे और चलने का संकल्प लेने वाले हर भारतीय का यह दृढ़ निश्चय होना चाहिए। वह आत्म प्रदीप्त होने के भाव को प्राथमिकता दे और अपनी भाषा का सम्मान करना अपना राष्ट्रीय कत्र्तव्य माने।
आजकल अंग्रेजी भाषा ने हमारे बीच ऊंच-नीच की भावना को जन्म दिया है और तथाकथित ऊंचावर्ग निम्न वर्ग को अपनी कालोनी में बसाने तक को तैयार नहीं है। यही कारण है कि 'जजेज कालोनी' ऑफिसर्स कालोनी , एडवोकेटस कालोनी, डाक्टर्स कालोनी आदि के नाम पर ऐसी कालोनी देश में बसायी जा रही हैं जो व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य दूरी बनाती हैं। दुख का विषय है कि हम इस प्रकार की दूरी को बनने दे रहे हैं और उसमें अपना योगदान भी दे रहे हैं। संविधान के वे सारे प्रस्ताव, प्राविधान और धाराएं मौन हैं जो समाज में समतामूलक समाज की संरचना की बात करती हैं, सारे मानवाधिकारवादी मौन हैं और समता के लिए काम करने वाले सभी सामाजिक संगठन भी मौन हैं। वे देखकर भी कुछ नहीं कर रहे हैं। कारण कि वे स्वयं उसी शिक्षा प्रणाली के कीड़े हैं जिसे वे अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा प्रणाली कहते हैं। इस माध्यम की शिक्षा प्रणाली ने इन सबको भी मानसिक रूप से बीमार कर दिया है और वे जानकर भी नहीं समझ पा रहे हैं कि सच क्या है?
हिन्दी उस 'सामाजिक स्वच्छता अभियान' को चलाना जानती है जो इस देश में वास्तविक समानता के संगीत का फुव्वारा प्रवाहित कर सकता है। हिंदी महर्षि दयानंद के सपनों का भारत बनाने का संकल्प लेकर ऐसी शिक्षण व्यवस्था लागू करेगी जिसमें शिक्षण संस्थाओं में सबके साथ एक समान व्यवहार होगा। चाहे कोई राजकुमार व संभ्रात वर्ग की संतान हो या चाहे दरिद्र की, उनका अपने माता-पिता व अन्य पारिवारिक जनों से कोई संपर्क भी नहीं करना चाहिए। न वे अपने घर जा सकें और ना ही अपने कुटुम्बियों से पत्र व्यवहार ही कर सकें, जिससे कि उन्हें ज्ञात न हो सके कि उनकी परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति क्या है? इससे न किसी में हीन भावना उत्पन्न होगी और न किसी को उच्च समझने का अवसर प्राप्त होगा। शिक्षण संस्थाओं में पढ़ते हुए विद्यार्थियों में जो भेद होंगे वे उनके व्यक्तिगत गुणों योग्यता व क्षमता के आधार पर होंगे उनकी पारिवारिक स्थिति के आधार पर नहीं।
समता की इससे उत्तम कोई अवस्था नहीं हो सकती और ना ही समता लाने का इससे उत्तम कोई उपाय हो सकता है।
हमने अपनी इस श्रंखला में जितने भी लेख लिखे हैं उनका उद्देश्य हिंदी को इस देश का प्राणतत्व घोषित कराना है। यदि हिंदी नहीं रही या जारी षडय़ंत्रों के चलते हिंदी की स्थिति को हमने अति दुर्बल कर लिया तो हमारी स्थिति वैसी ही हो जाएगी जैसी प्राणतत्व के न रहने पर शरीर की हो जाती है। हमें समय रहते अपने प्राणतत्व की चिंता करनी चाहिए। जिन लोगों ने या विदेशी शक्तियों ने इस देश के प्राणतत्व को दुर्बल करने का षडय़ंत्र चला रखा है-हमारी पारखी दृष्टि को उस षडय़ंत्र को समझना चाहिए। भाषा को दुर्बल करते-करते ये लोग हमारे देश को दुर्बल कर देना चाहते हैं। इसलिए अपनी राष्ट्रभाषा के सम्मान के लिए हमें उठ खड़ा होना चाहिए। एक साथ, एक स्वर से और बड़ी प्रबलता से हमें भारती हिंदी की आरती उतारने के लिए थाल सजाने चाहिए यदि विलंब किया तो अनर्थ हो जाएगा।
आशा है मेरे लेखों का आशय और उद्देश्य सुबुद्घ पाठक समझेंगे और अपनी राजभाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने के लिए विशेष प्रयत्न करेंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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