इतिहास की गंगा का स्वच्छता अभियान

  • 2016-10-20 05:00:16.0
  • राकेश कुमार आर्य

इतिहास की गंगा का स्वच्छता अभियान

अभी देश में 'समान नागरिक संहिता' और तीन तलाक की मुस्लिम समाज की परंपरा पर बड़ी गरमागरम बहस चल रही है। इसी समय एक बयान आ गया है कि जो लोग मुस्लिम समाज में चार पत्नी रखने को अनैतिक बता रहे हैं, उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनके यहां द्रोपदी के तो पांच पति थे। इस पर बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हिंदू समाज में हुई है।

हमारा मानना है कि इस समय 'स्वच्छता अभियान' की जिन बातों को लेकर मोदी सरकार चल रही है, उनमें इतिहास की गंगा के प्रदूषण को हटाकर इतिहास की गंगा का स्वच्छता अभियान भी चलाया जाना चाहिए। हमने अनेकों प्रमाणों के होते हुए भी अपने इतिहास नायकों को ऐसी बातों में या आरोपों में फंसाकर खड़ा कर दिया है कि वे इतिहास की अदालत में आज तक अपराधी बने खड़े हैं और पर्याप्त साक्ष्य होते हुए भी अपने महापुरूषों को इतिहास के न्यायालय से ससम्मान बरी कराने की कार्यवाही नही कर रहे हैं। यह दुख का विषय है।

कृष्णजी को ही लें, उनके जीवन पर व्यापक शोध हो तो पता चलेगा कि वह ब्रह्मचर्य में कितना विश्वास करते थे और उनकी ब्रह्मचर्य शक्ति का ही चमत्कार था कि वे अपने काल के 'महानतम विद्वान' बने। पर हमने उन्हें माखनचोर, कपड़ा चोर और औरतों का रसिया-छलिया बनाकर चूड़ी बेचने वाला बनाकर रख दिया। निहित स्वार्थ में जिन लोगों ने यह कार्य कर हमारे इस महानायक के साथ ऐसा कार्य किया वे वास्तव में 'जयचंदी छलछंदी' परंपरा के संस्कृति द्रोही लोग हैं। जिनके कारण विधर्मी भारत के सनातन धर्म की पवित्रता पर बार-बार कोई न कोई आरोप लगा देते हैं। हमें प्रयास करना चाहिए कि अपने महानायक को महामेधा संपन्न नारी शक्ति का सम्मान करने वाला, वेद ज्ञान का सूर्य, नीतिनिपुण और सुददर्शन चक्रधारी दिखाकर दुष्टों के संहार को इस देश का राष्ट्रधर्म घोषित करने वाले महापुरूष के रूप में स्थापित करें। यदि हम ऐसा करते हैं तो गांधीवाद की घुटने टेक नीति के कारण इस देश के शासकों के घुटनों में हुए वायुरोग का तुरंत उपचार हो जाएगा। समाधान हमारे पास है पर हम ना खोजें तो इसमें समाधान का क्या दोष है?

यही स्थिति द्रोपदी की है जिस पर हम कल के संपादकीय में प्रकाश डाल चुके हैं। आज देश में वे शक्तियां अपने आपको बेचैन अनुभव कर रही हैं जो अभी तक इस देश में बड़ी सहजता से धर्मांतरण कर रही थीं, और इस देश के बहुसंख्यक समाज की चादर को धीरे-धीरे कुतरती जा रही थीं। बहुसंख्यक समाज सो रहा था और उसे पता नही था कि कितना बड़ा षडयंत्र तेरे विरूद्घ हो रहा है? ये शक्तियां देश को कमजोर करने के लिए लामबंद होती जा रही हैं, उन्हें वे ही 'अच्छे दिन' चाहिएं जब वे अपना खुला खेल रही थीं, खेल तो सारा अनैतिक और देशद्रोही वाला था, पर तब उन्हें सम्मान मिलता था और हमारा शासक वर्ग उनका महिमामंडन कर उनके गुण गाता था। पर अब क्या हो गया है? अब लोगों को जैसे-जैसे पता चलता जा रहा है कि ये लोग हमें कितनी क्षति पहुंचा रहे थे-वैसे-वैसे ही इस खेल में लगे लोगों को समाज में लोग संदेह की नजरों से देखने लगे हैं। ये संदेह की नजरें इन लोगों को खाती हैं और तब ये कुलबुलाकर जितनी जल्दी हो सके देश से मोदी को भगा देने के लिए उठ खड़े होते हैं। आज तक जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में देश विरोधी शिक्षा दी जा रही थी। कन्हैया जैसे छात्र एक षडय़ंत्र के अंतर्गत तैयार किये जा रहे थे। एक विचारधारा थी जो उन्हें देश के विरोध में तैयार कर रही थी, यानि 'जयचंदी-छलछंदी परंपरा' को दूध पिलाकर पालित पोषित किया जा रहा था। अब उस षडय़ंत्र का फोड़ा फूट गया है और फोड़े की सारी मवाद फूटकर सडक़ पर निकली पड़ी है। सारे देश ने अपनी आंखों से देखा है कि वहां क्या हो रहा था और किसलिए हो रहा था? अब भी देश ने देखा है कि दशहरा के दिन वहां प्रधानमंत्री का पुतला फूंका गया है। यह क्यों हुआ है इस पर विचार करने का समय है? पीएम का पुतला फूंकना कोई बड़ी बात नही है-यह तो किसी भी पीडि़त का लोकतांत्रिक अधिकार है। पर यह पुतला जेएनयू से फूंका जाए और केवल इसलिए फूंका जाए कि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' गाने वालों के फोड़े की मवाद सडक़ पर क्यों निकाल दी गयी-तो यह चिंता का विषय है? सारे देश के राष्ट्रवादियों के लिए यह चुनौती है।

अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जो लोग भारत के साथ दिखाई दे रहे हैं, आवश्यक नही कि वे भारत के साथ ही हों। उनके लोग भारत को तोडऩे में लगे हैं, भारत में रहकर भारत का खाकर और भारत को अपना मानकर भी भारत को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। उनके उद्देश्य को समझना होगा। मोदी याद रखें कि बगल में लेकर फोटो खिंचवाने के लिए तो अफजल ने भी शिवाजी को बांहों में ले लिया था। 'अफजल' को समझने के लिए वह 'शिवाजी परंपरा' को आगे बढ़ायें। इतिहास की गंगा प्रदूषित हो चुकी है, इसकी अस्वच्छता में कृष्णजी और शिवाजी जैसे लोग दबा दिये गये हैं-इन्हें भी जरा निकाल देखा जाए-रास्ता मिलेगा राहत मिलेगी और विश्व में सम्मान मिलेगा। क्योंकि परायों का सम्मान करने से कभी सम्मान नही मिलता है, सम्मान तो अपनों का करने से ही मिलता है। उधारी प्रतिभा का सम्मान करने से वे आपको बोझ मार सकती हैं पर आपको मार्ग नही दिखा सकतीं। राष्ट्र जागरण का समय है-इतिहास बोध से नई पीढ़ी को भरना होगा, अन्यथा बच नही पाएंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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