काले धन के विरूद्घ सबसे बड़ा कदम

  • 2016-11-10 03:30:28.0
  • राकेश कुमार आर्य

काले धन के विरूद्घ सबसे बड़ा कदम

मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही कुछ लोगों ने सोचा था कि उनके आते ही मुसलमानों को चुन-चुनकर या तो मारा जाएगा या उन्हें उठा-उठाकर सीमा के उस पार पाकिस्तान में फेंका जाएगा, जिसके लिए उनमें से अक्सर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों की आवाज सुनने को मिलती रहती है। जिन लोगों ने मोदी के विषय में ऐसा सोचा था उन्हें निराशा हाथ लगी और वे आज तक अपने भाग्य को कोस रहे हैं कि यह मोदी हमारे भाग्य में क्यों लिखा था? इसी प्रकार कुछ लोगों ने सोचा था कि मोदी अपनी पार्टी के हैं और पार्टी शर्मायेदारों की है इसलिए यदि वह आते हैं तो अपनी मौज आ जाएगी, पर शर्मायेदारों की तो बात छोडिय़े वह तो अपनों की भी नहीं रही क्योंकि उसकी सरकार का मुखिया एक ऐसा आदमी बन गया जो अपनी भतीजी की भी नौकरी दिलाने में सहायता करने से यह कहकर मना कर देता है कि बेटे ये नही कर पाऊंगा, क्योंकि तुम जैसी मेरी करोड़ों बेटियां हैं। इसलिए ये सौ रूपये पकड़ो और जाओ मेहनत करो और अपनी मेहनत से आगे बढ़ो। ऐसे मोदी को देखकर भी कई लोगों को निराशा ही हाथ लगी है।


प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली है कि इधर-उधर ध्यान मत दो और अपने लक्ष्य पर या अपने काम पर ध्यान लगाये रहो। वह जानते हैं कि काम अधिक है और समय थोड़ा है। समय बड़ी तेजी से भाग रहा है। वह 2019 के लिए वैसी ही तैयारी कर रहे हैं जैसे एक प्रतिभावान छात्र अपनी परीक्षा की पूरी तन्मयता से तैयारी करता है। उन्हें नकल नही मारनी है और ना ही किसी गठबंधन जैसी बैसाखी का सहारा लेना है, उन्हें तो जो कुछ भी करना है वह अपने बूते करना है, इसलिए सधे हुए पर मजबूत कदमों से (निर्णयों) वह आगे बढ़ रहे हैं।

जो लोग मोदी के आते ही मुसलमानों के साथ उनके कठोर व्यवहार की कल्पना कर रहे थे या जो उनके आते ही अपनी पार्टी की सरकार के चलते सब कुछ करने की छूट मिल जाने की सोच रखते थे- उन सबको मोदी ने अपनी कार्यशैली से बताया है कि सब कुछ इस्लामिक आतंकवाद तक या भाई भतीजावाद या दलगतहितों की राजनीति में ही समाहित नहीं है। आतंकवाद एक समस्या अवश्य है और यह भी सत्य है कि हर आतंकवादी एक मुसलमान है, पर आतंकवाद से अलग भी बड़ी-बड़ी समस्याएं हैं, जिनका आतंकवाद की तरह ही सामना करना होगा। क्षेत्रवाद की समस्या है, जिससे बड़े-बड़े विद्वान और नेता भी प्रभावित हैं। अपने-अपने क्षेत्रों की बातें या प्रांतों की बातें देश की संसद में ऐसे उठायी जाती हैं-जैसे उठाने वाला एक अलग देश का राजा हो-यह भी एक समस्या है। पानी पर हरियाणा पंजाब ऐसे लड़ते हैं जैसे दो देश लड़ रहे हों-यह भी एक समस्या है। भाषा को लेकर इस्लामिक आतंकवाद को सबसे मुखर होकर कोसने वाली शिवसेना की सोच क्या है? सभी जानते हैं-यह भी एक समस्या है। कहने का अभिप्राय है कि शरीर के हर जोड़ में दर्द है, रोम-रोम में मवाद पड़ी है। जहां भी हाथ रखोगे-वहीं से रोगी चिल्ला पड़ेगा। इसलिए केवल एक रोग से ईलाज आरंभ करना ठीक नहीं। देखना यह पड़ेगा कि रोगी बचे भी और रोग भगे भी। इसी दिशा में जब कार्य किया जाता है तभी देश का समग्र विकास होना संभव होता है।

अब मोदी सरकार ने आजादी के बाद का सबसे बड़ा निर्णय लेते हुए व कालेधन पर रोक लगाने का ऐतिहासिक कदम उठाते हुए एक झटके में ही 500 व 1000 के नोटों को बंद करने का साहसिक निर्णय लिया है। काले धन को उगलवाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने इससे पूर्व कालाधन रखने वालों को पर्याप्त समय दिया और उन्हें चेताया भी कि एक और 'सर्जिकल स्ट्राइक' होने जा रहा है-चेत जाओ और समय रहते सही दिशा में और सही दशा में आ जाओ।

वास्तव में देश की स्थिति ऐसी बन गयी थी कि एक समानांतर अर्थव्यवस्था देश में चल रही थी। फर्जी नोट बनाने का धंधा बड़ी तेजी से चल रहा था, लोगों की जमीनों को दलाल और बिल्डर मनमाने मूल्य पर लेकर उन पर अपने अत्याचार ढा रहे थे, पर अब ये सारी बातें बीते दिनों की होती जा रही हैं। बीमार देश को रोग मुक्त करने के लिए मोदी ने फिर एक 'शल्य क्रिया' कर डाली है। इससे कालाधन एक क्षण में ही कागजों का ढेर बनकर रह गया है। जिन नोटों के ढेरों को देखकर लोग फूले नही समाते थे और जिनके बल पर लोग सत्ताओं की अदला-बदली कराना, प्रदेशों में मनमानी सरकार बनवाना या किसी निर्वाचित सरकार को रातों रात भूमिसात करने के खेल खेल दिया करते थे आज वह सारी रंगीनियां और अहंकार को दिखाने वाली शानो-शौकत का दौर अचानक रूक गया है। अब नोटों का वह ढेर चाट खाने या किसी गरीब का चूल्हा झोंकने में काम आएगा। मोदी बहुत पहले से कहते आ रहे थे कि गरीब के लिए इस ढेर का बलिदान कर दो और तुम भी रख लो, पर रख लो सही और कानूनी ढंग से। पर लोग नही माने अब मोदी ने निकाल लिया-यह अलग बात है कि रईसों को उनकी औकात बताकर भी मोदी इस धन को गरीबों के लिए प्रयोग नही करा सके। यह ध्यान रखना चाहिए कि 'सर्जिकल स्ट्राइक' में कुछ तो खून निकलता ही है। हमें प्रधानमंत्री के निर्णय में छिपे साहस और देश को सुधारने की उनकी भावना का सम्मान करना ही होगा। उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही बड़ोदरा में कहा था कि क्या हो यदि काले धन के विरूद्घ एक और 'सर्जिकल स्ट्राईक' हो जाए तो? अब उन्होंने अपना कहा पूर्ण कर दिया है-यह वैसे ही किया है जैसे उन्होंने पाकिस्तान के विरूद्घ सर्जिकल स्ट्राइक करने से पूर्व उसे दक्षिण भारत के एक राज्य की एक सभा से चुनौती दी थी कि पाकिस्तान के हुक्मरान सुन लें! मेरे सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, बदला लिया जाएगा। देश के नायकों में कथनी करनी में साम्यता स्थापित करने का साहस होना ही चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.