शिक्षा कैसी हो?

  • 2016-08-17 06:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

शिक्षा कैसी हो?

सामवेद के 397 वें मंत्र में स्पष्ट करते हुए शिक्षा के तीन उद्देश्य बताये गये हैं इसमें कहा गया है कि-''मर्यादा का पालन करने वाले तथा विद्या से प्रकाशित माता-पिता, गुरू और उपदेशक हमारे शारीरिक रोगों को दूर करें। हिंसा की भावना को दूर करें। कुटिलता पापयुक्त बुद्घि को दूर करें। इस प्रकार हमें पापों से दूर करें।''

इस मंत्र से स्पष्ट है कि माता-पिता और गुरू से अपेक्षा की गयी है कि आप जिन अच्छी बातों, सदगुणों और मर्यादाओं को अपने बच्चों अथवा शिष्यों में देखना चाहते हैं और जिन गुणों की शिक्षा उन्हें देना चाहते हैं वे गुण पहले आपके आचरण की शोभा बढ़ाने वाले होने चाहिए, अर्थात यदि आप चाहते हैं कि मेरा बेटा या बेटी वृद्घावस्था में मेरा संबल बने, तो आज आप पहले उसका संबल बन जाएं।
कहने का अभिप्राय है कि यदि आप यह चाहते हैं कि मेरी बेटी मेरे प्रति आत्मीय संबंध रखने वाली बने, तो पहले आप इस आत्मीयता का प्रदर्शन आज उसके प्रति करें, सभी संबंधों की समरसता का पाठ उसे पढ़ायें। आज अधिकतर परिवारों में भाई-भाई से जल रहा है, ईष्र्या के मारे भाई-भाई को देख नही पा रहा।

अपने ही भाई की बुराई, निंदा, आलोचना अपने ही बच्चों के समक्ष जब कोई व्यक्ति करता है तो समझना चाहिए कि उसने अपने घर में अपने आप ही आग लगाने के लिए माचिस बच्चों के पास फेंक दी है। हम बच्चों को जिन संस्कारों में ढालना चाहते हैं उनमें पहले स्वयं ढल जायें। हम अपने संबंधियों के प्रति, माता-पिता के प्रति संवेदनशील बनें, उदार बनें, विनम्र बनें, सेवाभावी बनें, सहयोगी और सहिष्णु बनें तो इन गुणों का अनुकरण करते-करते हमारे बच्चे भी संस्कारित होंगे। इसी भावना के दृष्टिगत वेद ने उक्त मंत्र में माता-पिता के आचरण को मर्यादित और संयमित होने की अपेक्षा की है।
आप पहले उसे आज अपने जीवन की सरसता में ढाल तो दें, फिर देखना आपके जीवन की बेल इसी सरसता के फलों से कितनी लद जाएगी? आज माता-पिता अपने बच्चों को तो आपस में प्रेम से रहने का उपदेश देते हैं, किंतु स्वयं अपने भाई, बहन और माता-पिता की बुराई करते नही थकते, हमारी माता अपने बेटे और बहू से अपनी सेवा की तो अपेक्षा रखती है किंतु वह बहू होकर सास की सेवा करने से कतराती है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि उल्टा आचरण करके भी हम फल आशानुरूप अच्छा ही चाहते हैं।
अत: बात स्पष्ट है कि जब आचरण विपरीत है तो फल भी विपरीत ही आएगा क्योंकि हमने वेद की शिक्षा पर ध्यान ही नही दिया।
मैकाले के मानसपुत्र
हम भटक गये। एक मैकाले नामक हमारे शत्रु ने हमें अपने वेद की शिक्षा से काट दिया। वह ले गया हमें यहां से उठाकर पश्चिम की चकाचौंध भरी दुनिया में। हमने इसके समक्ष अपने अतीत के गौरव को भुला दिया। अपने अध्यात्म ज्ञान को भुला दिया, अपनी संस्कृति को भुला दिया, अपनी अस्मिता और अपनी निजता को भुला दिया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अनुसंधान होना चाहिए था, विचारों का आधान होना चाहिए था, एक आंदोलन होता, एक शोधन होता, समग्रता में ढली हुई क्रांति होती, किसी के हृदय में न कोई भ्रांति होती, एक विचार आता, एक सुधार आता, चहुं ओर से एक संदेश आता-इस आह्वान के साथ कि-''चलो अपने गौरवपूर्ण अतीत की ओर।''
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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