सर्वधर्म-समभाव का भ्रम-4

  • 2017-03-28 06:30:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

सर्वधर्म-समभाव का भ्रम-4

राजनेताओं से जनता निराश

आज राजा और उसके चाटुकार सभी घोटालों में फंसे पड़े हैं। जनसेवा जीवन का उद्देश्य नहीं रह गयी है। जब राजा इस प्रकार का आचरण कर रहा हो तो प्रजा तो उसका अनुकरण करेगी ही। फलस्वरूप-

चराजा की देखा-देखी जनता अपने राजधर्म से विमुख है, अपने राष्टरधर्म से विमुख है।

चदेश में अराजकता की स्थिति है। राष्टरीय चरित्र का अभाव है। सभी कुछ राम भरोसे चल रहा है।

चप्रशासनिक

तंत्र की गाड़ी पटरी से उतर चुकी है।

चसंतरी से मंत्री तक सभी स्वार्थ में डूबे पड़े हैं।

अत: राष्ट में राष्टरीय चरित्र में किस सीमा तक पतन हुआ है-आप देखें। कुछ बातें हैं जिन्हें आप भली प्रकार अनुभव कर रहे होंगे यथा-

अतिक्रमण का व्यापक रोग

जी.टी. रोड जैसी पुरानी नई सडक़ों का अतिक्रमण हर शहर और कस्बे में किया गया है। जिससे सडक़ों पर दुर्घटनाओं और प्रतिदिन के

जामों में वृद्घि हुई है। दूर की गाडिय़ां अपने गंतव्य पर विलंब से पहुंचती हैं। यात्री अपने घर विलंब से पहुंचते हैं। जिन लोगों को अपने घरों पर जाने के लिए सुनसान जंगल अथवा बीहड़ों की यात्रा करनी होती है उन्हें लूटपाट का सामना करना पड़ता है।

कइयों को तो बलात्कार और हत्या तक का सामना करना पड़ता है। सडक़ों के अतिक्रमण की परिणति यदि अपराधों के रूप में देखी जाए तो आंकड़ों को देखकर

रोंगटे खड़े हो जाएंगे। किंतु किसी का ध्यान इस ओर नहीं है। यदि आपने इस अतिक्रमण को हटाने के संबंध में आवाज उठाई तो वोटों के सौदागर अतिक्रमणकर्ताओं के पक्ष में स्वयं सडक़ों पर उतर आएंगे। बड़े मार्मिक और भावुक भाषण देंगे। यथा-

''जिन लोगों ने वर्षों से इस सडक़ के दोनों ओर अपने कारोबार कर रखे हैं उन्हें हम उजडऩे नहीं देंगे- चाहे हमें पार्टी से, विधानसभा से और संसद से त्यागपत्र

ही क्यों देना पड़ जाए।'' उपस्थित जनता ये सुनकर ताली बजा देती है और ऐसा बोलने वाले हमारे जनप्रतिनिधि या नेता लोग वहां से उठकर गाड़ी में बैठकर जयकारों के बीच फुर्र हो जाते हैं।

ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कैसे हो? यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती है। इससे भी आगे और क्या-क्या होता है उस पर भी विचार कीजिए। जीत अतिक्रमण कर्ताओं की

होती है। राजनैतिक हस्तक्षेप से सारे सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक शांत हो जाते हैं या शांत कर दिये जाते हैं। सडक़ जाम की स्थिति से बचने के लिए फिर सभी लोगों को आश्वासन दिया जाता है कि शीघ्र ही इस शहर या कस्बे के बाहर से एक 'बाईपास' का निर्माण होगा। इस 'बाईपास' का निर्माण करोड़ों रूपयों में होता है। बहुत सी उपजाऊ जमीन इसके लिए क्रय करनी पड़ती है। जहां करोड़ों रूपया इस प्रकार
जमीन के मुआवजे के लिए चला जाता है वहीं दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही उपजाऊ भूमि और कम हो जाती है।

इस जनसंख्या के बढ़ते दबाव की स्थिति में कृषि भूमि का विस्तार करके उसको कम करते जाने की ये मूर्खतापूर्ण नीतियां हमें कहां ले जाएंगी? कुछ कहा नहीं जा सकता। बाईपास के महत्वाकांक्षी निर्माण में राजनीतिक लोगों अधिकारियों की रूचि अधिक होती है। ऊपरी तौर पर यह महत्वाकांक्षी निर्माण

योजना जनहित में उठाया गया सराहनीय कार्य दिखती है। किंतु वास्तव में इसके पीछे हमारे अधिकारियों और उनके संरक्षक नेताओं का 'कमीशन' का स्वार्थ छिपा होता है। उस कमीशन की प्राप्ति के लिए लड़ाई होती है-जनहित के नाम पर। उस कमीशन की प्राप्ति के लिए ही सरकारी पैसा बहा दिया जाता है-पानी की तरह।

विधायक सांसद निधि

आज देश में बहुत कम सांसद और विधायक ऐसे होंगे जिनके मुंह लगे ठेकेदार

उनके आवास पर चक्कर लगाते हुए आपको दिखायी दें। इनके चक्कर लगाने का राज 'कमीशन' के पीछे ही छिपा है। अपने मन पसंद ठेकेदार से अपनी सांसद अथवा विधायक निधि से नेताओं द्वारा कार्य कराना उनके किसी निहित स्वार्थ की ओर हमारा ध्यान आकृष्टï करता है। बड़े बढिय़ा ढंग से यह खर्च होने वाली राशि सांसद अथवा विधायक निधि से निकलती है और उसका 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा सीधे संबंधित सांसद अथवा
विधायक
के लिए चला जाता है।

पीछे पर्दे में तो ऐसा जघन्य कार्य होता है और पर्दे पर हम अपने महान सांसद अथवा विधायक की जय बोलते हैं। कमाई का इससे सुंदर ढंग और क्या हो सकता है कि चोरी भी की जाए तो चोरी पकड़ी भी जाए। इसी को कहते हैं 'आम के आम गुठलियों के दाम' देश के हर प्रदेश में ऐसा ही हो रहा है, किंतु फिर भी सब चुप हैं।

इसके पश्चात अपना ध्यान कुछ दूसरी ओर लाइये। आपके

शहर में मैन होल खुले रहना कोई बड़ी बात नहीं रही है। इन मेनहोलों में जब तक दो चार या दस पांच व्यक्ति अपनी आहुति